BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Friday, April 15, 2011

अरे लुटेरे भाई तेरी - क्या दूकान चली है


अरे लुटेरे भाई तेरी -
क्या दूकान चली है
कल तक तो तू जुआ खेलता
‘गलियों’ में था दर्शन देता
अब 'पद्मावती' में घूमे - जाये
‘दिल्ली’ पहुंचे तो उड़ जाये
सागर के उस पार !!

कोई ‘महिला’ -कहीं अकेली
या ‘कायर’ हो पुरुष कहीं
पल भर तू फिर नहीं चूकता
हाथ सफाई-लगे कसाई !!

कामाख्या का जादू सीखा

एक “खिलाडी” को –ना- छोड़ा

टूट –फूट- कर ‘सपने’ बिखरे 

फिर भी कहती मै ना हारी
ये है नारी !!  अरे लुटेरे
ले ली उसकी “टांग”
तुझको ना नरसिंह मिलें
कभी बिठाते “जांघ” !!



अगर लूटना है तो लूटो
लूट  रहे जो घूमे
उसी ट्रेन में टी. टी. से मिल
जेब भरे - है - घूमे
एक ‘तमाचा’ जड़ दो उसको
‘ताकत’ अपनी दिखा वहां तू
‘पहलवान’ बन जाओ !!

अगर काटना ‘पाँव’ ही तुझको
सोये -देखो ड्यूटी- हैं वो
लूट रहे -सरकार- खजाना
उनको जा के लूटो !!

कल तेरी माँ -बहना भी
सफ़र कहीं - जो कहीं अकेली
तेरे भाई मिल जायेंगे -देर नहीं
काट-काट कर- डालें -बोटी !!

इसी ट्रेन में अपनी -सेना
लव-‘लश्कर’ के साथ चले है
माना तेरी ‘सीमा’ तय है
‘दुश्मन’ से तू देश के भाई
‘जान’ लड़ाए रोज लड़े हैं
‘आँख खोल’ कर प्यारे देखो
‘दुश्मन’ तेरे साथ चले हैं
कभी कहीं कुछ ‘मोड़’ जो आये
चलती ‘ट्रेन’ कहीं रुक जाये
थोडा सा तुम ‘जागो’ भाई
‘चीर- हरण’ या कोई ‘लुटेरा’
‘आह’ भरी कानो जब आये
‘कृष्ण’ हमारे कुछ कर जाओ  !!!



कार खड़ी कर सड़कों पर हम
कितना जाम लगायें -
ले परिवार शाम को आयें
वो फुल्के की और बताशा
चाट -चाटने -मटरू वाली
क्या दूकान लगी है
उस बर्तन में "मूते" -जाये
क्या संदेशा  दुनिया  छाये !!
इन जैसों से भी डरना क्या-
लोकपाल बिल लाना ??

चार साल की बच्ची - माँ- को
‘दफ़न’ किये हैं घर उसके
‘ताला’ उसके  घर में लाये
कुछ हजार जो ना ले पाए
है पंजाब की घटना सच्ची  
है -ये –चेहरा- एक "पुलिस" का
लाज-शर्म सब खाए
चुल्लू भर पानी ना डूबें
ये रक्षक कहलायें !!

कहें भ्रमर "कैप्टन" की मानों
पकड़ इन्हें तुम उल्टा टांगो 
‘मूर्ति’ - इनकी ना ‘पत्थर’ की
हर ‘चौराहे’ एक- एक -कर
‘जिन्दा’ ही तुम कभी लगा दो

जिसके ‘दिल’ में ‘जान’ अभी -
धड़कन कुछ जिन्दा है भाई
रोको तुम है ‘लुटी कमाई’
जागो तुम -
अभी वक्त है -
दर्द बढ़ रहा - दिन प्रतिदिन है
‘ठेस’ लगी है -
‘खून’ बह रहा -
‘घाव’ कही ‘नासूर’ बने ना
‘जगा’ रही है ‘रोती’  माई !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१५.०४.2011


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

8 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति |बधाई
    आशा

    ReplyDelete
  2. आदरणीया आशा जी नमस्कार आप की इतनी शीघ्र प्रतिक्रिया पा आँखों में आंसू आ गए आज भी हमारे लोग हमारी नारियां ऐसी जागरूक हैं
    मन द्रवित हो गया भगवान आप को हर ख़ुशी दे और आप और लोगों को ऐसे ही जागरूक करें
    प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ
    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

    ReplyDelete
  3. विवेक जी नमस्कार और धन्यवाद आप का शीघ्र प्रतिक्रिया हेतु आइये इस दर्द को समझ हम सब कुछ अपना भी योगदान करते रहें
    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५

    ReplyDelete
  4. इस रचना में आज के सच के दर्द को समेट लाये हैं ...भ्रष्टाचार का पर्दा फाश किया है ...अच्छी प्रस्तुति ...

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार ...

    मेरे दूसरे ब्लॉग का भी भ्रमण करें -
    http://geet7553.blogspot.com/



    कृपया टिप्पणी बॉक्स से वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

    ReplyDelete
  5. आदरणीया संगीता जी
    बहुत बहुत धन्यवाद आप हमारे ब्लॉग तक पहुंची हम आप से सुझाव व् समर्थन की भी उम्मीद करते हैं

    इस रचना में सच कहा आप ने कडवा सच कुछ सुझाव आवाहन भ्रष्टाचार सब दर्द भरा है

    आप के सुझाव के अनुसार वर्ड वेरिफिकेशन भी हटा लिया जायेगा

    ReplyDelete
  6. यथार्थ की सुन्दर, भावपूर्ण अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  7. अमृता तन्मय जी हाँ सच ये यथार्थ ही है एक कडवा सच जो हम समाज में झेल रहे हैं दर्द से पीड़ित हैं -धन्यवाद आज आप ने यहाँ इतना समय इस दर्द में दिया हम आभारी हैं आप के

    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

    ReplyDelete

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
अभिनन्दन आप का ,हिंदी बनाने का उपकरण ऊपर लगा हुआ है -आप की प्रतिक्रियाएं हमें ऊर्जा देती हैं -शुक्ल भ्रमर ५