BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Tuesday, October 11, 2011

तेरी दवा जहर है हमारे लिए


कुल्लू से आप सभी का स्वागत है थोड़ी सी ठण्ड पहाड़ियों से घिरे मैदान में मेला झूला भीड़ गाजियाबाद नजीबाबाद तक से आई दूकानें हिमाचल के गाँव गाँव से आये देवता दूर दूर से आये डेरा डाले प्रभु श्री राम के दर्शनार्थी भक्त आज देवताओं की फिर गाँव गाँव में वापसी प्रभु से गले मिल सब वापस होंगे गाजे बाजे के साथ जाने के समय फिर गाँव गाँव में प्रधान या बड़े लोगों के यहाँ रुकेंगे फिर अपने गाँव पालकी में सवार देवता की वापसी हर जगह बाजे बजते बारात सा माहौल -उधर कला केंद्र में रूस , ब्राजील , मुबई से आये के के की टीम , अन्य प्रदेशों से आये कलाकार रात में धूम मचाये नौ दिन ….अब विदाई का समय …विदाई में दिल शांत करना होता है ..आशीर्वाद गले मिलना ..गिले शिकवे माफ़ ….प्रभु सब को आशीष दें ये देश कुछ बदले ….जय श्री राम …आइये अब देखें थोड़ी राजनीति और लोगों का कहना …..
तुम्हारी ये सफ़ेद धोती टोपी
अँधेरे में चमक जाती है
दिखा देती है करतूत
लोगों को राह
समझ लो अँधेरे का दस्तूर
काल कोठरी
यहाँ के लोगों का मन
इनका राज
इनका ख्वाब
कुछ दिन कैद में रहो
पाँव में बेंडियाँ डाल
कैद में ??
हाँ नहीं तो नहीं रह पाओगे
इस सडांध में नहीं ढल पाओगे
उड़ जाओगे फुर्र
सीढियां चढ़ जाओगे
दिखाई दोगे सब को
मुह खोलोगे
सच बोलोगे
आग उगलोगे
वो आग जो झोपड़ियों को नहीं जलाती
गरीबों को नहीं छू पाती
जो घातक है कोठियों के लिए
अन्यायी के लिए अन्याय के लिए
मुझसे बीमार के लिए
तेरी दवा जहर है हमारे लिए
हमारी जात पांत के लिए
जिसकी आज भरमार है
तू ईमानदार है
अल्पसंख्यक है
तेरी संसद नहीं बनेगी
न ही कभी तेरी सत्ता चलेगी
शुक्ल भ्रमर ५
१२.११.२०११ यच पी



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, October 9, 2011

किंचित परिवर्तन दिल का ही विचित्र रूप -शांति



शांति (शांति नहीं तो मखमल पर भी नींद नहीं )
चाह नहीं वह दिन फिर आये
पर जाने क्यों -
मधुर अहसास सुरों के संगम भीनी सी गंध
आज भी वैसे ही तारो ताजा -
अपरिवर्तित द्विगुणित सुख दुःख दायिनी
स्वप्निल झील सी आँखों में
तैरती ख्वाबों की बगिया
हरित वसन में लिपटी वो गुडिया
गुलाबी होंठ, थिरकती जादू की पुडिया
रेशमी नहीं काली छड़ी घुमाती फिराती
मोरनी सी चाल नूपुरों की झंकार
दिन और रात का मिलन कब होता ख्याल नहीं
यही तो बिलकुल यही -
स्थिति आज भी छाये है , पर
किंचित परिवर्तन दिल का ही विचित्र रूप
दिल को ही सताए है
न उसे याद करता न तो भूलता है
जलज बिना जल जला चला जाता है
चातक सम एक दृष्टि दूजा न भाता
आस सांस संग हिये जग भरमाता है
ज्ञान जप जोग भोग प्रियतम से हारे हैं
रूप रंग , प्रीति से विनीत कर्म सारे हैं
भूले भी वे दिन कैसे आँखों में जो छाया है
आँखों से मोती नहीं लाल ढुलक आया है
मानव क्रूर कीड़ों से भी बदतर होगा
ऐसा किसने सोचा था
नारी देवी श्रधेय पूज्य
ये सब क्या मिथ्या धोखा था
अज्ञान काम की आंधी में
खुद का विनाश होते देखा
दिल में बुझती नहीं आज भी
चिता वही जो जलते देखा
चाह नहीं वह दिन फिर आये
फिर भी हूँ टक-टकी लगाये
विश्वास है देर होगी अंधेर नहीं
चिता शीघ्र ठंडी होगी जलेगी नहीं
क्रंदन से फटे कान उसके
दिल में चुभते कांटे
जागृत होगा मनु का समाज
युग-युग फिर खुशियाँ बांटे
“शांति” हाँ वही फिर आएगी
यह टीस आँचल में छुपाएगी
प्यार भरे हाथों से
शाश्वत नियम दुहराएगी
फिर वही कूक -सुमधुर संगीत
और हरियाली छाएगी !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१०.१०.२०११ यच पी ८.४५ पूर्वाह्न



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, October 6, 2011

कुल्लू दशहरा हिमाचल का


आइये प्रभु श्री राम के दर्शन करें और कुल्लू दशहरा हिमाचल का आनंद लें जय श्री राम .....

इसी रथ से प्रभु श्री राम एक मैदान से कुल्लू के दशहरा स्थल में बने अपने मंदिर में चलते हैं राजा महेश्वर जी और अन्य पुजारी जज आदि पूजा अर्चना कर के इन्हें रथ में बिठाते हैं फिर गाँव गाँव से आये पालकी में सवार ३०० देवता गाजे बाजे के साथ इनसे मिल चल पड़ते हैं और मनमोहक नजारा भीड़ धूम ...अब तो १० दिन मेला ...जय प्रभु श्री राम ....





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं