Thursday, February 12, 2015

बेहया -'बेशरम'



बेहया -'बेशरम'

वो आये यहाँ 
हमने धरती दिया 
खुला आसमान 
सींचा सहारा दिया
खाली जमीन !!
तालाब- बंजर पटते गए
उनमे हरियाली
खिलते गए -'फूल' !
बिना गंध- महक के
बिना काँटों के
नागफनी -  कैक्टस वे बनते गए
चुभते गए -  बढ़ते गए
फैलते गए -  यहाँ - वहां
जहाँ - तहां
अन्दर - अन्दर जड़ें
बेहया – ‘बेशरम -
भी कह डाला हमने उन्हें
काहे की शरम ! -
धोकर पी डाले लगता है  !!
कील से चुभे छाती में
चूसते 'पानी'-हरे होते जा रहे 
और हम -'बंजर'-धूल !!
दुनिया भर की संस्थाएं - कुकुरमुत्ते सी -
कुछ फैलती- 'उनसी'  
साथ जो उनके -
झंडा ले आड़े आते
हरियाली मत काटो
मत छांटो शाख
बिना कांटे के ये गड़ते-बढ़ते
लाभ लेते -सोखते
हमारी उपजाऊ जमीन का
धंसे जा रहे !!
जब तक हमारे यहाँ
हया- 'पानी' -शरम -
बाकी है !!
बेहया ये बेशरम !!
काटो तो लग जाएँ बिना पानी के
जलाओ तो विष उगलें
धुवाँ भरा - 'हानि' से
चक्कर आता अब हमें
आँखें धुंधला गयीं
न लकड़ी न फूल
पल पल अब गड़ें
जैसे हैं शूल !!
लगता हैं नया –‘बड़ा
पाल लिया -'रोग'
अब जिसे मिटाने  में -अक्षम -बेकार !!
भाई -भतीजा-है -मेरी सरकार !!
नहीं कोई साथ -
टोटका न जोग
कोई मंत्र न मूल !!
क्या लाया - लगाया
क्या कर डाली -"भूल". !!

सुरेन्द्रशुक्लभ्रमर५
24.03.2011 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

2 comments:

हिमकर श्याम said...

सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

हिमकर भाई प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत आभार
भ्रमर ५