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Sunday, May 3, 2020
मानव मानवता को वर ले
हमने मिलकर थाल बजाई,
शंख बजा फिर ज्योति जगाई,
मंत्र जाप मन शक्ति अाई,
योग ध्यान आ करें सफाई,
जंग जीत हम छा जाएंगे,
विश्व गुरु हम कहलाएंगे,
आत्मशक्ति अवलोकन करके,
एकाकी ज्यों गुफा में रह के,
जन मन का कल्याण करेंगे
द्वेष नहीं हम कहीं रखेंगे
प्रेम से सब को समझाएंगे
मानव मानवता को वर ले
पूजा प्रकृति की जी भर कर ले
मां है फिर गोदी में लेगी
पीड़ा तेरी सब हर लेगी
हाथ जोड़ बस करे नमन तू
पाप बहुत कुछ दूर रहे तू
जल जीवन कल निर्मल होगा
मन तेरा भी पावन होगा
मां फिर गले लगा लेगी जब
खेल खेलना रमना बहुविधि
सब को गले लगाना फिर तुम
हंसना खूब ठ ठा ना जग तुम।
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
UTTAR PRADESH
10APRIL2020
7.11 AM
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Monday, August 24, 2015
नर्सिंग होम
नर्सिंग होम
कुकुरमुत्ते सा उगा
व्यापार का नया धंधा
फलता -फूलता
ना हो कभी मंदा
मेडिकल वाले उन्हें ही
अच्छा बताते हैं
रिक्शे वाले भाई
पकड़ यहाँ लाते हैं
भाड़ा नहीं - 'कमीशन' ले जाते हैं
अच्छा सा होटल है -ए.सी. है
हीटर है, गीजर है
टी वी है केबल है
पानी की बोतल-ग्लूकोज है
काफी हाल में बस
चहल -पहल -दिखता है
गली नुक्कड़ -चौराहे पर
खुले -होटल से शो -रूम
सजी नर्सें केरल से -
कन्या कुमारी का झरोखा दिखाती है
पांच सौ रूपये में रखी -
कुछ जूनियर डाक्टर्स भी
जबरन मुस्का जाते हैं
बड़े बड़े बोर्ड -दस-काबिल डाक्टर
लिखे दिख जाते हैं
भर्ती होने के बाद -चीखते - मरते
बमुश्किल -एक -नजर आते हैं
भर्ती से पहले -
जेब तलाश ली जाती है
फिर उपचार -आपरेशन
जंग -शुरू हो जाती है
अपनी टांगों पर चल के निकलें
या चार कन्धों पर
पहले पूरी रकम -पूँजी
जमा कर ही -छुट्टी दी जाती
बेबस लाचार जो केवल
रोटी ही जाने हैं
डॉक्टर बाबू को भगवान माने हैं
नहीं जानें एक - दो
क्या जानें किडनी - खून
बच बचा के जान
बेचारे कुछ दिन में
चोरी से भागे हैं !!
-----------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल
"भ्रमर "५
प्रतापगढ़ उ.प्र.२६.०७.२०११
६.१५ पूर्वाह्न जल पी बी
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
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samaj
Tuesday, May 5, 2015
माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां
माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां
( photo with thanks from google/net)
एक जोर बड़ी आवाज हुयी
जैसे विमान बादल गरजा
आया चक्कर मष्तिष्क उलझन
घुमरी-चक्कर जैसे वचपन
----------------------------------
अब प्राण घिरे लगता संकट
पग भाग चले इत उत झटपट
कुछ ईंट गिरी गिरते पत्थर
कुछ भवन धूल उड़ता चंदन
-------------------------------
माटी से माटी मिलने को
आतुर सबको झकझोर दिया
कुछ गले मिले कुछ रोते जो
साँसे-दिल जैसे दफन किया
------------------------------
चीखें क्रंदन बस यहां वहां
फटती छाती बस रक्त बहा
कहीं शिशु नहीं माँ लोट रही
कहीं माँ का आँचल -आस गयी
-------------------------------
कोई फोड़े चूड़ी पति नहीं
पति विलख रहा है 'जान' नहीं
भाई -भगिनी कुछ बिछड़ गए
रिश्ते -नाते सब बिखर गए
------------------------------
सहमा मन अंतर काँप गया
अनहोनी बस मन भांप गया
भूकम्प है धरती काँप गयी
कुछ 'पाप' बढ़ा ये आंच लगी
-----------------------------
सुख भौतिक कुदरत लील गयी
धन-निर्धन सारी टीस गयी
साँसे अटकी मन में विचलन
क्या तेरा मेरा , बस पल दो क्षण
--------------------------------
अब एक दूजे में खोये सब
मरहम घावों पे लगाते हैं
ये जीवन क्षण भंगुर है सच
बस 'ईश' खीझ चिल्लाते हैं
---------------------------
उधर हिमाचल से हिम कुछ
आंसू जैसे ले वेग बढ़ा
कुछ 'वीर' शहादत ज्यों आतुर
छाती में अपनी भींच लिया
------------------------------
क्या अच्छा बुरा ये होता क्यूँ
है अजब पहेली दुनिया विभ्रम
जो बूझे रस ले -ले समाधि
खो सूक्ष्म जगत -परमात्म मिलन
-----------------------------------
कुदरत के आंसू बरस पड़े
तृषित हृदय सहलाने को
पर जख्म नमक ज्यों छिड़क उठे
बस त्राहि-त्राहि कर जाने को
-------------------------------
ऐसा मंजर बस धूल-पंक
धड़कन दिल-सिर पर चढ़ी चले
बौराया मन है पंगु तंत्र
हे शिव शक्ति बस नाम जपें
-------------------------------
इस घोर आपदा सब उलटा
विपदा पर विपदा बढ़ी चले
उखड़ी साँसे जल-जला चला
हिम जाने क्यों है हृदय धधकता
---------------------------------
आओ जोड़ें सब हाथ प्रभू
तत्तपर हों हर दुःख हरने को
मानवता की खातिर 'मानव'
जुट जा इतिहास को रचने को
----------------------------------
हे पशुपति नाथ हे पंचमुखी
क्यों कहर चले बरपाने को
हे दया-सिंधु सब शरण तेरी
क्यों उग्र है क्रूर कहाने को
----------------------------
"मौलिक व अप्रकाशित"
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.३०-३.०२ मध्याह्न
कुल्लू हिमाचल
जैसे विमान बादल गरजा
आया चक्कर मष्तिष्क उलझन
घुमरी-चक्कर जैसे वचपन
----------------------------------
अब प्राण घिरे लगता संकट
पग भाग चले इत उत झटपट
कुछ ईंट गिरी गिरते पत्थर
कुछ भवन धूल उड़ता चंदन
-------------------------------
माटी से माटी मिलने को
आतुर सबको झकझोर दिया
कुछ गले मिले कुछ रोते जो
साँसे-दिल जैसे दफन किया
------------------------------
चीखें क्रंदन बस यहां वहां
फटती छाती बस रक्त बहा
कहीं शिशु नहीं माँ लोट रही
कहीं माँ का आँचल -आस गयी
-------------------------------
कोई फोड़े चूड़ी पति नहीं
पति विलख रहा है 'जान' नहीं
भाई -भगिनी कुछ बिछड़ गए
रिश्ते -नाते सब बिखर गए
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सहमा मन अंतर काँप गया
अनहोनी बस मन भांप गया
भूकम्प है धरती काँप गयी
कुछ 'पाप' बढ़ा ये आंच लगी
-----------------------------
सुख भौतिक कुदरत लील गयी
धन-निर्धन सारी टीस गयी
साँसे अटकी मन में विचलन
क्या तेरा मेरा , बस पल दो क्षण
--------------------------------
अब एक दूजे में खोये सब
मरहम घावों पे लगाते हैं
ये जीवन क्षण भंगुर है सच
बस 'ईश' खीझ चिल्लाते हैं
---------------------------
उधर हिमाचल से हिम कुछ
आंसू जैसे ले वेग बढ़ा
कुछ 'वीर' शहादत ज्यों आतुर
छाती में अपनी भींच लिया
------------------------------
क्या अच्छा बुरा ये होता क्यूँ
है अजब पहेली दुनिया विभ्रम
जो बूझे रस ले -ले समाधि
खो सूक्ष्म जगत -परमात्म मिलन
-----------------------------------
कुदरत के आंसू बरस पड़े
तृषित हृदय सहलाने को
पर जख्म नमक ज्यों छिड़क उठे
बस त्राहि-त्राहि कर जाने को
-------------------------------
ऐसा मंजर बस धूल-पंक
धड़कन दिल-सिर पर चढ़ी चले
बौराया मन है पंगु तंत्र
हे शिव शक्ति बस नाम जपें
-------------------------------
इस घोर आपदा सब उलटा
विपदा पर विपदा बढ़ी चले
उखड़ी साँसे जल-जला चला
हिम जाने क्यों है हृदय धधकता
---------------------------------
आओ जोड़ें सब हाथ प्रभू
तत्तपर हों हर दुःख हरने को
मानवता की खातिर 'मानव'
जुट जा इतिहास को रचने को
----------------------------------
हे पशुपति नाथ हे पंचमुखी
क्यों कहर चले बरपाने को
हे दया-सिंधु सब शरण तेरी
क्यों उग्र है क्रूर कहाने को
----------------------------
"मौलिक व अप्रकाशित"
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.३०-३.०२ मध्याह्न
कुल्लू हिमाचल
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Wednesday, April 1, 2015
बस दो दिन और ---
खाना खाना। अम्मी खाना दे न ! चिड़चिड़ाता काँपता बच्चा अब चीखने लगा था --- महीनों से दौड़ी भागी थकी हारी माँ का सपना टूट चुका था -छोटा बच्चा रोये जा रहा था। गर्म बदन तेज चलती साँसे नींद उड़ा रही थी काले बादल छंटते से दिख रहे थे। भोर का उजाला कुछ कुछ आस बंधा रहा था किरण आएगी तो कुछ न कुछ तो जीवन मिलेगा ही , गोद में सिर रखे बच्चे को थपकी देती विमला ढांढस बंधाती जीवन दान देती जा रही थी। माँ जो है न !
अपनी बपौती खुले आसमान , पेड़ के नीचे दो पीढ़ी से तो यहीं जमी थी , सास ससुर पति यहीं -- इसी जगह से अलविदा ---
तभी विजली चमकी तेज बूँदें -एक पोटली - भीगता कम्बल -- मुन्ने को लिए वो रेन बसेरा की तरफ भागी --
हालत बदलेंगे , कालोनी बनेगी , अपने सिर पर छत होगी , लाखों कैमरे होंगे अपनी गरीबी देखेंगे , कम्प्यूटर पर खाना होगा , पकवान , दवाई ---
ठोकर लगी , गिरी विमला उठी , …रैन बसेरे में भीड़ , कोई पाँव फैला चुका था --
पैर एक कोने घसीट , भीगा कम्बल मुन्ने को ओढाती वो फफक फफक रो पड़ी , बस दो दिनों में वोटों की
गिनती ---
अम्मी दो दिन में तो मै भूखा मर -----
चुप कर -- उसके होंठ उँगलियों से बंद करती विमला सिसक पड़ी ---
बस दो दिन और जी ले मेरे मुन्ने ---
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
6. २ ० -6 . 3 8 पूर्वाहन
रविवार ८/२/२०१५
कुल्लू हिमाचल प्रदेश भारत
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Thursday, July 10, 2014
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
===============
एक कली जो खिलने को थी
कुछ सहमी सकुचाई भय में
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
————————
कितनी सुन्दर धरा हमारी
चंदन सा रज महके
चह-चह चहकें चिड़ियाँ कितनी
बाघ-हिरन संग विचरें
हिम-हिमगिरि वन कानन सारे
शांत स्निग्ध सब सहते
महावीर थे बुद्ध यहीं पर
बड़े महात्मा, हँस सब शूली चढ़ते
स्वर्ग सा सुन्दर भारत भू को
पूजनीय सब बना गए
पर आज ..
एक कली जो खिलने को थी
कुछ सहमी सकुचाई भय में
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
==========================
इतना सुन्दर चमन हमारा
हरी भरी कितनी हैं क्यारी
इतने श्रम से कितने पौधे
उगे बढे हैं नेह पली कुछ न्यारी
भोर हुए मलयानिल आती
सूरज किरणें इन्हे जगातीं
हलरातीं-दुलरातीं खिल-खिल
कभी गिराती -कभी उठातीं
प्रकृति सुरम्या ममता आँचल
गोदी भर -भर इन्हे सुलातीं
आसमान से परियाँ आ-आ
इतनी ख़ुशी विखेर गयीं
पर आज ….
एक कली जो खिलने को थी
कुछ सहमी सकुचाई भय में
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
===========================
फूल के संग-संग काँटे कुछ थे
कर्कश पत्थर से कठोर थे
प्रकृति की लीला -इन्हे चुने थे -
रक्षा को ! बन कवच खड़े थे
हाथ बढे जो छेड़ -छाड़ को
निज स्वभाव से चुभ-चुभ जाते
अतिशय कोई आतातायी
हानि भांप ये उन्हें भगाते
सावन सी हरियाली बगिया
फूल खिले हँस सभी लुभाते
कलरव करते कोई गाते-आते-जाते
‘भ्रमर’ भी गुंजन खुश हो आते
विश्व-कर्म रचना अति सुन्दर
गुल-गुलशन सब महक गए
पर आज …
एक कली जो खिलने को थी
कुछ सहमी सकुचाई भय में
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
=========================
भोली -भाली प्यारी छवि थी
पर फ़ैलाने को थी आतुर
फूलों की जी जान से प्यारी
अल्हड़ थी ना हुयी चतुर
स्वर्णिम लगती इस दुनिया में
चकाचौंध है लोहा – पीतल
पार्वती-संग है गंधक भी -
वदन जला दे ! गंगा शीतल
है प्रकाश तो अन्धकार भी
मोह -पाश माया – दानव हैं
स्नेह कहीं बहता है अविरल
दानव के पंजे में फँस कर
रोई वो चिल्लाई दम भर
प्रेम-दुहाई – सब- देव देवियाँ
पाँव पडी कातर नैनों से
एक-एक कर तितर वितर कर
पंखुड़ियाँ सब तोड़ दिए
कुचल -मसल के रक्त -अंग सब
वेशर्मी अति शूली पर थे टांग दिए
मानवता थी आज मर गयी
बस कलंक वे छोड़ गए
कानों में है क्रंदन अब तो…
एक कली जो खिलने को थी
कुछ सहमी सकुचाई भय में
पंखुड़ियाँ सब कुचल दिए
=========================
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ५ ‘
कुल्लू हिमाचल
भारत
11.45 A.M. -12.15 P.M.
08.06.2014
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Location:
Kullu, Himachal Pradesh, India
Monday, September 9, 2013
घुट-घुट मरती हैं बच्ची
इस रचना में एक अधिवक्ता की पत्नी का दर्द फूट पड़ा है ..................
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
जब जग जाहिर ये झूठ फरेबी
बार-बार लगते अभियोग
अंधी श्रद्धा भक्ति तुम्हारी
क्यों फंसते झूठे जप-जोग
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस .............
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
========================
जान बचा-ना न्याय दिला-ना
बातें प्रिय तेरी सच्ची
ये गरीब वो पैसे वाला
घुट-घुट मरती हैं बच्ची
रिश्ते-नाते मात-पिता सब
दर्द में उलझे मरते रोज
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस .............
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
================================
तेरे बीबी बच्चों को जब
धमकी, दिल दहलायेगी
क्या गवाह तुम बने रहोगे ?
टूट नहीं तुम जाओगे ?
न्याय की देवी को प्रियतम हे !
क्या सच्चाई कह पाओगे ?
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस .............
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
==============================
दस-दस झूठों में सच्चा 'इक'
घिसता नाक रगड़ता है
तू बहुमत-बहुमत करके क्यों
सच्चाई से चिढ़ता है
पोथी पत्रा नियम नीति को
सच्ची राह पे ले आओ
चलो नहीं हे ! खेती करते
कोर्ट कचहरी मत जाओ
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस .............
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
==============================
आसमान से गोले गिरते
धरती सब सहती जाती
धैर्य प्रेम ममता स्नेह ही
जल-जल हरियाली लाती
अतिशय प्रलय प्रकोप का कारक
दुष्ट निशाचर बन जाते
साधु -संत क्या पापी फिर तो
काल के गाल समा जाते
==========================
आँखें खोलो करो फैसला
ना जाओ लड़ने तुम केस .............
ना जइयो तुम कोर्ट हे !
मेरे दिल को लगा के ठेस ....
==========================
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
9.20 A.M.-10.40 A.M.
कुल्लू हिमाचल
08.09.2013
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Wednesday, September 4, 2013
घर ही उजाड़ दिया --
घर ही उजाड़ दिया
------------------------
मतलब की दुनिया है
मतलब के रिश्ते हैं
कौन कहे मेले में
आज कहीं अपने हैं
-----------------------
छोटे से पौधे को
बड़ा किया प्यार दिया
सींचा सम्हाल दिया
फूल दिया फल दिया
तूफ़ान आया जो
घर ही उजाड़ दिया
-----------------------
बिच्छू के बच्चों ने
बिच्छू को खा लिया
इधर – उधर, डंक लिये
'खा' लो सिखा दिया
------------------------
एक 'बाज' उड़ता था
'सौ' चिल्लाती थी
अधम को थका -डरा
बच कभी जातीं थीं
'सौ' बाज आज 'राज'
लाख उड़े चिड़िया भी
फंदा है फांस आज
'प्रेम' फंसी , जाती अकेली हैं
----------------------------------
नारी ने जना जिसे
उसने ही लूट लिया
प्रेम-पूत बंधन को
जड़ से उखाड़ दिया
घोंप छुरा पीछे से
कायर ने नाश किया
-----------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
12.35 पूर्वाह्न -01.01 पूर्वाह्न
कुल्लू हिमाचल
२ ५ .० ८ - १ ३
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Tuesday, August 27, 2013
धरती भी काँप गयी
धरती भी काँप गयी
———————-
उड़ान भरती चिड़िया
जलती दुनिया
आंच लग ही गयी
———————
दाढ़ी बाल बढ़ाये
साधू कहलाये
चोरी पकड़ा ही गयी
————————-
इतना बड़ा मेला
पंछी अकेला
डाल भी टूट गयी
———————-
खंडहर भी चीख उठा
रक्त-बीज बाज बना
धरती भी काँप गयी
————————
कानून सोया था
सपने में रोया था
देवी जी भांप गयीं
———————–
जल्लाद जाग उठा
गीता को बांच रहा
सुई आज थम गयी
————————
‘एक’ माँ रोई थी
‘एक ‘ आज रोएगी
अपना ही खोएगी
————————
———————-
उड़ान भरती चिड़िया
जलती दुनिया
आंच लग ही गयी
———————
दाढ़ी बाल बढ़ाये
साधू कहलाये
चोरी पकड़ा ही गयी
————————-
इतना बड़ा मेला
पंछी अकेला
डाल भी टूट गयी
———————-
खंडहर भी चीख उठा
रक्त-बीज बाज बना
धरती भी काँप गयी
————————
कानून सोया था
सपने में रोया था
देवी जी भांप गयीं
———————–
जल्लाद जाग उठा
गीता को बांच रहा
सुई आज थम गयी
————————
‘एक’ माँ रोई थी
‘एक ‘ आज रोएगी
अपना ही खोएगी
————————
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’५
१ २ . १ ५ पूर्वाह्न -1 २ . ३ ४ पूर्वाह्न
कुल्लू हिमाचल
२ ५ .० ८ – १ ३
१ २ . १ ५ पूर्वाह्न -1 २ . ३ ४ पूर्वाह्न
कुल्लू हिमाचल
२ ५ .० ८ – १ ३
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Location:
Banveer Kachh, Uttar Pradesh, India
Thursday, November 22, 2012
ताकतवर कुत्ते
हम लोगों की आँखों के सामने
पैदा हुए कुछ पिल्ले यहीं पले बढे
दूध मलाई खाए कार में चढ़े दुलराये
भौंकते-हमें डराते ताकतवर बन जाते हैं

( फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया)
पैदा हुए कुछ पिल्ले यहीं पले बढे
दूध मलाई खाए कार में चढ़े दुलराये
भौंकते-हमें डराते ताकतवर बन जाते हैं
( फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया)
फिर झुग्गी बस्ती में आये पेट दिखाए
दुम हिलाए पाँव चाटे दोस्त बन जाते हैं
आगे पीछे घूम घूम सूंघ सूंघ सारी ख़बरें
बड़े कुत्तों तक पहुंचाते हराम की खाते हैं
दिलदार ‘आम’ आदमी दिल बड़ा रखता है
दिल से कहता है दिल की सुनता है
अच्छाई ईमानदारी गुण ही बुनता है
भागता है छुपता है डर डर चलता है
पिल्ले ये शेर बने गरजे बढे जाते हैं
नोच खोंच दर्द दिए खून पिए जाते हैं
दर्द हरण सुई लगा ‘आम’ लोग जीते हैं
दर्द व्यथा दिल जला सारा गम पीते हैं
ताकतवर कुत्ता दिन-दिन बौराता है
छेड़ – नोंच ‘गले’ चढ़े बड़ा गुर्राता है
दुम दबी -सीधी खड़ी आँखें दिखाता है
पागल है-पागल है शोर तब मचता है
लाठी ले पीट तब मार ‘आम’ हटता है
‘आम’ लोग-लाठी में बड़ी ही ताकत है
लम्बी उमर ‘भ्रमर’ – शिव-शैव ताकत है
करुण नैन त्रिनेत्र जभी बन जाता है
घास फूस महल लोक-स्वर्ग भी जलाता है
प्रेम दया जोश होश सत्य न्याय भारी है
घृणा झूठ अहम् कुनीति सदा ही हारी है !
———————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४० पूर्वाह्न
रविवार -कुल्लू
१४.१०.2012
दुम हिलाए पाँव चाटे दोस्त बन जाते हैं
आगे पीछे घूम घूम सूंघ सूंघ सारी ख़बरें
बड़े कुत्तों तक पहुंचाते हराम की खाते हैं
दिलदार ‘आम’ आदमी दिल बड़ा रखता है
दिल से कहता है दिल की सुनता है
अच्छाई ईमानदारी गुण ही बुनता है
भागता है छुपता है डर डर चलता है
पिल्ले ये शेर बने गरजे बढे जाते हैं
नोच खोंच दर्द दिए खून पिए जाते हैं
दर्द हरण सुई लगा ‘आम’ लोग जीते हैं
दर्द व्यथा दिल जला सारा गम पीते हैं
ताकतवर कुत्ता दिन-दिन बौराता है
छेड़ – नोंच ‘गले’ चढ़े बड़ा गुर्राता है
दुम दबी -सीधी खड़ी आँखें दिखाता है
पागल है-पागल है शोर तब मचता है
लाठी ले पीट तब मार ‘आम’ हटता है
‘आम’ लोग-लाठी में बड़ी ही ताकत है
लम्बी उमर ‘भ्रमर’ – शिव-शैव ताकत है
करुण नैन त्रिनेत्र जभी बन जाता है
घास फूस महल लोक-स्वर्ग भी जलाता है
प्रेम दया जोश होश सत्य न्याय भारी है
घृणा झूठ अहम् कुनीति सदा ही हारी है !
———————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४० पूर्वाह्न
रविवार -कुल्लू
१४.१०.2012
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Monday, July 30, 2012
अन्ना जी तुम मूंछ बढाओ पूछ बढाओ
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हमारे सभी प्रिय मित्रों को .
.प्रभु से प्रार्थना है कि ये भाई बहन का पर्व यों ही सदा सदा के लिए अमर रहे प्रेम उमड़ता रहे और बहनों की सुरक्षा के लिए हम सब के मन में जोश द्विगुणित होता रहे ...
आइये बहनों को सदा खुश रखें हंसे हंसाएं प्रेम बरसायें ...तो आनंद और आये ...
जय श्री राधे
आप सब का 'भ्रमर'५
अन्ना जी तुम मूंछ बढाओ पूछ बढाओ
अगर न ऐ सी पंखे लगते
बड़े बड़े कुछ तम्बू लाओ बम्बू ला के
‘तेल’ पिला दो ‘ताकतवर’ आंधी तूफाँ जो झेल सकें
चमड़ी जिनकी जली पड़ी है एँड़ी जिनकी फटी पड़ी है
बारिस धूप में भिगा जला ना और सताओ मेरे भाई
दो रोटी को बहा पसीना उलझा कोई आँखें रोयीं
चाटुकार चमचे कुछ पीछे उनके घूम रहे हैं
चिकेन न दारु विरियानी जो दे पाओ तो
बड़े बड़े कुछ देग मंगाओ जंतर ‘मंतर’ मारे अन्ना
जादूगर सा डाल हाथ तुम भूख मिटाओ
नहीं हार-ना -ना दहेज़ ही तुम दे पाओगे
‘खिचड़ी’ खिला -खिला के प्यारे चलो दुलारो
पाँव पे गिर गिर उन्हें मनाओ भीड़ बढाओ
मूंछ बढाओ लम्बी-लम्बी पूछ बढाओ
सौ -सौ जन जब लटकें -ऐंठे–रूतबा पाओ
चले वानरी सेना पीछे भालू बंदर साथ
इसे उखाड़ो -उसे गिराओ कर सब सत्यानाश
तभी तुम्हारी ‘पूछ’ बढ़ेगी ‘तेल’ लिए सब आ जायेगे
महल तभी सब नंगे होंगे ‘जल’-जल अंतर पहचानेगे
गाँव शहर जा ‘फूट’ करा के ‘नेता’ बन छा जाओ
जय -जयकार करा लो अन्ना उनको गले मिलाओ
हर स्कूल या कालेज में जा अन्ना ‘टोपी’ बाँटो
राजनीति ‘चाणक्य’ सिखा दो ‘नेता’ अपने छांटो
कुछ वैकेन्सी चलो निकालो करो ‘हवाला’ ला लो
दुर्योधन धृतराष्ट्र वहां हैं मामा शकुनी बैठे
युधिष्ठिर ‘एक’ भीम करें क्या ‘जुए’ के खेल से निकलो
ये कल-युग है नहीं कृष्ण हैं चीर हरण करवा-ना !
कहें ‘भ्रमर’ अन्ना भगवन हे ! तीन नेत्र ले मूछ बढ़ा लो
पूछ बढ़ा लो ‘शक्ति’ समझो – दुर्गा -चंडी भी लाना !!
————————————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘५
कुल्लू यच पी
६.४०-७.३५ पूर्वाह्न
27.07.2012
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘५
कुल्लू यच पी
६.४०-७.३५ पूर्वाह्न
27.07.2012
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Tuesday, July 24, 2012
बूढा पेड़
बूढा पेड़
झर-झर झरता
ये पेड़ (महुआ का )
कितना मन-मोहक था
झर-झर झरता
ये पेड़ (महुआ का )
कितना मन-मोहक था
‘बड़ा’ प्यारा पेड़
‘अपने’ के अलावा
पराये का भी
प्यार पाता था
हरियाता था


फूल-फल-तेल
त्यौहार
मनाता था
थम चुका है
अब वो सिल-सिला
बचा बस शिकवा -गिला
फूल-फल ना के बराबर
मन कचोटता है ……
आखिर ऐसा क्यों होता है ??
सूखा जा रहा है
पत्ते शाखाएं हरी हैं
‘कुछ’ कुल्हाड़िया थामे
जमा लोग हंसते-हंसाते
वही – ‘अपने’- ‘पराये’
काँपता है......
ख़ुशी भी.....
ऊर्जा देगा अभी भी
‘बीज’ कुछ जड़ें पकड़ लिए हैं
‘पेड़’ बनेंगे कल
फिर ‘मुझ’ सा
‘दर्द’ समझेंगे !
आँखें बंद कर
धरती माँ को गले लगाये
झर-झर नीर बहाए
चूमने लगा !!
( सभी फोटो गूगल नेट से साभार लिया गया )
‘अपने’ के अलावा
पराये का भी
प्यार पाता था
हरियाता था
फूल-फल-तेल
त्यौहार
मनाता था
थम चुका है
अब वो सिल-सिला
बचा बस शिकवा -गिला
फूल-फल ना के बराबर
मन कचोटता है ……
आखिर ऐसा क्यों होता है ??
सूखा जा रहा है
पत्ते शाखाएं हरी हैं
‘कुछ’ कुल्हाड़िया थामे
जमा लोग हंसते-हंसाते
वही – ‘अपने’- ‘पराये’
काँपता है......
ख़ुशी भी.....
ऊर्जा देगा अभी भी
‘बीज’ कुछ जड़ें पकड़ लिए हैं
‘पेड़’ बनेंगे कल
फिर ‘मुझ’ सा
‘दर्द’ समझेंगे !
आँखें बंद कर
धरती माँ को गले लगाये
झर-झर नीर बहाए
चूमने लगा !!
( सभी फोटो गूगल नेट से साभार लिया गया )
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’५
कुल्लू यच पी २५.६.१२
८-८.३३ पूर्वाह्न
कुल्लू यच पी २५.६.१२
८-८.३३ पूर्वाह्न
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Friday, March 30, 2012
स्वाभिमान मर जाता है- जब हम बड़े होते हैं ?
गन्दी फर्श यत्र तत्र खड़े-पड़े लोग
इस भीड़ भरे मेले के झमेले में
धक्का खाती भटकती
वो महिला अपने दुध मुहे शिशु को
जर्जर आंचल से ढांके
बंदरिया सी गोद में चिपकाए -लटकाए
एक को अंगुली पकडाए
मुक्त किये-साथ दूजे को
हाथ पसारे नजरें मिलाये
दिल पिघला रही थी
घिघिया रही थी
बाबू बच्चा भूखा है …
भगवान भला करेगा
लोग ताकते घूरते डांटते बढ़ जाते
उस अबोध ने अनुकरण कर
माँ का साथ निभाया -मुस्कुराया
हाथ पसारा-मै अवाक ..
उसकी नजरों में गड़ गया
उसने तपाक से हाथ पीछे खींचा
क्रोध से बिसूरते ताका
मुझे पढ़ा -मुझे आँका
उसका स्वाभिमान जाग गया था
हमारी व्यवस्था पर करारा
तमाचा मार गया था
मेरा बड़प्पन अहम् भाग गया था
दो पैसे दे हम बाबू -विधाता बन जाते हैं
——————————————–
गन्दी राजनीति -गंदे लोग
कुनीति कुचक्र राजनीति के भंवर में
मै खो गया था
एक तरफ गोरे चिट्टे सजे लोग
लाल सेब से गाल
अंगूरी और अंगूर का रस लेते
गर्म तवे पर रोटी सेंकना
उस और ये भूख मिटना-बिकना-बेंचना
स्वाभिमान मर जाता है-
जब हम बड़े होते हैं ?
बड़ी वाली बेटी माँ हाथ पसारे
किसी की जंघा किसी का कन्धा दबाते
अब भी गिड़ गिड़ा रही थी
हम अपना विकास- मौलिक अधिकार
राज्य सभा -लोकसभा -प्रजातंत्र
उसकी आँखों में देख
रो पड़े थे …….
आँखों से झर पड़े आंसू जैसे
इस मैले कुचैले तंत्र को साफ़ करने का
असफल प्रयास कर रहे हों
——————————-
जम्मू बस स्टैंड
७-७.२० पूर्वाह्न
२२.०३.२०१२
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
इस भीड़ भरे मेले के झमेले में
धक्का खाती भटकती
वो महिला अपने दुध मुहे शिशु को
जर्जर आंचल से ढांके
बंदरिया सी गोद में चिपकाए -लटकाए
एक को अंगुली पकडाए
मुक्त किये-साथ दूजे को
हाथ पसारे नजरें मिलाये
दिल पिघला रही थी
घिघिया रही थी
बाबू बच्चा भूखा है …
भगवान भला करेगा
लोग ताकते घूरते डांटते बढ़ जाते
उस अबोध ने अनुकरण कर
माँ का साथ निभाया -मुस्कुराया
हाथ पसारा-मै अवाक ..
उसकी नजरों में गड़ गया
उसने तपाक से हाथ पीछे खींचा
क्रोध से बिसूरते ताका
मुझे पढ़ा -मुझे आँका
उसका स्वाभिमान जाग गया था
हमारी व्यवस्था पर करारा
तमाचा मार गया था
मेरा बड़प्पन अहम् भाग गया था
दो पैसे दे हम बाबू -विधाता बन जाते हैं
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गन्दी राजनीति -गंदे लोग
कुनीति कुचक्र राजनीति के भंवर में
मै खो गया था
एक तरफ गोरे चिट्टे सजे लोग
लाल सेब से गाल
अंगूरी और अंगूर का रस लेते
गर्म तवे पर रोटी सेंकना
उस और ये भूख मिटना-बिकना-बेंचना
स्वाभिमान मर जाता है-
जब हम बड़े होते हैं ?
बड़ी वाली बेटी माँ हाथ पसारे
किसी की जंघा किसी का कन्धा दबाते
अब भी गिड़ गिड़ा रही थी
हम अपना विकास- मौलिक अधिकार
राज्य सभा -लोकसभा -प्रजातंत्र
उसकी आँखों में देख
रो पड़े थे …….
आँखों से झर पड़े आंसू जैसे
इस मैले कुचैले तंत्र को साफ़ करने का
असफल प्रयास कर रहे हों
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जम्मू बस स्टैंड
७-७.२० पूर्वाह्न
२२.०३.२०१२
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
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