BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Thursday, July 15, 2021

एक कवि बीबी से अकड़ा _ हास्य

एक ‘कवि’ जब खिन्न हुआ तो बीबी से ‘वो’ अकड़ा
कमर कसा ‘बीबी’ ने भी शुरू हुआ था झगडा
कितनी मेहनत मै करता हूँ दिन भर ‘चौपाये’ सा 
करूँ कमाई सुनूं बॉस की रोता-गाता-आता
सब्जी का थैला लटकाए आटे में रंग जाता 
कभी कोयला लकड़ी लादूँ हुआ ‘कोयला’ आता
दिन भर सोती भरे ऊर्जा लड़ने को दम आता ?
--------------------------------------------------
पंखा झल दो चाय बनाओ सिर थोडा सहलाओ
मीठी-मीठी बातें करके दिल हल्का कर जाओ
काम से फटता है दिमाग रे ! चोरों की हैं टेंशन
चोर-चोर मौसेरे भाई मुझसे सबसे अनबन
कितना ही अच्छा करता मै बॉस है आँख दिखाता
वही गधों को गले मिला के दारु बहुत पिलाता
उसके बॉस भी डरते उससे बड़ा यूनियन बाज
भोली- भाली चिड़ियाँ चूँ ना करती- खाने दौड़े बाज
---------------------------------------------------------------
बात अधूरी बीबी दौड़ी लिए बेलना हाथ
हे ! कवि तू अपनी ही गाये कौन सुने तेरी बात ?
सुबह पांच उठती सब करती साफ़ -सफाई घर की
तन की -मन की, पूजा करती घन-घन बजती घंटी
दौड़ किचेन में उसे नहाना कपड़ा भी पहनाती
चोटी करती ढूंढ के मोजा, बैज, रूमाल भी लाती
प्यार से पप्पी ले ‘लाली’ को वहां तलक पहुंचाती 
------------------------------------------------------
फिर तुम्हरे पीछे हे सजना बच्चों जैसा हाल
इतने भोले बड़े भुलक्कड होती मै बेहाल
रंग चोंग के सजा बजा के तुम को रोज पठाती
लुढके रोते से जब आते हो ख़ुशी मेरी सब जाती
दिन भर तो मै दौड़ थकी हूँ कुछ रोमांस तो कर लो
आओ प्रेम से गले लगाओ आलिंगन में भर लो !
------------------------------------------------------
हँसे प्यार से कली फूल ज्यों खिल-खिल-खिल खिल हंस लें
ननद-सास बहु-बात तंग मै दिल कुछ हल्का कर लें
छोटे देवर छोटे बच्चे सास ससुर सब काम
आफिस मेरा तुमसे बढ़कर यहाँ सभी मेरे बॉस
आफिस में ही ना टेन्शन है घर में बहुत है टेन्शन
कभी ख़ुशी तो कुढ़ -कुढ़ जीना यहाँ भी बड़ी है अनबन
------------------------------------------------------------
दस-दस घंटे रात में भी तुम- हो कविता के पीछे
हाथ दर्द है कमर दर्द है आँख लाल हो मींचे
ये सौतन है ' ब्लागिंग' मेरी समय मेरा है खाती
इंटरनेट मोडेम मित्रों से चिढ़ है मुझको आती
मानीटर ये बीबी से बढ़ प्यार है तुमको आता
लगा ठहाके हंस मुस्काते रंक ज्यों कंचन पाता
लौंगा वीरा और इलायची वो सुहाग की रात
हे प्रभु इनको याद दिला दे करती मै फरियाद
----------------------------------------------------------
कवि का माथा ठनका बोला मै सौ 'कविता' पा-लूं
'कविता' एक को तुम पाली हो, सुनता ही बस घूमूं
तुम थक जाती मै ना थकता, कविता मुझको प्यारी
पालो तुम भी दस-दस कविता तो अपनी हो यारी
-----------------------------------------------------------
एक कवि -लेखक ही तो है- पूजा करता- ‘सुवरन’ पाछे भागे
हीरा मोती और जवाहर-ठोकर मारे-प्रीत के आगे नाचे-हारे
दो टुकड़े -कागज पाती कुछ -वाह वाह सुनने को मरता
प्रीत ‘मीत’ को गले लगाए दर्पण ‘निज’ को आँका करता
खून पसीना अपना लाता मन मष्तिष्क लगाता
टेंशन-वेंशन सब भूले मै, सोलह श्रृंगार सजाता
सहलाता कोमल कर मन से, ढांचा बहुत बनाता
मै सुनार -लो-‘हार’, कभी मै प्रजापति बन जाता
--------------------------------------------------------
आत्म और परमात्म मिलन से हँस गद-गद हो जाता
हे री ! प्यारी 'मधु' तू मेरी मै मिठास भर जाता
सात जनम तुझको मै पाऊँ सुघड़ सुहानी तू है
साँस, हमारी जीवन साथी जीवन लक्ष्मी तू है
-------------------------------------------------------
तब बीबी भी भावुक हो झर झर नैनन नीर बहाई
गले में वो 'बाला' सी लटकी कुछ फिर बोल न पायी
दो जाँ एक हुए थे पल में, धडकन हो गयी एक
हे ! प्रभु सब को प्यार दो ऐसा, सब बन जाएँ नेक
------------------------------------------------------
'कविता' को भी प्यार मिले, भरपूर सजी वो घूमे
सत्य सदा हो गले लगाये, हर दिल में वो झूले
जैसे कविता एक अकेली कितने दिल को छू हरषाए
आओ हम भी दिल हर बस लें क्या ले आये क्या ले जाएँ ?
हम जब जाएँ भी तो 'हम' हों, 'मै' ना रहूँ अकेला
प्यारी जग की रीति यही है, दुनिया है एक ‘मेला’ !!
---------------------------------------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' ५



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, June 18, 2021

दो फाड़ हो चुके

दो फाड़ हो चुके
....................
चूहों की चौपाल में
घमासान जारी है
दो फाड़ हो चुके
फिर भी ये टुकड़ा
अभी बहुत भारी है....
तीन चूहे
एक रोटी
सामर्थ्य नहीं
नोच दो फाड़ दो
उछल कूद जारी है...
उधेड़बुन, कशमकश
एक कोने से दूजे कोने
दौड़ भाग केंद्र तक जारी है...
मन नहीं है बांटने का
अनमना मन
लिहाज शर्म हया
अब भी सब पे भारी है....
खिसियाहट
दांत गड़ाने
दांत निपोरने 
नाम बदलने से 
अच्छा है बांट दो
सुगबुगाहट जारी है....
तीन टुकड़े भले होंगे
दर्द भूल जाएगा
हलाहल पच जाएगा
तीनों का पेट तो भर जाएगा
बहस अभी जारी है...
.....….............
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत।



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, June 12, 2021

बाल श्रम निषेध















मित्रों जय श्री राधे, बाल श्रम निषेध के बारे में लोगों को सतत जागरूक करना हम सब का दायित्व है माता पिता जागरूक होंगे तो निश्चित ही वे साथ देंगे और इस अभिशाप से मुक्ति मिल सकेगी हम सभी जो साहित्य से जुड़े , पत्रकारिता से जुड़े, न्याय के कार्यों से जुड़े हैं उनका तो विशेष दायित्व बनता है ।

बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी अवैध पेशे और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिये अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशों और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में वर्णित है।
हमारी इस प्यारी दुनिया मे बसे हर व्यक्ति का बचपन जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है । क्योंकि बचपन ही एक ऐसा अमूल्य समय होता है जिसमे हम तीव्र गति से बिना ईर्ष्या, घमंड के हर कुछ सीखते है जो देखते हैं उसका अनुकरण करते हैं जिस पर हमारा भविष्य निर्मित होता है ।
 सभी बच्चों का पूरा अधिकार है कि इन के माता-पिता उनकी सही परवरिश करें, उन्हे अच्छी शिक्षा दिलाएं, विद्यालय मे भेजें और दोस्तों के साथ खेलने फलने फूलने का पूरा समय दे । लेकिन बाल मजदूरी से इन फूल जैसे प्यारे बच्चों का पूरा जीवन बरबाद हो जाता है ।

हमारे देश मे 14 साल की कम उम्र वाले बच्चों से काम करवाना गैरकानूनी है । लेकिन प्रायः देखा जाता है कि माता-पिता की पीड़ा, गरीबी, भुखमरी और लाचारी से प्यारे बच्चे बाल मजदूरी के खतरनाक दलदल में धंसते फंसते चले जाते हैं ।
साधारण भाषा मे अगर समझा जाय तो किसी भी क्षेत्र में बच्चों से काम दबावपूर्णं करवाया जाए तो उसे बाल मजदूरी या बालश्रम कहते हैं ।

आज बाल श्रम पर इतने कड़े नियम कानून के होते हुए भी जिधर देखिए बाल श्रमिक का मकड़ जाल फैला पड़ा है ईंट भट्ठों में, होटलों में, छोटे कारखानों में , कबाड़ की दुकानों में बहुतायत ये दिखते हैं , जिसे हमारा श्रमिक विभाग अनदेखी कर नजर बंद किए घूमता रहता है। 
जरूरत है ऐसे माता पिता को अधिक जागरूक किया जाए उनके साथ श्रम विभाग कड़ाई भी करे। 
 क्या श्रम विभाग के आला अधिकारी जो अपने कार्य क्षेत्र में इन पर रोक नहीं लगा पाते , देखते घूम रहे नजरअंदाज किए, तो उनके ऊपर कार्यवाही न सुनिश्चित किया जाए??

भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी जी जिन्होंने बाल श्रम को रोकने के लिए अपना पूर्ण सहयोग दिया तथा इसके लिए उन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला। ये मध्य प्रदेश में पैदा हुए और अपनी शिक्षक की नौकरी त्यागकर ‘बालश्रम’ की समाप्ति के कार्य में लग गये। 1980 में इन्होंने ‘बचपन बचाओ’ नामक एक आन्दोलन चलाया। 144 देशों में इन्होंने लगभग 83,000 बच्चों को बालश्रम से उबारा और उनकी शिक्षा आदि का भी विभिन्न सरकारों के सहयोग से प्रबन्ध कराया था।
कुल मिलाकर हमे बाल श्रम के अभिशाप से कैसे भी उबरना होगा कल यही बच्चे हमारे देश के अध्यापक, वैज्ञानिक, साहित्यकार आदि , कर्णधार बनेंगे और देश की प्रगति में सहायक होंगे।
आइए मित्रों और जागरूक बनें और बनाएं, जय श्री राधे।
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, May 22, 2021

कोरोना के काल को

कोरोना के काल को, 
झूंठलाए जो लोग।
खुद शिकार वो हो गए ,
 और बढ़ाए रोग।।

दो गज दस मीटर बना, 
मास्क बना अनिवार्य,
आफिस घर बाहर सभी,
पहन करो सब कार्य।।

अगर भीड़ हो, संशय कुछ हो,
कहीं संक्रमित, टहल गया हो,
शरमाओ ना मास्क,पहन लो,
गली मोहल्ला, अपना घर हो।।

गले मि लो ना ,
ना हाथ मिलाओ,
छूना कुछ हो , 
सैनिटाइजर  हाथ लगाओ ।

आंख नाक जो छूना ही हो,  
 साबुन से तुम हाथ मलो।
हाथ छुवो ना, हाथ बढ़ाओ
कठिन समय, पग चलो जमाओ।

ठंडा पानी पेय नहीं लो
काढ़ा भाप गर्म पानी लो
अदरक तुलसी या गिलोय हो
दवा सुझाई गई मात्र लो

फंगस व्हाइट ब्लैक कोई भी
पहचानो आहट खतरे की
अस्पताल भागो जाओ 
देरी ना हो दवा कराओ

नाक बंद हो चेहरे सूजन
आंख दर्द या धुंधलापन हो
फंगस के हैं सारे लक्षण
दांत हिले या दर्द दांत हो 

अगर शुगर या रोग पुराना
स्टेरायड खुद ना खाना
डाक्टर से ही दवा लिखाना
सब को भाई रोज सिखाना

बहुरूपिया अदृश्य कोरोना
भूल करो ना पीछे रोना
भोले भाले को समझाना
अपना ही दायित्व समझना

श्मशान नदियों के तट से
दूर रहो है वायु प्रदूषित
आंधी चिड़ियां मरे जानवर
जलजमाव बहुतेरे दूषित

प्राणायाम योग कसरत से
आओ चुस्त दुरुस्त बनें 
प्रोन पोजिशन लेट लेट के
ऑक्सिजन भरपूर भरें

रखें हौंसला ना घबराएं
जंग जीत कर हम मुस्काएं
झंझावात महामारी को
सब मिल आओ दूर भगाएं
***********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5 , प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत।




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, May 15, 2021

आज चांद शरमाया कुछ है

***************
आज चांद शरमाया कुछ है
गोरी चंदा छुपी निहार
हिय हुलसे कब साजन झांकें
मन खटके दौड़े बस द्वार
*******************
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, May 12, 2021

कोरोना है डरा रहा

*****************
कोरोना है डरा रहा, 
चुन चुन करे शिकार
आंख बन्द माने नहीं , 
शामिल हुए हजार।
***************
कोरोना से मत डरो,
 अपनाओ सब ढाल
हृष्ट पुष्ट ताकत रखो,
कर लो प्राणायाम,
*************
काढ़ा भाप गर्म पानी लो,
घर में करो आराम,
मास्क सैनिटाइजर ना भूलो,
बाहर गर हो काम
*************
अदरक तुलसी मिर्च हो काली, 
लौंगा और गिलोय
नीबू सेंधा नमक प्याज भी,
घर में करो प्रयोग
****************
रूप प्रभु के यहां चिकित्सक
लो सलाह भरपूर
जो बोलें तुम करो दवाई
खा लो थोड़ा धूप
***************
कुछ कपूर हो लौंग साथ में,
कभी कभी लो सूंघ
प्रोन पोजिशन लेट सांस लो,
ऑक्सिजन भरपूर।
***************
प्रात उठो टहलो बस घर में
योग ध्यान कसरत कुछ कर लो,
पौधों फूलों से कुछ खेलो
प्यार करो हंस लो मुस्का लो।
******************
आंधी आए कुछ फल गिरते
बचते फिर मजबूत
आओ बांटें व्यथा सभी की,
हृदय बचे ना कोई शूल।
*****************
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, April 20, 2021

संगिनी हूं संग चलूंगी

संगिनी हूं संग चलूंगी
------------------------
जब सींचोगे
पलूं बढूंगी
खुश हूंगी मै
तभी खिलूंगी
बांटूंगी
 अधरों मुस्कान
मै तेरी पहचान बनकर
********
वेदनाएं भी
 हरुंगी
जीत निश्चित 
मै करूंगी
कीर्ति पताका
मै फहरूंगी
मै तेरी पहचान बनकर
*********
अभिलाषाएं 
पूर्ण होंगी
राह कंटक
मै चलूंगी
पाप पापी
भी दलूंगी
संगिनी हूं
संग चलूंगी
मै तेरी पहचान बनकर
*********
ज्योति देने को
जलूंगी
शान्ति हूं मैं
सुख भी दूंगी
मै जिऊंगी
औ मरूंगी
पूर्ण तुझको
मै करूंगी
सृष्टि सी 
रचती रहूंगी
सर्वदा ही
मै तेरी पहचान बनकर
**********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश ,
भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, April 18, 2021

साजन का मुख तो दिखला दे

***************
कितना ठौर ठिकाना बदले
हे चंदा तू नित आकाश
साजन का मुख तो दिखला दे
चैन से सो लूं जी इस रात
*******************
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, April 17, 2021

फूला अब तो फल रहा विषाणु बनकर

उग गया बोया गया या उड़ के आया
फूला अब तो फल रहा विषाणु बनकर
भोर को लूटा गया मिटते उजाले
खींचती है भींचती अब काल रात्रि है भयंकर
शिव हैं शव है औ मरुस्थल भस्म सारी
रोती आंखें आंधियां तू फां बवंडर
सांस अटकी थरथराते लोग सारे
रेत उड़ती फड़ फड़ाते पिंड पिंजर
गुल गुलिस्तां हैं हुए बेजान सारे
सूखती तुलसी पड़ी वीरान घर है खंडहर
ना भ्रमर हैं गूंजते ना फूल मुस्काते दिखे
मोड़ मुख हैं दूर सारे कौन कूदे इस कहर
दुधमुंहे जाते रहे हैं बूढ़ी आंखें थक चुकीं
बूढ़े कांधे टूटते अब कौन ढोए ये सितम
चार दिन की जिंद गानी कौन खोए
छू के शव को सोचते बीते प्रहर
खोद देते फेंक देते औंधे मुंह जज़्बात सारे
मर मिटीं संवेदनाएं क्रूर आया है प्रलय
शान्त हो मस्तिष्क को काबू रखो हे!
नाचो गाओ कर लो चाहे आज तांडव
मौन मत हो गा आे झूमो काल भैरव ही सही
दिल से छेड़ो तुम तराने साथ छोड़े ना हृदय
******************
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश, भारत 17.04.2021



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, April 14, 2021

प्रिय उर तपन बढ़ा री बदली


*****************
प्रिय उर तपन बढ़ा री बदली
देखें तुझको दसियों बार
चांद देख लें अपनी ' पगली '
आ मिल लें सावन इस बार ।
*****************
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, April 11, 2021

झांक नैनों पढ़ रही हूं

छुआ जब से मुझको तूने
खिल गई हूं
कली से मै फूल बनकर
भ्रमर आते ढेर सारे
छुप रही हूं
ना सताएं शूल बनकर
गुनगुनाते छेड़ते कितने तराने
खुश बहुत हूं
तार की झनकार बनकर
मधु पराग खुश्बू ले उड़ते
फिर हूं रचती अन्नपूर्णा -
स्नेह घट मै कुंभ बनकर
नेह निमंत्रण दे जाते कुछ
झांक नैनों पढ़ रही हूं
संग जाती हूं कभी मुस्कान बनकर
वेदनाएं ले उदासी घूमते कुछ
धड़कनें दिल की समझती
अश्रु धारा मै सहेजूं सीप बनकर
नत हुए कुछ पाप ले मिलते शरण तो
पूत करती मै पवित्री
बह रही जग गंगा यमुना धार बनकर
स्नेह पूजा मान देते ढेर सारे
प्रकृति अपनी देवी मां हूं
बलि हुई हूं
सुख प्रदाता हवन बनकर

सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5, 
12.04.2021


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 9, 2021

आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी

आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी
----------------------------------------
रूपसी थी कभी चांद सी तू खिली
ओढ़े घूंघट में तू माथे सूरज लिए
नैन करुणा भरे ज्योति जीवन लिए
स्वर्ण आभा चमक चांदनी से सजी
गोल पृथ्वी झुलाती जहां नाथती
तेरे अधरों पे खुशियां रही नाचती
घोल मधु तू सरस बोल थी बोलती
नाचते मोर कलियां थी पर खोलती
फूल खिल जाते थे कूजते थे बिहग
माथ मेरे फिराती थी तू तेरा कर
लौट आता था सपनों से ए मां मेरी 
मिलती जन्नत खुशी तेरी आंखों भरी 
दौड़ आंचल तेरे जब मै छुप जाता था
क्या कहूं कितना सारा मै सुख पाता था
मोहिनी मूर्ति ममता की दिल आज भी
क्या कभी भूल सकता है संसार भी
गीत तू साज तू मेरा संगीत भी
शब्द वाणी मेरी पंख परवाज़ भी
नैन तू दृश्य तू शस्त्र भी ढाल भी
जिसने जीवन दिया पालती पोषती
नीर सी क्षीर सी अंग सारे बसी
 आई माई मेरी अम्मा है प्राण सी

सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत , 10.4.2021



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

आज चांद का रंग कुछ बदला


आज चांद का रंग कुछ बदला , 
प्रिय ने शायद देख लिया ।
लाल तभी है मेरा मुखड़ा,  
नैन उतर दिल नेह किया ।।

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, April 8, 2021

कर सोलह श्रृंगार नटी ये

कर सोलह श्रृंगार नटी ये
...…...……..........
नीले नभ पे श्वेत बदरिया
मलयानिल मिल रूप आंकती
हिमगिरि पे ज्यों पार्वती मां
सुंदरता की मूर्ति झांकती
……....….....
शिव हों भोले ठाढे जैसे
बादल बड़े भयावह काले
वहीं सात नन्हे शिशु खेलें
ब्रह्मा विष्णु सभी सुख ले लें
……..…............
निर्झर झरने नील स्वच्छ जल
कल कल निनादिनी सरिता देखो
हरियाली चहुं ओर है पसरी
स्वर्ण रश्मि अनुपम छवि देखो
…...................
कर सोलह श्रृंगार नटी ये
प्रकृति मोहती जन मन देखो
..…
श्वेत कबूतर ले गुलाब है
उड़ा आ रहा स्वागत कर लो
…...…........
फूल की घाटी तितली भौंरे
कलियों फूल से खेल रहे
खुशबू मादक सी सुगन्ध ले
नैन नशीले बोल रहे
......
पंछी कुल है हमें जगाता
कलरव करते दुनिया घूमे
छलक उठा अमृत घट जैसे
अमृत वर्षा हर मुख चूमे
...........
हहर हहर तरू झूम रहे हैं
लहर लहर नदिया बल खाती
गोरी सिर अमृत घट लेकर
रोज सुबह आ हमे उठाती
..........
ओस की बूंदें मोती जैसे
दर्पण बन जग हमे दिखाती
करें खेल अधरो नैनों से
बड़ी मोहिनी हमे रिझाती
............
कहीं नाचते मोर मोरनी
झंकृत स्वर हैं कीट पतंगे
रंग बिरंगी अद्भुत कृति की
शोभा निखरी किस मुंह कह दें
,.....….........
मन कहता भर अनुपम छवि उर
नैन मूंद बस कुटी रमाऊं
स्नेह सिक्त मां तेरा आंचल
शिशु बन मै दुलराता जाऊं
..........
उठो सुबह हे! ब्रह्म मुहूरत
योग ध्यान से भरो खजाना
वीणा के सुर ताल छेड़ लो
क्या जाने कब लौट के आना ।
.........
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
भारत 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, April 6, 2021

मुझको भी ले चल तू मुन्ना, रंग बिरंगे सपनों में

नैन मूंद मत करे अकेला
मेरे जीवन का तू मेला
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....

अंक भरूं मै चंदा मामा
सूरज चाचू को जल दे दूं
तारों संग कुछ कंचा खेलूं
नील गगन में सैर करूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना......

परियों संग मै खेलूं कूदूं
सप्तऋषि संग वेद पढूं
परियों की जादुई छड़ी लेे
शक्तिमान बन खेल करूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना.........

तितली बन मै फूल की घाटी
पर्वत चढ़ बादल से खेलूं
कामधेनु से मांग खिलौने
कल्पवृक्ष पे झूला झूलूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....

नदियां सागर झील व झरने
हरे भरे जंगल में घूमूं
हाथी दादा हिरन मोर से
करूं दोस्ती सब सुख लेे लूं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....

गौरैया तोता बुलबुल संग
राजहंस बगुला संग उड़ लूं
ले प्यारे बच्चों की टोली
कान्हा संग मै माखन खाऊं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....

चलूं घुटुरुवन छुन्नुन छुन्नून
पैजनिया पैरन में पाऊं
उठूं गिरूं चीखूं चिल्ला के
मां की गोदी में छुप जाऊं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना
रंग बिरंगे सपनों में....

आंख बंद जब तू मुस्काए
तीन देव संग जग हंस जाए
अधर तुम्हारे जब रोने को
मातृ दे वियां सब दुलराएं
मुझको भी लेे चल तू मुन्ना.........

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश, भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, March 31, 2021

पल्लव कोंपल है गोद हरी

शीत बतास औे पाला सहे नित
ठूंठ बने हिय ताना सुने जग
कूंच गई फल फूल मिले
तेरे साहस पे नतमस्तक सब
पल्लव कोंपल है गोद हरी
रस भर महुआ निर्झर झर झर
सब खीझत रीझत दुलराते
सम्मोहित कुछ वश खो जाते
मधु रस आकर्षित भ्रमर कभी
री होली फाग सुनावत हैं
छलकाए देत रस की गागर
ज्यों अमृत पान करावत है
ऋतुराज वसंत भी देख चकित
गोरी चंदा तू कर्पूर धवल
रचिता बनिता दुहिता गुण चित
चहुं लोक बखान बखानत बस
शुध चित्त मर्मज्ञ हरित वसनी
पावन करती निर्झर जननी
बल खाती सरिता कंटक पथ
उफनत हहरत सागर दिल पर
कुछ दबती सहती शोर करे
गर्जन बन मोर नचावत तो
कुछ नाथ लेे नाथ रिझावत है
मंथन कर जग कुछ सूत्र दिए
मदिरा मदहोश हैं राहु केतु 
कुछ देव मनुज संसार हेतु
री अमृत घट करुणा रस की
मै हार गया वर्णन सिय पी
------------------------
सुरेंद्र कुमार शुक्ल
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

प्रकृति रम्य नारी सृष्टि तू

बार बार उड़ने की कोशिश
गिरती और संभलती थी
कांटों की परवाह बिना वो
गुल गुलाब सी खिलती थी
सूर्य रश्मि से तेज लिए वो
चंदा सी थी दमक रही
सरिता प्यारी कलरव करते
झरने चढ़ ज्यों गिरि पे जाती
शीतल मनहर दिव्य वायु सी
बदली बन नभ में उड़ जाती
कभी सींचती प्राण ओज वो
बिजली दुर्गा भी बन जाती
करुणा नेह गेह लक्ष्मी हे
कितने अगणित रूप दिखाती
प्रकृति रम्य नारी सृष्टि तू
प्रेम मूर्ति पर बलि बलि जाती
--------------------
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, March 19, 2021

गांव की गोरी ने लूट लिया तन मन

गांव की गोरी ने लूट लिया तन मन
-----------------------
आम्र मंजरी बौराए तन देख देख के
बौराया मेरा निश्च्छल मन
फूटा अंकुर कोंपल फूटी
टूटे तारों से झंकृत हो आया फिर से मन
कोयल कूकी बुलबुल झूली
सरसों फूली मधुवन महका मेरा मन
छुयी मुई सी नशा नैन का 
यादों वादों का झूला वो फूला मन
हंसती और लजाती छुपती बदली जैसी
सोच बसंती सिहर उठे है कोमल मन
लगता कोई जोह रही विरहन है बादल को
पथराई आंखे हैं चातक सी ले चितवन
फूट पड़े गीत कोई अधरों पे कोई छुवन
कलियों से खेल खेल पुलकित हो आज भ्रमर
मादक सी गंध है होली के रंग लिए
कान्हा को खींच रही प्यार पगी ग्वालन
पीपल है पनघट है घुंघरू की छमछम से
गांव की गोरी ने लूट लिया तन मन
-------------------------
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश भारत
19.3.2021



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, March 14, 2021

' दहेज ' कोई गारंटी नहीं है


' दहेज ' कोई गारंटी नहीं है
निपटाने की साज़िश है
घर में घुसने का पास भर है
चलचित्र की सफलता 
अपने अभिनय पर भी है
छह रुपए हों या छह करोड़
मन कहीं मिला  'एक ' का
पार हो गए साठ साल
नहीं मना लो छह दिन की छट्ठठी 
बरही या फिर ......बस।
लालसा है लालच है
पराकाष्ठा है नफरत का बीज
रिश्ते मर जाते हैं
खौलता है खून
बेहया बेशरम लाल लाल फूल
सेमल सा - जैसे  गोला आग का ।
अपनी औकात भर
भर के हम दांत चियार लेते हैं
होंठ फैला जबरन हंस लेते हैं
कभी खेत बेंच के 
कभी कर्ज लेे के 
कभी किसी का गला काट के ।
गारंटी नहीं है कोई 
घर बसा देने की
प्रेम का दिया जला देने की
दिया तो दिया है
क्या रूप धारण कर ले ।
आइए जोड़ें हाथ दुआ करें
पंख मजबूत हों 
चिड़िया उड़े खूब उड़ें
खुले आसमान में ।
-----------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश 
भारत ।



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, March 11, 2021

हैं बुलंद हौंसले हमारे

हैं बुलंद हौंसले हमारे
पंखों में है जान
थाह लेे रहे ग्रह नक्षत्र की
ऊंची बहुत उड़ान
योग ध्यान से सांस रोकते
बनी अजब पहचान
मिल आते पल में हर दिल से
हर दिल अपनी जान
शान्ति प्रेम का पाठ पढ़ाते
ऋषि मुनि बने महान
विश्व गुरु बनना है निश्चित 
मन में बैठे ठान
टेलीपैथी ग्रह नक्षत्र की
ख़ाक रहे हैं छान
सूरज से कल आंख मिलाए
चंदा से पहचान
स्वर्ग नर्क पाताल रसातल
रचें ग्रन्थ दिनमान
डूब डूब अंतर्मन में हम
फूंक रहे हैं जान
वीर धीर हम तेज प्रबल हैं
अणु कण से पहचान
आओ हाथ मिला हम लिख दें
भारत सदा महान
---------------------
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
उत्तरप्रदेश, भारत
12.3.2021


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, February 27, 2021

तिरछे नैनों से संधान मत कर प्रिये

तिरछे नैनों से संधान मत कर प्रिये
-----------------------------
तिरछे नैनों से संधान मत कर प्रिये
छलनी दिल में भी मूरत दिखेगी तेरी
ढूंढता पूजता रात दिन मै जिसे
प्यासा चातक निगाहें तो बरसें तेरी
-----------
मोम की तू बनी लेे के कोमल हिया
मत जला मुझको री तू पिघल जाएगी
प्रेम दर्पण में तेरे है अटका जिया
कंकरी मार सौ - सौ तू बन जाएगी
------------
फूल कोमल सुकोमल मेरी जान री
कांटा ही मै सही प्रहरी पहचान हूं
खुश्बू बिखराए मादक नशेमन अरी
करता गुंजन ' भ्रमर ' मै तेरी शान हूं
---------
चांद  है तू  चकोरा मै इक टक लखूं
सांस कमतर हुई कल चली जाएगी
प्रेम रस दे भिगो बदली - बिजली सहूं
मेनका इन्द्र धनु कितना तरसाएगी
-------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
उत्तर प्रदेश , भारत
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं