BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Tuesday, May 5, 2015

माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां


माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां

  ( photo with thanks from google/net)

एक जोर बड़ी आवाज हुयी
जैसे विमान बादल गरजा
आया चक्कर मष्तिष्क उलझन
घुमरी-चक्कर जैसे वचपन
----------------------------------
अब प्राण घिरे लगता संकट
पग भाग चले इत उत झटपट
कुछ ईंट गिरी गिरते पत्थर
कुछ भवन धूल उड़ता चंदन
-------------------------------
माटी से माटी मिलने को
आतुर सबको झकझोर दिया
कुछ गले मिले कुछ रोते जो
साँसे-दिल जैसे दफन किया
------------------------------
चीखें क्रंदन बस यहां वहां
फटती छाती बस रक्त बहा
कहीं शिशु नहीं माँ लोट रही
कहीं माँ का आँचल -आस गयी
-------------------------------
कोई फोड़े चूड़ी पति नहीं
पति विलख रहा है 'जान' नहीं
भाई -भगिनी कुछ बिछड़ गए
रिश्ते -नाते सब बिखर गए
------------------------------
सहमा मन अंतर काँप गया
अनहोनी बस मन भांप गया
भूकम्प है धरती काँप गयी
कुछ 'पाप' बढ़ा ये आंच लगी
-----------------------------
सुख भौतिक कुदरत लील गयी
धन-निर्धन सारी टीस गयी
साँसे अटकी मन में विचलन
क्या तेरा मेरा , बस पल दो क्षण
--------------------------------
अब एक दूजे में खोये सब
मरहम घावों पे लगाते हैं
ये जीवन क्षण भंगुर है सच
बस 'ईश' खीझ चिल्लाते हैं
---------------------------
उधर हिमाचल से हिम कुछ
आंसू जैसे ले वेग बढ़ा
कुछ 'वीर' शहादत ज्यों आतुर
छाती में अपनी भींच लिया
------------------------------
क्या अच्छा बुरा ये होता क्यूँ
है अजब पहेली दुनिया विभ्रम
जो बूझे रस ले -ले समाधि
खो सूक्ष्म जगत -परमात्म मिलन
-----------------------------------
कुदरत के आंसू बरस पड़े
तृषित हृदय सहलाने को
पर जख्म नमक ज्यों छिड़क उठे
बस त्राहि-त्राहि कर जाने को
-------------------------------
ऐसा मंजर बस धूल-पंक
धड़कन दिल-सिर पर चढ़ी चले
बौराया मन है पंगु तंत्र
हे शिव शक्ति बस नाम जपें
-------------------------------
इस घोर आपदा सब उलटा
विपदा पर विपदा बढ़ी चले
उखड़ी साँसे जल-जला चला
हिम जाने क्यों है हृदय धधकता
---------------------------------

  आओ जोड़ें सब हाथ प्रभू
 तत्तपर हों  हर दुःख हरने को
मानवता की खातिर 'मानव'
जुट जा इतिहास को रचने को
----------------------------------
हे पशुपति नाथ हे पंचमुखी
क्यों कहर चले बरपाने को
हे दया-सिंधु सब शरण तेरी
क्यों उग्र है क्रूर कहाने को
----------------------------
"मौलिक व अप्रकाशित"
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.३०-३.०२ मध्याह्न
कुल्लू हिमाचल


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, May 2, 2015

मन की बात



आओ भ्रष्टाचारी भाई
निज मन में तुम झांको
भारत देश है क्यों कर पिछड़ा
मानचित्र में- आंको
--------------------------------
बदहाली बेहाली शिक्षा
अंधकार घर दूर है शिक्षा
टूटी सड़कें ढहे हुए पल
करें इशारा भ्रष्ट काल-कुल
-----------------------------
छीन झपट कर जोड़े  जाते
शीश महल -पर नहीं अघाते
स्नेह गया ना लाज हया
व्यथित ह्रदय मुरझा चेहरा
--------------------------------
भोले प्यारे बच्चे अपने
भाएं अच्छी मन की बात
दुर्गुण करनी तेरी , अपने -
काहे लादें सर पे पाप ?
----------------------------

'चोर' बना जिनकी खातिर
कल काल मुख कर लेप करें
माँ बाप न मानें मै शातिर
मुंह फेर चलेंगे छोड़ तुझे
----------------------------
ना बो कंटक तू फूल बिछा
क्यों ह्रदय घात फांसी मांगे
सतकर्म करे प्रभु सभी रिझा
पल दो पल जी खुशियाँ मांगे
-----------------------------
ये महल दुमहले माया सब
कब धूल -ढेर माटी मिलते
प्रेम -पुण्य यादें सुन्दर
सतकर्म आत्म जाएँ संग में
-------------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमाचल भारत
२६.४.२०१५
२.२० मध्याह्न



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, April 24, 2015

ये लाल कभी माँ कह दे



ये लाल कभी माँ कह दे 

देदीप्यमान है मेरा 
ये घर -ये महल 
नौकर चाकर सब 
लेकिन मै घुट रही हूँ 
रोज-रोज -सुन 
कौन बाप -कैसी माँ 
सब मतलब के यार हैं 
कोई भंडुआ..
कोई छिनाल है 
और न जाने क्या क्या ...
बरबराता-कानों में जहर घोलता 
बाप का -मेरा गला दबाने दौड़ता 
और फिर गिर जाता कभी 
निढाल-बेबस -बेहोश 
मै उसके कपडे -जूते उतार
अब भी -प्यार से 
सुला देती हूँ 
लेकिन चाँद -खिलौना दिखा 
ना खिला पाती 
ना लोरी गा सुला पाती 
हाय नारी ये क्या -
तेरा हाल है ?
ये "लाल" कभी 
माँ कह दे 
दिल में मलाल है !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर "
५.३५ पूर्वाह्न जल पी बी  




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं