BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

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Tuesday, February 21, 2023

नारी तो है कुल की देवी

नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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जप से श्रम से तप से गढ़ती
फिर एक जीवन नई कहानी
रक्त से अपने सींच भी रही
प्रेम प्यार भी आंखों पानी
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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पग पग कष्ट सहे कल्याणी
धूप छांव से हमे बचाती
भरे धनात्मक ऊर्जा हम में
जादू टोना सदा बचाती
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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बिटिया लक्ष्मी घर आंगन की
खुशी हंसी खुश्बू कविता है
घर आंगन संसार की अपनी
प्राण प्रतिष्ठा लाज दया है
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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इस कुल उस कुल की दीपक है
अंधियारे से सदा बचाती
ज्ञान की देवी प्रेम की मूरत
प्रेम प्यार सब यही सिखाती
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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गंगा सीता लक्ष्मी दुर्गा
पूत पावनी रूप अनेक
श्रद्धा पूजा काम कामिनी
भक्ति शक्ति सब कुछ ये

नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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आओ सीखें इनसे हम भी
प्रेम _मान दे इनको पूजें
जड़ से चेतन बन जाएं हम
भवसागर में तरना सीखें
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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साज यही श्रृंगार यही है
वीणा की झंकार यही है
नृत्य गीत है यही अप्सरा
प्रकृति सृष्टि आधार यही
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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यही है श्रद्धा निद्रा अपनी
शांति यही सुख की है कोष
यही है चन्दा दर्पण कीरति
गुण देखो हे ना कुछ दोष
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश,
भारत।
22/02/2023
4.00_5.00 पूर्वाह्न




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 29, 2022

नारी का श्रृंगार तो पति है

नारी का श्रृंगार तो पति है
पति पर जान लुटाए

एक एक गुण देख सोचकर
कली फूल सी खिलती जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*****
प्रेम के वशीभूत है नारी
पति परमेश्वर पर वारी
व्रत संकल्प अडिग कष्टों से
सौ सौ जन्म ले शिव को पाए
कर सेवा पूजा श्रद्धा से
फूली नहीं समाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*******
चाहत से मुस्काए गजरा
बल पौरुष से केश सजे
नेह प्रेम पर माथ की बिंदिया
झूम झूम नव गीत रचे
नैनों से पति के बतिया के
हहर हहर लव चूमे जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
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जहां समर्पण प्यार साथ है
नारी अद्भुत बलशाली
नही कठिन कुछ काज है जग में
सीता सावित्री या अपनी गौरी काली
मंगल सूत्र गले में धारे
मंगल लक्ष्मी करती जाये
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
निज बल अभिमान चूरकर
चरण वंदना में रत रहती
हो अथाह सागर भी घर में
त्याग _ प्रेम दिल लक्ष्मी रहती




विष्णु पालते जग को सारे
लक्ष्मी ममता ही बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******



पति के प्रेम की रची मेंहदी
देख भाग्य मुस्काती मन में
वहीं अंगूठी संकल्पों की
रहे चेताती सात वचन की
दंभ द्वेष पाखण्ड व छल से
दूर खड़ी, अमृत बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
गौरी लक्ष्मी सीता पाए
सरस्वती का साथ निभाए
पुरुष भी क्यों ना देव कहाए??
क्यों ना वो जग पूजा जाए?
प्रकृति शक्ति की पूजा करके
निज गौरव नारी को माने
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत। 29.04.2022
3.33_4.33 पूर्वाह्न

 ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, April 25, 2022

जो मुस्का दो खिल जाए मन



जो मुस्का दो खिल जाये मन
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खिला खिला सा चेहरा  तेरा
जैसे लाल गुलाब
मादक गंध जकड़ मन लेती
जन्नत है आफताब








बल खाती कटि सांप लोटता
हिय! सागर-उन्माद
डूबूं अगर तो पाऊँ मोती
खतरे हैं बेहिसाब
नैन कंटीले भंवर बड़ी है
गहरी झील अथाह
कौन पार पाया मायावी
फंसे मोह के पाश
जुल्फ घनेरे खो जाता मै
बदहवाश वियावान
थाम लो दामन मुझे बचा लो
होके जरा मेहरबान
नैन मिले तो चमके बिजली
बुत आ जाए प्राण
जो मुस्का दो खिल जाए मन
मरू में आये जान
गुल-गुलशन हरियाली आये
चमन में आये बहार
प्रेम में शक्ति अति प्रियतम हे!
जाने सारा जहान

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 1, 2022

भरा अथाह नीर नैनों में


मै रोज तकूं उस पार

हे प्रियतम कहां गए



छोड़ हमारा हाथ

अरे तुम सात समुंदर पार

न जाने कहां गए...

नैन में चलते हैं चलचित्र

छोड़ याराना प्यारे मित्र

न जाने कहां गए......

एकाकी जीवन अब मेरा

सूखी जैसी रेत

भरा अथाह नीर नैनों में

बंजर जैसे खेत

वो हसीन पल सपने सारे

मौन जिऊं गिन दिन में तारे

न जाने कहां गए....

हरियाली सावन बादल सब

मुझे चिढ़ाते जाते रोज

सूरज से नित करूं प्रार्थना

नही कभी वे पाते खोज

रोज उकेरूं लहर मिटा दे

चांद चकोरा के वे किस्से

न जाने कहां गए....

तड़प उठूं मैं मीन सरीखी

यादों का जब खुले पिटारा

डाल हाथ इस सागर तीरे

जब हम फिरते ज्यूं बंजारा

खो गए प्रेम के गीत

बांसुरी पायल की धुन मीत

न जाने कहां गए.....

…...............

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश , भारत।


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, August 21, 2021

भैया का गहना है बहना

बहना मेरी दूर पड़ा मै दिल के तू है पास
अभी बोल देगी तू "भैया" सदा लगी है आस 



 मुन्नी -गुडिया प्यारी मेरी तू है मेरा खिलौना 
मै मुन्ना-पप्पू-बबलू हूँ बिन तेरे मेरा क्या होना ! -
 तू ही मेरी सखी सहेली कितना खेल खिलाया कभी -कभी मेरी नाक पकड़ के तूने बहुत चिढाया ! 
थाली में तू अपना हिस्सा चोरी से था डाल खिलाया
जान से प्यारी मेरी बहना भैया का गहना है बहना !! 

जब एकाकी मै होता हूँ सजी थाल तेरी वो दिखती
चन्दन जभी लगाती थी तू पूजा- मेरी आरती- करती ! 


रक्षा -बंधन और मिठाई दस-दस पकवान पकाती थी 
 बाँध दिया बंधन से तूने ये अटूट रक्षा जो करता 
मेरी बहना सदा निडर हो ख़ुशी रहे दिल हर पल कहता
जहाँ रहे तू जिस बगिया में हरी-भरी हो फूल खिले हों
 ऐसे ही ये प्यारा बंधन सब मन में हो -गले लगे हों 
 तू गंगा गोदावरी सीता तू पवित्र मेरी पावन गीता 
तेरी राखी आई पाया चूम इसे मै गले लगाया 
 कितने दृश्य उभर आये रे आँख बंद कर हूँ मै बैठा 
जैसे तू है बांधे राखी मन -सपने-उड़ता मै "पाखी" 
 तेरी रक्षा का प्रण बहना रग-रग में राखी दौडाई 
और नहीं लिख पाऊँ बहना आँख छलक मेरी भर आई 
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश, भारत

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं