BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Saturday, August 1, 2020

सावन की छटा निराली है


मलयानिल बह रही आज ,
रिमझिम फुहार सुखदाई है
खिले पुष्प अनुपम गुलाब
हर ओर बिछी हरियाली है
ताल तलैया खेत बाग मन
सागर नदियों की क्यारी है
झूला कजरी नागपंचमी
बच्चों की किलकारी है
मनहर मधुमय सब मधुप खिले
सावन की छटा निराली है


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

कितने सारे सांप यहां पर


कितने सारे सांप यहां पर
फुफकारे पर पूजा पाते
आस्तीन के अंदर बैठे
समय मिले बस दांत चुभाते
दो मुंहवा कुछ भोले भाले
गले लगे हैं जीभ निकाले
अजगर भी कुछ रेंग रहे हैं
बोझ जमीं पर निगल भी जाते
लाल हरे चितकबरे काले
हुए भ्रमित तो बने निवाले
कुछ भोले चंदन बस लिपटे
कर्म जात अपना हैं भूले
सांप न केवल हमें डराए
निर्बल खुद को खा भी जाए
नाग कई जो दांत तुड़ाए
परवश खाएं उन्हें खिलाएं
बीन बजे तो नाच दिखाएं
कभी वक्त खूं पी भी जाएं
कहीं कराईत कहीं कोबरा
किंग कहीं कुछ मंदिर जाएं
हों अशक्त तो रेंग साथ में
खाते पीते साथ निभाएं
इधर उधर सब जगह सांप हैं
मेंढ़क जैसे कूद रहा मै
इनके उनके मध्य पांव रख
सहमा डरा हूं जूझ रहा मै
भय कायर डरपोक कहो कुछ
बना वीर अब तक मै जीता
अगर सांप से लड़ता रहता
अल्प आयु मुश्किल था जीना
बहुत सांप ने मुझे सिखाया
अपना अपना रास्ता पकड़ो
हानि किया ना कुछ क्षति पाया
राह चुनो जीतो बस निकलो ।

10.45 pm 00:27 AM

SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5
DEORIA U P




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, June 12, 2020

ख्वाबों में वो रचे घरौंदे
कितने, मटियामेट हुए,
आंसू की कुछ थाह नहीं है,
स्नेह पुष्प नासूर बने,
गली गली जब एक सा रोना
हृदय सांत्वना देता है ,
रिसते रिश्ते घाव मौन है
शूली भी चढ़ लेता है



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं