Friday, September 12, 2014

परख PARAKH

(4) परख PARAKH
हर दाने नहीं हों खाने को ,हर आंसू व्याधि बंटाने को,
पहचाने सभी को-जाने को , हर वार हो कश्ती डुबाने  को !

हर दांत होते खाने को , जुगनू लगाये आग कभी ,
हर हाथ उठते देने को , धुन यूं बसायें बाग़  कभी !

तलवार भी क्या जब धार नहीं , वह आग नहीं जब आंच नहीं ,
वह माँ क्या जिसमे प्यार नहीं , संतान बुरी- तब बाँझ भली !!


सब देखे ना ही सच होता ,रश्मि आये ना हाथ कभी,
घर आये सभी मेहमान होता, ऊँगली पकडे ले बांह कभी !!

मोम छुएं तो कठोर लगे , हिम भी बन जाता पानी है ,
चोर देखे चोर लगे , प्रिय भी बन जाता पापी है !!

हर उल्का ना सब नाश करे , चपला दिखाए राह सदा ,
वह ममता ना बस प्यार करे, अबला बनाये भाग्य सदा !!

सरसों से दिखते तारे भी, नजदीक नहीं हैं पहाड़ सभी ,
महलों में बसे ही सितारे नहीं, संगीत नहीं लय -ताल नहीं !!

तीखी भी औषधि होती है -विष दन्त नहीं हों सांप सभी,
विष की औषधि  विष होती है ,भ्रमर सभी लो भांप भली !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
१५.०४.२०११

(लेखन -२५.०२.१९९४ कोडरमा झारखण्ड)

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

7 comments:

Rakesh Kaushik said...

प्रेरक प्रस्तुति

डॉ. मोनिका शर्मा said...

Steek Panktiyan

हिमकर श्याम said...

बढ़िया है...

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

राकेश जी प्रोत्साहन के लिए आभार
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

डॉ मोनिका जी रचना के भाव आप को अच्छे और सटीक लगे सुन हर्ष हुआ
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

डॉ मोनिका जी रचना के भाव आप को अच्छे और सटीक लगे सुन हर्ष हुआ
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

हिमकर भाई रचना बढ़िया लगी सुन ख़ुशी हुयी आभार
भ्रमर ५