Friday, June 15, 2012

उगता सूरज -धुंध में


उगता सूरज -धुंध में 

कर्म फल -गीता 

क्रिया -प्रतिक्रिया 

न्यूटन के नियम 

आर्किमिडीज के सिद्धांत 

पढ़ते-डूबते-उतराते 

हवा में कलाबाजियां खाते 

नैनो टेक्नोलोजी में 

खोजता था -नौ ग्रह से आगे 

नए ग्रह की खोज में जहां 

हम अपने वर्चस्व को 

अपने मूल को -बीज को 

सांस्कृतिक धरोहर को 

किसी कोष में रख 

बचा लेंगे सब -क्योंकि 

यहाँ तो उथल -पुथल है 

उहापोह है ...

सब कुछ बदल डालने की 

होड़ है -कुरीतियाँ कह 

अपनी प्यारी संस्कृति और नीतियों की 

चीथड़े कर डालने की जोड़ -तोड़ है 

बंधन खत्म कर 

उच्छ्रिंख्ल  होने की 

लालसा बढ़ी है पश्चिम को देख

पूरब भूल गया -उगता सूरज 

धुंध में खोता जा रहा है 

कौन सा नियम है ?

क्या परिवर्तन है ?

सब कुछ तो बंधा है गोल-गोल है 

अणु -परमाणु -तत्व 

हवा -पानी -बूँदें 

सूरज चंदा तारे 

अपनी परिधि अपनी सीमा 

जब टूटती है -हाहाकार 

सब बेकार !

आँखों से अश्रु छलक पड़े 

अब घर में वो अकेला बचा था 

सोच-व्याकुलता-अकुलाहट 

माँ-बाप भगवान को प्यारे 

भाई-बहन दुनिया से न्यारे 

चिड़ियों से स्वतंत्र हो 

उड़ चले थे ...............

फिर उसे रोटियाँ 

भूख-बेरोजगारी 

मुर्दे और गिद्ध 

सपने में दिखने लगते 

और सपने चकनाचूर 

भूख-परिवर्तन -प्रेम 

इज्जत -आबरू 

धर्म -कानून-अंध विश्वास 

सब जंजीरों में जकड़े 

उसे खाए जा रहे थे .....

-------------------------------

३.०२-३.४५ पूर्वाह्न 

कुल्लू यच पी १३.०२.२०१२ 







दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

10 comments:

dheerendra said...

भूख-परिवर्तन -प्रेम
इज्जत -आबरू
धर्म -कानून-अंध विश्वास
सब जंजीरों में जकड़े
उसे खाए जा रहे थे .....

बहुत बेहतरीन सुंदर रचना,,,,,

RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

रविकर फैजाबादी said...

बड़ा विकट है भ्रमर के, मन का यह आक्रोश |
धुंध छटेगी शीघ्र ही, रहे सुरक्षित कोष |

रहे सुरक्षित कोष, दोष सब बने नकलची |
विज्ञापन का दौर, दिखें चीजें न सच्ची |

उहापोह चित्कार, पाप का अंत निकट है |
कैलासी नटराज, हमारा बड़ा विकट है ||

Anonymous said...

adarniya bhramar ji apki yeh kriti bilkul sachchi aur satik hai.padhkar bahut accha laga. asha hai isi tarah ki krition se samaj ko sachchai ka bodh karate rahenge

kavita shukla
rae barely

Anonymous said...

adarniya bhramar ji apki yeh kriti bilkul sachchi aur satik hai.padhkar bahut accha laga. asha hai isi tarah ki krition se samaj ko sachchai ka bodh karate rahenge

kavita shukla
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Anonymous said...

adarniya bhramar ji apki yeh kriti bilkul sachchi aur satik hai.padhkar bahut accha laga. asha hai isi tarah ki krition se samaj ko sachchai ka bodh karate rahenge

kavita shukla
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Anonymous said...

adarniya bhramar ji apki yeh kriti bilkul sachchi aur satik hai.padhkar bahut accha laga. asha hai isi tarah ki krition se samaj ko sachchai ka bodh karate rahenge

kavita shukla
rae barely

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

sunder prastuti

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आदरणीय धीरेन्द्र जी , शास्त्री जी , रविकर जी , डॉ आशुतोष जी और प्रिय कविता आप सब का बहुत बहुत आभार प्रोत्साहन हेतु .....
शास्त्री जी आप ने इस रचना को चर्चा मंच के लिए चुना हमारी युवा पीढ़ी की व्यथा को दर्शाया ...बड़ी ख़ुशी हुयी
आभार
भ्रमर ५

ana said...

अद्भुत शब्द संयोजन