BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Tuesday, October 22, 2024

श्री राम चरित मानस अमृत वाणी_49

श्री राम चरित मानस अमृतवाणी _49
आज ये मानस पाठ किया
कृपया नित्य सुबह सुनें मानस पाठ , मित्रों आप से प्रोत्साहन और सुझाव मिलता रहे
जय श्री राम 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, August 14, 2024

वन्दे मातरम्

जय हिंद, जय भारत , 

स्वतंत्रता दिवस पर आप सभी प्रिय मित्रों  को ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं और बधाई, सभी शहीदों को कोटि कोटि नमन, हमारी आन बान शान हमारे देश के रक्षक वीर जवानों को सेना को फौज को सादर नमन
   आइए एक बनें , नेक बनें, अच्छाइयों का आजीवन प्रचार प्रसार करते चलें , वीरता , साहस अपने अंदर हर समय भरें एक दूजे की सहायता करें
     जय हिंद जय भारत
         सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
            Bhramar Ka Jharokha 
https://youtube.com/@surendrakumarshuklabhramar5686?si=1ISX4uaPTYgM2Gdkवन्दे मातरम सुजलाम सुफलाम


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, March 2, 2024

बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है

मित्रों ये गीत गुनगुनाने की कोशिश मैंने किया है
चैनल को आप सब का प्यार मिले

बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 14, 2023

जब तक दम है आओ खेलें

जी, कितने आए कितने चले गए , मोह माया है सब , 
*********

ये तेरा है ये मेरा है
लड़ते रहे बनी ना बात,
खून जिस्म में कमा के लाते
फिर भी सुनते सौ सौ बात
मुंह फेरे सब अपनी गाते
अपनी ढपली अपना राग,
बूढ़ा पेड़ नए तरुवर से
उलझ कहां टिकता दमदार,
पानी खाद तो मिलना दूभर
बने खोखला गिरती डाल,
कुछ है हरा फूल फल गिरते
आंधी कभी, कभी वज्रपात,
पेड़ जीव या मानव तन हो,
मिलती जुलती एक कहानी,
आज खंडहर रोता कहता
एक थे राजा एक थी रानी,
जब तक दम है आओ खेलें
बोलें डोलें हंस मुस्का लें,
वे अबोध हैं क्रोध छोड़ दो
माफ करो कुछ बनेगी बात,
आग लगी है हवन सुगंधित
चाहे जितना कर पवित्र ले,

घी डालो या चंदन खुशबू,
पानी डालो या फिर पीटो, 
एक दिन हो जाना है राख, 
यही तो है सब की औकात.........

सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश।



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, March 9, 2023

आज राधा ने की बरजोरी


मुरली की हर तान -२ सुनाये -नाच दिखाए ना बच पाए श्याम
आज -२ राधा ने की बरजोरी -चलो गुइयाँ देखन को होरी ..
 

बड़ा अजूबा लगता प्यारा -क्यों हारा -जसुदा मैया का दुलारा
सजा हुआ- हम तक ना पंहुचा -फंसा जाल में- क्यों ना हमें पुकारा
दही बड़ा पकवान मिठाई सूख  रहा ,गायों ने ना दूध दिया
अभी रहो चुप -पिचकारी ना दबे जरा -क्या देखे आँखें मूँद लिया
लचकन कैसी -२ कमर की देखो -हाथ में कैसी चूड़ी
पकड़ कलाई ली राधा की -देखो सीना जोरी
चलो गुइयाँ देखन को होरी
आज -२ राधा ने की बरजोरी -चलो गुइयाँ देखन को होरी

फाग खेलता लगे कबड्डी-रंगा  जमीं को सारा
कभी लिपटता आँखें मलता -राधा के संग –अरे !! फिसलता जाता
श्याम रंग के बदरा विच -ज्यों -दामिनी दमके- दांत चमकता सारा
कमल खिला ज्यों –इन्द्रधनुष- मुख मंडल शोभे- चमके आँख का तारा
 देख करे क्या 2 -आज पकड़ेंगे -हम भी चोरी  
नशा चढ़ा क्या -२- बैठे ताके -भौंरा जैसे गुपचुप झांके
आज -२ राधा ने की बरजोरी -चलो गुइयाँ देखन को होरी



शर्म हया क्या बेंचा उसने -खुले अंग हैं फटे वस्त्र  - या समझ न पाए
मदमाती यौवन से जैसे कली फूटती देखे दुनिया संभल न पाए
मैया गैया गाँव भुलाये- इत उत चितए- कान्हा -को भी याद न आये
लट्ठ उठाये भी राधा के- गले वो लगता -ढोल मजीरा हाँथो से क्या ताल बजाये
देख मजा -२ लेंगे हम सखियाँ -खेलेंगे न होली -
छुप जा देखो चली आ रही ग्वाल बाल की टोली
संभलती  ना -अब भी ये छोरी
आज -२ राधा ने की बरजोरी -चलो गुइयाँ देखन को होरी

धड़कन मन की बढती जाती मन व्याकुल है -रंग हाँथ से गिर न जाये
खेल देख अब -चढ़े नशा कुछ -जोश चढ़े अब छुपा कहाँ न मिलता हाय 
चलो रगड़ें अब रंग गुलाल -दिलाएं याद -भले हो ‘कुछ’ को आज मलाल 
चूम लें -लिख दें -मन की हाल -गुलाबी होंठों से दें छाप 
रात भर खेलेंगे-२ हम फाग -खोलकर दिल नाचेंगे आज
भुला सकेगा ना कान्हा रे -मथुरा की ये होली
आज -२ राधा ने की बरजोरी -चलो गुइयाँ देखन को होरी

मुरली की हर तान -२ सुनाये -नाच दिखाए ना बच पाए श्याम
आज -२ राधा ने की बरजोरी,,

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
अपने ब्लॉग भ्रमर का दर्द और दर्पण से



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, March 7, 2023

नाचे मोरी नथुनिया

चली फागुन की ठंडी बयार हो
मनवा झूमे सजनवा
मोरे जियरा में उठेला हिलोर हो
नाचे मोरी नथुनिया
------

अमवा बौराया मनवा भी फाग हो
होंठ कांपे हैं गाए कोयलिया
लाल गुलाबी धानी चूनर बेकार हो
बिन सजना केवल अमावस अंधेरिया
चली फागुन की....
---
ढोल मजीरा मृदंग बजे है
आवा आवा सजन अंगनाई
मोरे जियरा में उठेला तूफान हो
कान तरसें सुनइ शहनाई
चली फागुन की...
---
हर आहट दौडूं घर बाहर
सुर्ख चेहरा पे आंखे पथराई
लाल गाल टेसू से टपके गुलाल
सिहरे कांपे बदन बदरी जैसे है छाई
चली फागुन की...
---



दहके होली अगन जरे मोरा बदन
चूड़ी कंगना ना तनिको भाए
रंग बरसा है तर हुआ सारा बदन
आए आए सजन घर आए।
चली फागुन की .. 
---

चमक गई बिंदिया कुंडल भी चूमे
चमक नैनों में आई सजनिया
नथिया औ बेसर नाचे रे झूमे
सजन गदगद मिली दुल्हनिया
चली फागुन की ठंडी....



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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़ भारत।
7.3.2023
फोटो साभार गूगल नेट से 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, February 25, 2023

कौन हो तुम प्रेयसी

कौन हो तुम प्रेयसी ?
कल्पना, ख़ुशी या गम
सोचता हूँ मुस्काता हूँ,
हँसता हूँ, गाता हूँ ,
गुनगुनाता हूँ
मन के 'पर' लग जाते हैं

घुंघराली जुल्फें
चाँद सा चेहरा
कंटीले कजरारे नैन
झील सी आँखों के प्रहरी-
देवदार, सुगन्धित काया
मेनका-कामिनी,
गज गामिनी
मयूरी सावन की घटा
सुनहरी छटा
इंद्रधनुष , कंचन काया
चित चोर ?
अप्सरा , बदली, बिजली
गर्जना, वर्जना
या कुछ और ?
निशा का गहन अन्धकार
या स्वर्णिम भोर ?
कमल के पत्तों पर ओस
आंसू, ख्वाबों की परी सी ..
छूने जाऊं तो
सब बिखर जाता है
मृग तृष्णा सा !
वेदना विरह भीगी पलकें
चातक की चन्दा
ज्वार- भाटा
स्वाति नक्षत्र
मुंह खोले सीपी सा
मोती की आस
तन्हाई पास
उलझ जाता हूँ -भंवर में
भवसागर में
पतवार पाने को !
जिंदगी की प्यास
मजबूर किये रहती है
जीने को ...
पीने को ..हलाहल
मृग -मरीचिका सा
भरमाया फिरता हूँ
दिन में तारे नजर आते हैं
बदहवाश अधखुली आँखें
बंद जुबान -निढाल -
सो जाता हूँ -खो जाता हूँ
दादी की परी कथाओं में
गुल-गुलशन-बहार में
खिलती कलियाँ लहराते फूल
दिल मोह लेते हैं
उस 'फूल' में
मेरा मन रम जाता है
छूने बढ़ता हूँ
और सपना टूट जाता है
--------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, February 21, 2023

नारी तो है कुल की देवी

नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
__

_
जप से श्रम से तप से गढ़ती
फिर एक जीवन नई कहानी
रक्त से अपने सींच भी रही
प्रेम प्यार भी आंखों पानी
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
___
पग पग कष्ट सहे कल्याणी
धूप छांव से हमे बचाती
भरे धनात्मक ऊर्जा हम में
जादू टोना सदा बचाती
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
____
बिटिया लक्ष्मी घर आंगन की
खुशी हंसी खुश्बू कविता है
घर आंगन संसार की अपनी
प्राण प्रतिष्ठा लाज दया है
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
_____
इस कुल उस कुल की दीपक है
अंधियारे से सदा बचाती
ज्ञान की देवी प्रेम की मूरत
प्रेम प्यार सब यही सिखाती
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
_____
गंगा सीता लक्ष्मी दुर्गा
पूत पावनी रूप अनेक
श्रद्धा पूजा काम कामिनी
भक्ति शक्ति सब कुछ ये

नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
_____
आओ सीखें इनसे हम भी
प्रेम _मान दे इनको पूजें
जड़ से चेतन बन जाएं हम
भवसागर में तरना सीखें
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
_______
साज यही श्रृंगार यही है
वीणा की झंकार यही है
नृत्य गीत है यही अप्सरा
प्रकृति सृष्टि आधार यही
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
______



यही है श्रद्धा निद्रा अपनी
शांति यही सुख की है कोष
यही है चन्दा दर्पण कीरति
गुण देखो हे ना कुछ दोष
नारी नारी नही समझ मन
नारी तो है कुल की देवी
______
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश,
भारत।
22/02/2023
4.00_5.00 पूर्वाह्न




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, February 19, 2023

नेता जी एक दर्पण ले लो


नेता जी एक दर्पण ले लो
________
राजनीति भी अजब गजब है
काले लाल गुलाबी रंग
निशा अमावस्या ही भाती
वक्री चाल सदा बेढंग
जिस थाली में संग खाते थे
छेद किए कल चल गए
नेता जी एक दर्पण ले लो
बीच बीच में देखो रूप।


____
धर्म ग्रंथ मन्दिर कल पूजे
बने बेहया बिसर गए
राम चरित मानस अमृत घट
राहु केतु अब जहर लगे
नेता जी एक दर्पण ले लो
बीच बीच में देखो रूप।
____
कोई आग धधकाए फिरता
घी कुछ उसमे छोड़ रहे
कुछ गरीब बन जाते आहुति
रोटी वे अपनी सेंक रहे
नेता जी एक दर्पण ले लो
बीच बीच में देखो रूप।
_____
बहती विकास की गंगा देखो
कीचड़ में वे लोट रहे
धूल झोंक सब की आंखों में
लूट खसोट ही मगन रहें
नेता जी एक दर्पण ले लो
बीच बीच में देखो रूप।
_____
जल गई रस्सी ऐंठन वैसी
दाब लगे हो जाए चूर
उड़ोगे कब तक आसमान में
चारा धरती रखा हुजूर

नेता जी एक दर्पण ले लो
बीच बीच में देखो रूप।
_____
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
19.02.2023
उत्तर प्रदेश भारत।




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, January 20, 2023

मौनी अमावस्या


देर अचानक रात्रि दौड़ के
बदरा घिर घिर आए 
शांत स्निग्ध गंगा पावन जल
अमृत घट बूंदे बरसाए।





गंगा की लहरें उठ धायीं
नमन करे उठ जागे लोग
हलचल मेला में थी भारी
मौन ध्यान रत सारे लोग

सजी धजी गंगा की घाटी
देश विदेश से जुटे हैं लोग
भर आस्था विश्वास से भारी
पुण्य कमाने आए लोग

मौन हुए मौनी अमावस्या
डुबकी लोग लगाएं
जन्म जन्म के भव बन्धन से
तर के प्रभु को पाएं।

स्नान दान कर हुए प्रफुल्लित
खुशियां जग फैलाएं
खुशी हुए परिवेश में 
जाके, धारा विकास की लाएं।

रोग दोष ईर्ष्या विद्वेष से
मुक्त , भजन सब गाते
गंगा सा पावन मन लेकर
भारत का परचम लहराते।

निर्मल पावन लहर सुनहरी
सूर्य देव जब निकलें
जय जय जय जय के
नारों से गूंजे प्रयाग की नगरी।

मथुरा काशी और अयोध्या
नगरी नगरी जन मन आए
कर शाही स्नान मोक्ष के
द्वार पे जाके विष्णु पाए।


धर्म धुरंधर योगी जोगी
संत साधु मुनि ज्ञानी
निज आंखो में भर लो आओ
छवि भारत की अमिट कहानी।

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश 
भारत।
21.01.2023



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, January 14, 2023

मकर संक्रान्ति


  मकर संक्रांति की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी मित्र मंडली को, जय जय श्री राधे।
****
समरसता जन पर्व मकर संक्रान्ति
भरती जन जन में अनुपम कान्ति
उल्लास माघ गंगा पावन जल
प्रमुदित दौड़े ले सब दल बल।
***
बाल वृद्ध नारी फूले मन
फूली सरसों पीली चूनर रंग
धरती नभ बादल ओस सुहावन
घना कुहासा अति मन भावन।
****
लादे गठरी चल रहे कोस भर
पैदल भीड़ गरीब किसान 
रोगी जोगी राजा महान
खिचड़ी में लेने पुण्य स्नान।
***
रंग बिरंगे सतरंगी परिधान
नथिया झुलनी टीका लटकन
कंगना चूड़ी मुंदरी झांझन
बिछिया पायल करधनी पहन
****
चमक कैमरे की हर ओर
कैद करें छवि वो चितचोर
भजन कीर्तन योगी जोगी
पुण्य को दृढ़ आज हत भोगी।
*****
संगम है भारत का संगम
हर दिशा क्षेत्र के सब जनगण
जुट गए भरेंगे पुण्यार्जन
स्नान दान तिल गुड़ मिठास।
****
चूड़ा दही औ लेंडुआ तिलकुट
गचक पापड़ी खाते मिल 
जुट
मूंगफली मेवा मिष्ठान
अद्भुत छवि भारत महान।
****
कहीं उड़ी खूब तो कटी कहीं हैं
धूल धूसरित दबी पड़ी है
छवि धूमिल कुछ संवर चली हैं
जीवन पतंग की डोर कहीं है।
****
घर घर तिल की बनी मिठाई
सोंधी गुड़ की खुश्बू आई
कहीं लोहड़ी पोंगल खिचड़ी
जोड़ दिलों को जाती खिचड़ी ।
******
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
उत्तर प्रदेश
भारत।




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, December 9, 2022

फूल बन गई कोमल कोमल


गदरायी हूं बंद कली हूं
मादक गंध बढ़ी ही जाती
आज बंद हूं मै परदे में
बड़ी सुरक्षित घुटन भी कुछ है
कैद कैद जैसे फंदे में
जकड़ी हूं स्वच्छंद नही हूं
आतुर हूं देखूं कुछ दुनिया
आकुल व्याकुल कैसी दुनिया?
______
आज खिली हूं प्रकृति सुहानी
नेह भरी हूं नैनन पानी
सूरज चंदा तारे प्यारे पंछी उड़ते
अदभुत दुनिया अजब नजारे
मलयानिल की पवन छू रही
सिहरन गात है न्यारी प्यारी
खुशकिस्मत हूं खुशी हैं लोग
नैना भंवरे मुझे निहारें
आकुल व्याकुल क्या होगा कल?
______
फूल बन गई कोमल कोमल
पंखुड़ियां रंगीन छुएं दिल
भंवरे अब मंडराते सारे
जन्नत परी जान भी वारें
कांटे भी सिहरन सिसकन भी
हवा विरोधी जब जब चलती
सुख या दुख कुछ समझ न पाऊं
मनहर मन खुश्बू भर जाऊं
आकुल व्याकुल खिली ही जाऊं।
_______
कभी शीश पर जटा कभी मैं
दूल्हा दुल्हन खूब सजाऊं
गुल गुलाब केतकी मनोहर
कामिनी चंपा मधु मालती
रात की रानी रजनी गंधा
नीम चमेली डोलन चम्पा
अगणित नाम से मैं इतराऊं
स्नेह मिले फूलूं इतराऊं
आकुल व्याकुल अनहोनी डर!
______
कभी तोड़ते लेते खुश्बू
मसल कुचल देते हैं फेंक
रंग बिरंगा सारा सपना
काया मिलती मिट्टी धूल
सबरस यौवन मधु मकरंद
झूठी दुनिया कड़वा सच
पंच तत्व में मिलती काया
सच है ये ही जीवन मूल
उगा पेड़ फिर खिली कली
मुस्काते फिर झूम चली।
_____
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश 
भारत
4.50 _5.14 मध्याह्न














दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, September 13, 2022

भारत मां की बिंदी हिन्दी


भारत माँ की बिंदी प्यारी अपनी हिन्दी हिंदी (ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में सार्थक हो सकती है)…


भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी
हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में सार्थक हो सकती है
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मस्तक राजे ताज सभी भाषा की हिन्दी
ज्ञान दायिनी कोष बड़ा समृद्ध विशाल है
संस्कृत उर्दू सभी समेटे अजब ताल है
दूजी भाषा घुलती हिंदी दिल विशाल है
लिए हजारों भाषा करती कदम ताल है
जन - मन जोड़े भौगोलिक सीमा को बांधे
पवन सरीखी परचम लहराती है हिंदी
भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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१ १  स्वर तो ३ ३ व्यंजन 52 अक्षर अजब व्याकरण
गिरना उठना चलना सब सिखला बैठी अन्तःमन
कभी कंठ से कभी चोंच से होंठ कभी छू आती हिन्दी
सुर की मलिका  सात सुरों गा, दिल अपने बस जाती हिन्दी
उत्तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम ,  दसों दिशा लहराती हिन्दी
आदिकाल से रूप अनेकों धर भाषा संग आती हिन्दी
गाँव-गाँव की जन-जन की अपनी भाषा बस जाती हिन्दी
उन्हें मनाती मित्र बनाती चिट्ठी -चिटठा लिखवाती हिन्दी

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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शासन भी जागा है अब तो रोजगार दिलवाती हिन्दी
पुस्तक और परीक्षा हिन्दी  साक्षात्कार करवाती हिन्दी
अभियन्ता तकनीक लिए मंगल शनि जा आती हिन्दी
शिक्षण संस्था संस्कृति अपनी दिल में पैठ बनाती हिन्दी
आँख-मिचौली सुप्रभात से बाल-ग्वाल से पुष्प सरीखी
न्यारी-प्यारी महक चली ये गली-गली है बड़ी दुलारी
नमो -नमः तो कभी नमस्ते झुके कभी नत-मस्तक होती
सिर ऊँचा कर गर्व भरी परचम अपना लहराती हिन्दी

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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गुड़ से मीठी शहद भरी जिह्वा -जिह्वा बस जाती हिन्दी
मातु-कृपा है श्री भी संग में रचे विश्वकर्मा सी हिन्दी
गुरु-शिष्य हों माताश्री या पिताश्री  से सीखे हिन्दी
क्रीड़ा करती उन्हें पढ़ाती विश्व-गुरु बन जाती हिन्दी
लौहपथगामिनी छुक-छुक छुक-छुक भक-भक अड्डा जाती
मेघ-दूत बन दिल की पाती प्रियतम को पहुंचाती
प्रिय प्रियतम का तार जोड़ मन दिल के गीत गवाती हिन्दी
सखी-सहेली छवि प्यारी ले सब का नेह जुटाती हिन्दी

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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इसकी महिमा न्यारी प्यारी बड़ी सुकोमल दृढ है हिन्दी
पारिजात सी कामधेनु सी मनवांछित दे जाती हिन्दी
छंद काव्य या ग्रन्थ सभी हम आओ रच डालें हिन्दी
प्रेम शान्ति हो कूटनीति या राजनीति की चिट्ठी पाती
हिंदी रस में डुबा लो प्यारे जन-कल्याण ये कर आती
आओ वीरों सभी सपूतों बेटी-बिदुषी ले के हिन्दी
साँसें  हिंदी जान है हिन्दी वतन अरे ! पहचान है हिन्दी

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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मान है ये सम्मान है येभारत माता की बिन्दी हिन्दी
अलंकार है रस-छंदों की गागर-सागर- मंथन हिन्दी
रमी प्रकृति में हमें झुलाती सावन-मनभावन सी हिन्दी
कजरी-तीज,  पर्व संग  सारे चोला -दामन साथ है हिन्दी
आओ रंग-विरंगे अपने पुष्प सभी हम गूंथ-गूंथ के माला  एक बनायें
माँ भारति का भाल सजा के जोड़ हाथ सब नत-मस्तक हो जाएँ
माँ का लें  आशीष नेक और एक बनें हम हिन्दी से जुड़ जाएँ
आओ भरें उड़ान परिन्दे  सा पुलकित हो परचम हिन्दी लहरायें

भारत माँ की बिंदी  प्यारी अपनी हिन्दी  ...........
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
3.15 A.M. -4.49 A.M.
भारत




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, August 15, 2022

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रिय स्नेही स्वजन,

देश के 75वें आज़ादी के अमृत महोत्सव पर आप व आप के परिवार तथा सभी इष्ट मित्रगण  को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई






आजादी की सुखद अनुभूति से प्यारी कोई और अनुभूति नहीं. आप ने सदा ये अनुभव किया होगा कि आप के पास धन सम्पदा सब कुछ हो लेकिन आप को यदि किसी प्रकार की आजादी न हो तो सब बेकार लगता है , लेकिन अपने देश की आजादी की बात तो निराली है कितने त्याग और बलिदान के पश्चात ये आजादी अपने हाथ आई गुलामी की बेड़ियों से देश को मुक्ति मिली थी बोलने का हक मिला । अब अपना सारा ध्यान अपने कर्तव्य कौशल खोज ज्ञान विज्ञान पर केंद्रित करना है, देश के  विकास के लिए हर एक भारत वासी को अपना पूर्ण योगदान देना है विकास की प्रतिस्पर्धा में शामिल हों।

आज भारत अपनी विविध संस्कृति एवं संस्कारों को समेटे हिंदुस्तान विश्व पटल पर नित नए आयाम स्थापित कर रहा है... अपना प्यारा तिरंगा यूं ही शोभायमान होकर आजादी के साथ फहराता रहे... आइए हम सब मिलकर संकल्प लें कि राष्ट्रवादी सोच के साथ राष्ट्रहित में अपना एक एक कदम बढ़ाएंगे... बढ़ते जाएंगे, आओ नेक बनें एक बनें.

 दें सलामी इस तिरंगे को जिससे तेरी शान है


सर हमेशा ऊंचा रखना इसका


जब तक तुझमें जान है।


स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई


जय हिन्द!!! जय भारत। वन्दे मातरम्।🙏🙏
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
कवि लेखक साहित्यकार ब्लागर ।
भारत।



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, June 3, 2022

ये आनन्द चीज क्या कैसा

ये आनन्द चीज क्या कैसा क्या इसकी परिभाषा 
भाये इसको कौन कहाँ पर कौन इसे है पाता?

 उलझन बेसब्री में मानव जो सुकून कुछ पाए शान्ति अगर वो पा ले पल भर जी आनंद समाये,

 सूनी कोख मरुस्थल सी माँ पल-पल घुट-घुट जो मरती,
 शिशु का रोना हंसना उर भर क्रीड़ानंद वो करती, 

 रंक कहीं भूखा व्याकुल जो क्षुधा पिपासा जाए, देता जो प्रभु सम वो लागे जी आनंद समाये,

 पैमाना धन का है अद्भुत क्या कुछ किसे बनाये, कहीं अभागन बेटी जन्मे कुछ लक्ष्मी कहलायें,

 प्रीति प्रेम सम्मान अगर जीवन भर बेटी पाए 
हो आनंद संग बेटी के मात -पिता हरषाए ।

गोरा वर गोरी को खोजे काला कोई गोरी,
 गुणी छोड़ कुछ वर्ण रंग धन बड़े यहाँ हत भोगी।

प्रेम कहीं कुछ शीर्ष चढ़े  तो नीच ऊँच ना रंग हो, आनंद जमाना दुश्मन अजब गजब दुनिया का रंग जो!

कहीं नशे में ऐंठ रहे कुछ नशा अगर पा जाएँ ,
धन्य स्वर्ग में उड़ते फिरते जी आनंद समाये !

मै मकरंद मधू आनंद कवि -कविता में पाए लोभी मोही धन में डूबे धन आनंद में मरता जाए!

वहीं ऋषी मुनि दान दिए सब मोक्षानंद में फिरते, मेरा तेरा इनका उनका अलग -अलग अद्भुत आनंद।

जो आनंद मिले तो पूछूं उसकी क्या है पसन्द ?

 सबका है आनंद अलग तो इसका भी कुछ होगा गुण-प्रतिभा ये दया स्नेह या आनंद धन में होगा ।

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश , भारत।



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, May 7, 2022

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जी का जन्‍म 7 मई सन् 1861 को कोलकाता में हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर एक कवि, उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार, और दार्शनिक थे। 
 

 बचपन में उन्‍हें प्‍यार से 'रबी' कहकर बुलाया जाता था। आठ वर्ष की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक भी लिखना प्रारंभ कर दिया था। 
उन्‍होंने एक हजार कविताएं, आठ उपन्‍यास, आठ कहानी संग्रह और विभिन्‍न विषयों पर अनेक लेख लिखे। इतना ही नहीं रवींद्रनाथ टैगोर संगीतप्रेमी थे और उन्‍होंने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीतों की रचना की।
गुरुदेव के लिखे दो गीत आज भारत और बांग्‍लादेश के राष्‍ट्रगान हैं। एक है जन गण मन अधिनायक और दूसरा आमार सोनार बांग्ला। 
गीतांजलि के प्रकाशित होने के एक साल बाद सन् 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य के लिए नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। 
वे एशिया के प्रथम नोबल पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति हैं।
उनका विवाह तेरह साल की मृणालिनी देवी से हुआ था जिनकी मृत्यु 23 नवंबर 1902 को ही हो गई थी।

 गुरुदेव के पांच संताने थी ,रथींद्रनाथ टैगोर, शमींद्रनाथ टैगोर, मधुरिलता देवी, मीरा देवी और रेणुका देवी लेकिन उनमें से 2 की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो गई थी।
रवींद्रनाथ टैगोर के 13 भाई-बहन थे और वह 13 भाई-बहनों में चौथा जीवित पुत्र थे।
1882 में दो पद्य नाटक प्रकाशित किए, एक का नाम “रुद्र चक्र” था और दूसरा एक “संध्या संगीत” कविताओं का संग्रह था।
20 दिसंबर 1915 को, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने रवींद्रनाथ टैगोर जी को साहित्य के लिए डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया था।
23 दिसंबर 1921 को, उन्होंने विश्व भारती विश्वविद्यालय , पेड़ों के नीचे पढ़ाना, शांति निकेतन की स्थापना की थी।
गुरुदेव का देहावसान 7 अगस्त 1941 को कलकत्ता में हो गया था।

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश, भारत।

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 29, 2022

नारी का श्रृंगार तो पति है

नारी का श्रृंगार तो पति है
पति पर जान लुटाए

एक एक गुण देख सोचकर
कली फूल सी खिलती जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*****
प्रेम के वशीभूत है नारी
पति परमेश्वर पर वारी
व्रत संकल्प अडिग कष्टों से
सौ सौ जन्म ले शिव को पाए
कर सेवा पूजा श्रद्धा से
फूली नहीं समाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*******
चाहत से मुस्काए गजरा
बल पौरुष से केश सजे
नेह प्रेम पर माथ की बिंदिया
झूम झूम नव गीत रचे
नैनों से पति के बतिया के
हहर हहर लव चूमे जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
****



जहां समर्पण प्यार साथ है
नारी अद्भुत बलशाली
नही कठिन कुछ काज है जग में
सीता सावित्री या अपनी गौरी काली
मंगल सूत्र गले में धारे
मंगल लक्ष्मी करती जाये
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
निज बल अभिमान चूरकर
चरण वंदना में रत रहती
हो अथाह सागर भी घर में
त्याग _ प्रेम दिल लक्ष्मी रहती




विष्णु पालते जग को सारे
लक्ष्मी ममता ही बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******



पति के प्रेम की रची मेंहदी
देख भाग्य मुस्काती मन में
वहीं अंगूठी संकल्पों की
रहे चेताती सात वचन की
दंभ द्वेष पाखण्ड व छल से
दूर खड़ी, अमृत बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
गौरी लक्ष्मी सीता पाए
सरस्वती का साथ निभाए
पुरुष भी क्यों ना देव कहाए??
क्यों ना वो जग पूजा जाए?
प्रकृति शक्ति की पूजा करके
निज गौरव नारी को माने
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत। 29.04.2022
3.33_4.33 पूर्वाह्न

 ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, April 25, 2022

कितनों की जान लेगी ये .....असहनशीलता


कितनों की जान लेगी ये .....असहनशीलता
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सुबह सवेरे खुशी मन तन के साथ प्रकृति के साथ जुड़कर घूमना टहलना सूर्य नमस्कार योग ध्यान स्नान अर्घ्य पूजा पाठ फिर शुभ कर्मों में लग कर रचते जाना यही तो संस्कार था हमारे भारत का।
  माता पिता परिजन श्रेष्ठ जन वरिष्ठ जन का आदर सम्मान उनकी बातें मानना खुद कितना भी योग्य हों उनको सर माथे बिठाए रखना आदत में शुमार था हमारी । सुनहरी यादें क्या यादें ही रह जायेंगी ?? या आज के किशोर, युवा वर्ग  इन प्यारी आदतों को अपनी धरोहर मान अपनी संस्कृति की इस विरासत को आगे ले चलेंगे।


सुबह की खबरों से शुरू हो पल पल दिन भर आती भयावह खबरें मन मस्तिष्क  को झकझोर सोचने पर विवश कर रही है कि हो क्या रहा है हमारे घर परिवार समाज को? चूक कहां हुई मां बाप से बच्चों को सम्हालने में , क्यों बच्चे इतने उच्छृंखल होते जा रहे है बंधन से बाहर हाथ में मोबाइल आया चार दोस्त बहकाने बहकने वाले मिले और बच्चे हाथ से बाहर।
कुछ निम्न घटनाएं अभी फिर एक दो दिन में दिखीं जिन पर गौर करना सोचना सम्हलना जरूरी हो गया अभिभावक आंखें खोलें, सतर्कता बरतें,  नहीं तो पानी गले से ऊपर सिर तक पहुंच ही जायेगा
 1. बहन का नया मोबाइल चोरी हुआ घर में भाभी से कुछ कहासुनी गाली गलौच और रात में ही भाई ने अपनी ही सगी बहन को गोली मार दी।  ... आदमी के जान की कीमत और निकृष्ट वस्तु से तुलना और असहनशीलता।
2. दोस्त ने दोस्त की गर्ल फ्रेंड से बात की की , बातें बढ़ीं और दोस्त ने ही अपने जिगरी दोस्त की जान ले ली... यही दोस्त अपनी प्राइवेसी को अपनी प्रियतमा की बातें और प्रेमिका खुद को शौक से दोस्तों के बीच में ले जाते हैं और फिर नारी को एक वस्तु समझा जाता है फिर जागता है सम्मान और अपमान बदला।   कारण मूर्खता और असहनशीलता।
3. गृह कलेश और घरेलू झगड़ों के कारण विक्षिप्त मानसिक अवस्था में बाप ने अपने एक 7 वर्षीय पुत्र और 9 वर्षीय पुत्री को कुएं में फेंका। .....शुरू शुरू में तो फालतू के तर्क वितर्क अच्छे लगते हैं अपनी बातें ही जायज लगती हैं दूसरों को न सुनना विवेक से काम न लेना शांति स्थापना के लिए कोई भी सदस्य आगे बढ़कर , न झुककर शांति और समस्या समाधान की कोशिश करना ही कल भयावह परिणाम लाता है और असहनशीलता कारक होती है।
4. रंगदारी वसूलने के लिए ठेलेवाली महिला के पुत्र को पीट डालना और पेट्रोल छिड़क कर आग लगाना....फिर एक जान और वस्तु को एक पलड़े में रख कर तोलना और घर परिवार कानून के भय से बेखबर और असहनशीलता की पराकाष्ठा ...कहां जा रहे हैं हम और हमारा समाज?
5. चाचा का भतीजे को बीच चलती सड़क पर चाकुओं से गोदकर मार डालना और आते जाते लोग दुकान वालों और  कानून को ठेंगा दिखा देना ....जाहिर करता है कि छोटी छोटी बातें ही कल जहर बन जाती हैं और जान लेवा हो जाती हैं असहनशीलता कितनी बढ़ गई है इसको देख सुन ही लोगों का मन कांप जाता है और बदले में क्रोध का उबाल आता है जो कि पुनः दुखदाई और सब कुछ राख कर देने वाला होता है।
     अतः सभी अभिभावकों भाइयों माताओं बहनों, सबको जागना होगा आज  बहुत से विकल्प हैं हमारे पास बहुत से मंच है बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग
 करें , छोटी घटनाओं पर ध्यान दें और आग की दरिया में पांव रखने को उद्धत पीढ़ी को सहेजें सम्हालें।
 बच्चों पर निगाह बचपन से ही रखें फिर बड़े होने पर भी वही प्रेम दुलार शासन अनुशासन बनाए रखें प्रेम दंड और पुरस्कार से उन्हे कतई ये कह कर न छोड़ दें कि बच्चा अब तो खुद बड़ा हो गया है गलत कदम नहीं उठाएगा या किसी के बहकावे में नहीं आएगा , जानबूझकर गलती न भी करे भूल से भी बहक सकता है , आप अभिभावक हैं असहनशीलता न उपजने दें ये आप का दायित्व है, और आप अपने दायित्व से पल्ला कतई नहीं झाड़ सकते। संघर्ष तो आप को भी करना ही होगा , नही तो वही कहावत चरितार्थ होगी 
बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय, और कांटे आप को भी चुभना स्वाभाविक होगा।
जय श्री राधे।

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5


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दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

जो मुस्का दो खिल जाए मन



जो मुस्का दो खिल जाये मन
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खिला खिला सा चेहरा  तेरा
जैसे लाल गुलाब
मादक गंध जकड़ मन लेती
जन्नत है आफताब








बल खाती कटि सांप लोटता
हिय! सागर-उन्माद
डूबूं अगर तो पाऊँ मोती
खतरे हैं बेहिसाब
नैन कंटीले भंवर बड़ी है
गहरी झील अथाह
कौन पार पाया मायावी
फंसे मोह के पाश
जुल्फ घनेरे खो जाता मै
बदहवाश वियावान
थाम लो दामन मुझे बचा लो
होके जरा मेहरबान
नैन मिले तो चमके बिजली
बुत आ जाए प्राण
जो मुस्का दो खिल जाए मन
मरू में आये जान
गुल-गुलशन हरियाली आये
चमन में आये बहार
प्रेम में शक्ति अति प्रियतम हे!
जाने सारा जहान

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 22, 2022

धरती मां का ये ही प्यार

धरती मां का ये ही प्यार
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बिन आधार कहां हम रहते
शून्य में क्या हम सदा विचरते
स्थिर मन मस्तिष्क से रचते
नित नूतन नव जग व्यवहार
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***


बीज छिपाए गर्भ में रखती
लेखा जोखा समय देखकर
अंकुर पादप पेड़ फूल फल
सांसे जीवन सब कुछ देती
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***



धरती खुद फंगस से जुड़कर
अपनी बुद्धि का करे प्रयोग
तरु पादप हर जीव पालती
देती विविध तरह संदेश
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***



फोटो सिंथेसिस से जुड़कर
पौधे जीवित देते सांस
पर्वत झरने नदियां जंगल
पक्षी फूल सभी हैं साथ
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***
खनिज सम्पदा रत्न व भोजन
कर्म तुम्हारे अवनि वारे
क्षिति जल पावक गगन हवा में
पंच तत्व के सभी सहारे
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***
कभी उर्वरक कभी उर्वरा 
कूड़ा कचड़ा पाप नासती
जहर धुआं प्लास्टिक से रूष्ट हो
उलट पलट कर हमें चेताती
धरती मां का ये ही प्यार
भुला सके कैसे संसार।
***
आओ जागें चेतें जुड़कर
इस वसुन्धरा को हम पढ़ लें
इन प्यारे उपहार के बदले
धरा बचाने का हम प्रण लें
धरती मां गुरु का ये प्यार
भुला सके कैसे संसार??
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत।

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं