Thursday, May 10, 2012

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जैसे गोरी घूँघट में हो
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रंग बिरंगी बदरी डोलीं
घेर गयीं “दिनकर” को
शरमाया सा छुपा जा रहा
आंचल – बदली के वो
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तभी प्रिया ने करवट बदला
छन- छन लाली आयी
सप्त रंग के इंद्र धनुष बन
शरमाना दिखलाई
जैसे गोरी घूँघट में हो
पलक किये कुछ नीचे
चपला सी मुस्कान लहर को
वो अधरों में भींचे
rainbow
छुई – मुई सी कोई कली सी
हो बैठी सकुचाई
लेकिन भाटा – ज्वार उठे तन
अंग – अंग सिहरन भर आई
सूर्य रश्मि तब लिए लालिमा
छन – गालों- अधरों -पलकों हो
शर्मीली बन हृदय समाई
द्युति चमकी बस दिखी एक पल
खो तम-गयी-लजाती !
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर”
८-५-२०१२ कुल्लू यच पी
७.३०-८.१५





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

4 comments:

dheerendra said...

छुई – मुई सी कोई कली सी
हो बैठी सकुचाई
लेकिन भाटा – ज्वार उठे तन
अंग – अंग सिहरन भर आई

सुंदर चित्रण किया,....सुरेन्द्र जी आपने बधाई

MY RECENT POST.....काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...

रविकर फैजाबादी said...

बहुत सुन्दर कृति |
आभार भ्रमर जी ||
सादर ||

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय धीरेन्द्र जी आभार प्रोत्साहन हेतु -भ्रमर 5

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

ये प्रकृति के श्रृंगार की रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी --रविकर जी जय श्री राधे
भ्रमर ५