BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Thursday, April 7, 2016

आंगन सूना बिन तुलसी के


आंगन सूना बिन तुलसी के
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भोर हुआ, थी रंग -बिरंगी आसमान में छाई बदली
इंद्रधनुष था गगन-धरा मंडप पर शोभित
पुष्प-अधर कलियाँ मुस्कातीं - जैसे गातीं
मन-भावन हे अनुपम छटा से दिल था मोहित !
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स्वर्ण झील ज्यों भारत माता उसमे अंकित
स्वर्ण रश्मि बरसाते सूरज कण-कण झंकृत
जय-जय-जय उद्घोष सा कलरव- थे सातों सुर
नाना  वर्ण की चिड़ियाँ पूरब- स्वर्ग जमीं पर
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ऊंचे-ऊंचे पर्वत वन थे - शांत झील को घेरे
प्रहरी वन जी जान निछावर करते जैसे वर्फ-गोद में सोये
माँ से शीतलता पाने को -योग ध्यान में  खोये  
पाते और लुटाते पल -पल पाप हरे ज्यों तेरे -मेरे
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पर्यावरण को शुद्ध रखे हम आओ पौधे और लगाएं
स्वच्छ वायु में सांस भी ले लें जीवन-जल भी पाएं
कंक्रीट का जंगल विन जल पशु -पक्षी ना आएं
आंगन सूना -विन तुलसी के -दीपक कल फिर कौन जलाए ?
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमाचल भारत
६ अप्रैल २०१६

८.३० पूर्वाह्न -९ पूर्वाह्न


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, March 4, 2016

अभिव्यक्ति की आजादी

अभिव्यक्ति की आजादी
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पढ़ते हुए बच्चे का अनमना मन
टूटती ध्यान मुद्रा
बेचैनी बदहवासी
उलझन अच्छे बुरे की परिभाषा
खोखला करती खाए जा रही थी .......
कर्म ज्ञान गीता महाभारत
रामायण राम-रावण
भय डर आतंक
राम राज्य देव-दानव
धर्म ग्रन्थ मंदिर मस्जिद ..और भी बहुत कुछ ..
पी एच डी कर भी जेल जाना
गरीब अमीर परदा दीवार
आरक्षण भेदभाव मनुवाद सम्राज्य्वाद
सब मकड़जाल सा उलझा तो
बस उलझता गया…. दिमाग सुन्न.......
किताबें फेंकशोर में खो गया
गुड्डे गुड़िया के खेल में
अचानक क्रूरता हिंसा ईर्ष्या जागी
कपडे नोंच चीड़ फाड़ रौंद पाँव तले 

नर- सिंह  सा हांफ गया ............................
आजादी -आजादी इस से आजादी उस-से आजादी या फांसी ?
अभिव्यक्ति की आजादी ...
कुछ लोगों की भेंड़ चाल झुण्ड देख
वह दौड़ा अंधकार में अंधे सा ....
माँ ने एक थप्पड़ जड़ा ..रुका ……
आँचल से पसीना पोंछ ..समझाया
बैठाया… प्यार से पोषित करदिखाया
देख !  चिड़िया भी अपना घर तिनके तिनके ला
बनाती  हैं घोंसला… उजाड़ती नहीं
बन्दर मत बन -….उजाड़ -आग -विनाश नहीं
जिस थाली में खाते हैं छेद नहीं करते
अपना घर परिवेश समाज देश समझ
संस्कार प्यार ईमान धर्म कर्म
तेरे खोखले पी. यच. डी. विज्ञान पर भारी हैं
भूख ..गरीबी जाति धर्म नहीं देखती
ये वाद .. वो वाद ..विवाद ही विवाद
सामंजस्य समझौता परख जाँच
जरुरी है महावीर बुद्ध ज्ञानी बनने हेतु 
शून्य में विचर पानी में लाठी मत पीट
कुएं में एक भेंड़ कूदी
फिर सब सत्यानाश ...हाहाकार
जंगल राज ..अन्धकार से सहजता में
सरल बन ..शून्य बन
फिर ऊंचाइयों में चढ़ना आसान है
बच्चे ने आकाश की ऊंचाइयों में झाँका
कुछ आँका ..जाँचा
समझ गयी थी 
आग लगाने से विकास नहीं होता
होता है विनाश ..नंगापन का नाच
भूख नहीं मरती
कटुता ही है बढ़ती
और हम जाते हैं ग्राफ में नीचे
पचास साल और पीछे
और फिर तिरंगा ले वह सावधान हो गया
वन्दे मातरम ..
जय हिन्द .....
उहापोह अब सुसुप्ति में चुका  था ...
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
कुल्लू यच पी
-.५२ पूर्वाह्न

२८ फरवरी २०१६



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, February 29, 2016

मेरे घर के बगल कौन है ?


मेरे घर के बगल कौन है ?
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मेरे घर के बगल कौन है ?
सन्त महाजन या आतंकी
मंथन आओ कर लें प्यारे
भूख है हम को कितनी धन की ,,,
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प्रेम क्रोध या घृणा ईर्ष्या
जांचो परखो क्या कुछ  देते
मारो-काटो ले लो बदला ??
जीवन क्षण भंगुर कर देते ..
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मानव योनि है दुष्कर पाए
संस्कार भारत भू आये
अच्छा -अच्छाई चुन लें
घर आँगन से नीव ये रख लें ..
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मात-पिता सन्तति मन झांकें
सखा भाव रख मन को आंकें
कौन कोयला- हीरा परखें 
बनें जौहरी सदा तराशें  ...
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अन्धकार जब बंद द्वार   हों
निरखें आओ भरें उजाला
नफरत घृणा अकेलेपन को
दूर करें रख भाई चारा ..
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बारूदों विस्फोट में जल-जल
क्यों मरते घुट जलते तिल-तिल
ज्वालाओं से जल सब हारा
खो अपना जग कौन है जीता ...
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
कुल्लू हिमाचल भारत

२५-जनवरी -२०१६




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं