अपलक देख रहे थे बापू
जब बेटे ने उनको डांटा
ममता भी थी रोक न पाई
वो समाज का बना था कांटा
नागफनी कैक्टस थे संगी
गुल गुलाब जनधन को लूटा
श्वेत वसन भी संगी साथी
लोलुप लंपट पाता पूजा
रिश्ते नाते मानवता की
हत्या क्रूर था चेहरा दूजा
कांटे कांटे जब हम बोएं
क्या आंगन क्या तुलसी पूजा
बूढ़ी आंखे निशि दिन बरसें
घर मंदिर सब लगता सूना
दर्द बढ़े नासूर बने जब
काट अंग ना सब हो सूना
अति फल खुशियां तो कुछ देता
डाल पेड़ आंधी गिर जाता।
मानव दानव जब बन जाता
खून उतर आंखों में आता
आओ जब हम पौध लगाएं
काट छांट करते ही जाएं
टेढ़े मेढे रोग विषाणु
कर उपचार राह पर लाएं ।
लखनऊ
11.26 रात्रि
12 जुलाई 20
28
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
Saturday, August 1, 2020
साफ होगी हवा कल बनेगी दवा
ग़म की बदली जो छाई है टल जाएगी
वो सुहानी किरण आज फिर आएगी
हम न हारे कभी आज फिर जीतेंगे
नेत्र अब हैं खुले हौसले सब मिले
साफ होगी हवा कल बनेगी दवा
रोग ताकत पे अपनी ठहरते कहां
हैं प्रभु बन के उतरे चिकित्सक यहां
लहरेगा फिर तिरंगा और देखे जहां ।
7.40 7.59 पूर्वाह्न
15 जुलाई 20
लखनऊ
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
भ्रमर का है दूर गुंजन
न जाने क्या हुआ इस गुल गुलिस्तां में
कलियां बन सयानी खूब पर्दा कर रही हैं
चमन है खूबसूरत हैं नजारे बागवां के
भ्रमर का है दूर गुंजन जाने क्या इसमें कमी है
शोखियां हैं जाम है जन्नत सभी कुछ
दूरियां मुंह खोल खाने को खड़ी हैं
भोर पर बरपा कुहासा निशा उजली है खड़ी
तार ढीले शिथिल वीणा गीत झंकृत कुछ नहीं
बेबसी ही बेबसी चेहरा मरुस्थल सा हुआ
नैन नम हैं आंसू गायब पलकें कांटे सी बिछी हैं
खोजता हूं नींद आए ख्वाब आ आ के सुला दें
आती परियां आसमां से गहरे सागर में डुबातीं
हौसला है हंस जैसा मोती चुगने मै बढ़ा
ज्वार भाटा रेत साने फेंक देते दे पटखनी
11.30 P M-12.12 A M
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
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SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5
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