Saturday, August 1, 2020
जब तक दम पतवार चलाए
काली स्याह रात टल जाती
भोर किरण ले आती है
ग्रहण लगे कितना भी निर्मम
ठहरे ना , धवल चांदनी आती है
भीषण बाढ़ कटाव रौंद दे
अंकुर फिर उग आते हैं
डूबा उतरा फिर फिर आता
सांसें साथ निभाती हैं
मन के हारे हार कहा सच
मन जीते जग विजय दिलाए
हारो ना हे कर्म पुरोधा
द्वंद प्रश्न हर हल हो जाए
प्रेम अगर माटी-तिनके से
काल व्याल अरि लौट के जाएं
धैर्य धार - दुर्लभ तन मानव
जब तक दम पतवार चलाए
सुन्दर तन मंदिर निज बस मन
हो बुलंद हरि पार लगाएं
Me
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
बदरी रंग बिरंगी उड़ती पवन संग, दुल्हन बन छाई
तरुवर नाचे पुष्प खिले हैं
टिप टिप, रिम झिम वर्षा अाई
बदरी रंग बिरंगी उड़ती
पवन संग, दुल्हन बन छाई
मोर नाचते दादुर बोले
कोयल कूके पक्षी कूजें
ताल सरीखे इत उत पानी
टर्र टांय मेंढ़क - मनमानी
उछलें कूदें बालक पानी
हहर हहर मन प्रिय प्रियतम के
बन बादल बदली उड़ मिलते
लगे गले मुख चूम रहे हैं
सपने खोए झूम रहे हैं
सपने सच तो कहीं विरह है
बरस रहे कुछ भेज रहे हैं
नेह निमंत्रण हिय जी भर भर
कजरारे नैनन की चितवन
लाली लाल गुलाब चमन कुछ
मदमाते बौराती कुछ भी
तेज गति छनकाती पायल
आसमान उड़ खेल रहे हैं
खेल रहे बस खेल रहे हैं....
पुनः.....
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
टिप टिप, रिम झिम वर्षा अाई
बदरी रंग बिरंगी उड़ती
पवन संग, दुल्हन बन छाई
मोर नाचते दादुर बोले
कोयल कूके पक्षी कूजें
ताल सरीखे इत उत पानी
टर्र टांय मेंढ़क - मनमानी
उछलें कूदें बालक पानी
हहर हहर मन प्रिय प्रियतम के
बन बादल बदली उड़ मिलते
लगे गले मुख चूम रहे हैं
सपने खोए झूम रहे हैं
सपने सच तो कहीं विरह है
बरस रहे कुछ भेज रहे हैं
नेह निमंत्रण हिय जी भर भर
कजरारे नैनन की चितवन
लाली लाल गुलाब चमन कुछ
मदमाते बौराती कुछ भी
तेज गति छनकाती पायल
आसमान उड़ खेल रहे हैं
खेल रहे बस खेल रहे हैं....
पुनः.....
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
बूढ़े काका की आंखों के तारे प्यारे बिछड़ गए
बूढ़े काका की आंखों के
तारे प्यारे बिछड़ गए
इतने सारे मोहक सपने
अंगारों से दहक गए
जिसको पाला पोसा सींचा
नागफनी क्यों बने चुभे
दीन दशा काका की देखे
खुद काका बन जाऊं मै
स्नेह अधिक या कमी कहीं थी
सोच सोच पगलाऊं मै
नशे धुत्त चंदन में भी विष
क्यों कुछ समझ न पाऊं मैं
बोझिल आंखें झरते झरने
खुद से ना लड़ पाऊँ मै
लोग हंसेंगे टीस लिए हिय
कभी बचूं फिर उसे बचाऊं
कुंठा और विषाद मार दे
कभी डरा डर जाऊं मै
खून मेरा ही खून अजब रे!
आंगन तुलसी रूखा पाऊं
नागफनी भी अब तो भाई
आंगन मेरे काट न पाऊं ।
लखनऊ
३०.६.२०२०
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
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