Friday, August 7, 2020

दीप पुंज ले बढ़ते जाएं

आओ करें प्रकाशित जग को,
 दीप पुंज ले बढ़ते जाएं 
 शांत पवन या भले आंधियां 
 टूटे ना लौ जल जल जाए 
 कितना भी शातिर वो तम हो 
 लौ से तेरी बच ना पाए 
 अंधियारे को चीर नित्य ज्यों 
 सूरज सब को राह दिखाए 
 कितनी रातें काल सरीखी ग्रसें उसे 
 और सुनहरी किरण लिए जगमग हो आए 
 हों कोयले की खान चमकते हीरे जैसा 
 बड़े पारखी दौड़े आएं चुन ले जाएं 
 इस अथाह सागर में गुम ना खोएं यारों 
 मोती सा खुद चमकें जग को भी दमकाएं 
 कितने राहु केतु आए कारे बादल से छाए
 तेज पुंज में कहां ठहर वे पल भर पाए
 आओ हम भी जुगनू जैसे रहें चमकते 
 चीरें तम को सब मिल उजियारा फैलाएं 
  कहें भ्रमर कविराय आज तुम दीपक जैसे 
आंखों के तारे बन छाओ भानु सरीखे 
 सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5 
देवरिया उ. प्र. 3.30-4.46 पूर्वाह्न 

 दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, August 1, 2020

फूल खिले हरियाली है


छिट पुट रंग बिरंगे बादल,
हवा बहुत मतवाली है
तरुवर से तांबे के सूरज
फूल खिले हरियाली है
कूके कोयल, कलरव अद्भुत
झूले अंबवा डाली है
बाग - बाग मन उड़े भ्रमर
मन खिला नटी संग प्यारी है



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

मन को छुआ


मन को छुआ
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एकाएक एक दिन
पारखी नजरों के आंकलन ने
मन को छुआ, देखा कुछ
अजीब सा होता हुआ
कोमलता कमतर हुई
हरियाली जाती रही
मुरझाना शुरू हुआ
अन्दर किया बाहर किया
सर्द गर्म हर मौसम - दिया
खाना - खुराक - दवा पानी
प्रेम प्यार स्नेहिल जज्बात
मुरझाता गया गात
मेहनत बेकार
झुंझलाहट चिड़चिड़ाहट बढ़ी
हर पल पगी - रही
देहरी पर खड़ी
तिस पर उलाहना
घूरती आंखों का
आस पास पड़ोस
शक्की जमाने का
पुरुषार्थ पर मेरे
स्नेह - निष्ठा
पालन पोषण पर मेरे
वज्राघात सहता - रोता
मन कचोटता - देता
और दवा पानी खाना खुराक
आंखें सूखीं भर आईं पथराईं
बरसीं छलकीं
और ' वो ' सब को देने वाला
दवा - जीवन - दान
आखिर मुरझा ही गया
प्यारा - तुलसी का पौधा
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ला भ्रमर ५
१.०५-१.५२ भोर , शनि
देवरिया उ. प्र .




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

एक नज़र तिरछे नैनन से


सुबह सवेरे
मन बगियन मा
झर झर फूल
खिलाय गयीं

एक नज़र
तिरछे नैनन से
लिख पतियां
हर्षाय गयीं

ठौर ठांव ना
हिय की कैसे
इन नैनन की
उन तक मै पहुंचाऊं

हृदय पुष्प में
भ्रमर फंसा अब
अंतः सुख उनको भी शायद
समझूं मन समझाऊं



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

दर्द सुनामी बन जब आता शांत सुशांत कहां टिक पाता


कुंठा बन अवसाद लीलती
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दर्द सुनामी बन जब आता
शांत सुशांत कहां टिक पाता
प्रबल वेग तूफान ढहाता
मन मस्तिष्क गृह सब बह जाता
अर्थ तंत्र माया की नगरी
चमक दमक अन्दर है खोखली
लोभ मोह बालक प्रिय प्रियतम
होता क्या ? बन्धन सब बेदम
कुंठा बन अवसाद लीलती
सुख समृद्धि जग काल झोंकती
बड़ी बेरुखी जग जब मिट्टी
सांसें फिर - फिर थम ही रहतीं
मिट्टी छोड़ गए जब हारे
टूटा कंधा गए पिता जीवित ही मारे
फटती छाती दृग निर्झर सा
अन्धकार जग सब सूना सा
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
9- 9.26 PM रविवार
देवरिया उ. प्र .


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं