BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Wednesday, December 26, 2012

दिया ह्रदय में रख दूंगा



दिया ह्रदय में रख दूंगा
मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा
चाह नहीं कुछ नाम कमाऊँ दिया ह्रदय में रख दूंगा !
घर में मेरे जो आएगा मान  दिए खुश कर दूंगा
जीवन मेरे जो छाएगा प्यार किये जीवन दूंगा
उपवन मेरा जो सींचेगा खुशहाली छाया दूंगा
पथ में राही साथ चले मुस्कान भरे स्वागत दूंगा
मै एक तपस्वी  कांटे बोकर प्राण भी लो ,
कभी नहीं कह पाऊँगा ..
मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा ………..

सूरज के गर साथ चलेंगे गर्मी हम पाएंगे ही
अंगार अगर हम ह्रदय रखेंगे सब भुन जायेंगे ही
गिरिवर कानन बोझ सहेंगे मन भायेंगे  शीतलता पाएंगे ही
माँ में ममता आंसू होंगे स्वर्ग धरा जीवन सफल बनायेंगे ही
मै एक दानी दान किये छाया पानी भी ना चाहूँगा -
कभी नहीं कह पाऊँगा ..मन में मेरे जो आएगा लिख के ....

रहा ताकते शून्य धरा से जल जीव यहीं पर हिले कहीं -कुछ न कुछ आता ही है
सत्कर्म, धर्म, स्वीकार-भूल से मोक्ष मिले धन -मन पावन होता ही है
मधु मीठी कुछ लोग कहें घाव रखे पर दुःख होता -मन उनका रोता ही है
दीपक पूजे राह दिखाए आग लगे श्मशान कहीं -घर मातम छाता ही है
पेड़ लगा संघर्ष किये भी -फल चाहूं ना -मै योगी -कभी नहीं कह पाऊँगा
मन में मेरे जो आएगा लिख के…………..


एक पेड़ कितनी शाखाएं लाल सबुज पातों में लिपटे झूमे ही सावन होता
चाँद जभी तारों संग खेले बुझे खिले बदली ढँक खोले कैसा मन-भवन होता
ऊँच -नीच  आडम्बर रत लाल कमाए दूर पड़े हम -मन मिलता ना रहता रोता
कर्म शर्म श्रम प्यार न देखे श्रुत भूले वैभव होता मन उनका खता है धोखा
तात -मात अपनापन भूले -पाथर पूजे स्वर्ग रहूँगा -कभी नहीं कह पाऊंगा
मन में मेरे जो आएगा ......

क्लिष्ट -कुटिल ना मुझको भायें मन को -आरोपण क्यों ?? जीवन यों ही धांधां  है
सरल -साधु नैतिकता ना उपदेश न चाहें जीवन को जिसने बांधा है
भ्रम पालें मत मानें ना दर्पण देखें ऋण भूले -कर लेता जो ही गाथा है
सीकर- को जो सी-कर पाए मारे पाथर रस खोएं फट सकता तेरा माथा है
सर्व शक्ति  है मेरे अन्दर ढाल मिला विष-पान किये भी अमर रहूँगा
कभी नहीं कह पाऊँगा मन में मेरे जो आएगा लिख के उसको रख दूंगा ...
चाह नहीं कुछ नाम कमाऊँ दिया ह्रदय में रख दूंगा !




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, November 22, 2012

ताकतवर कुत्ते


हम लोगों की आँखों के सामने
पैदा हुए कुछ पिल्ले यहीं पले बढे
दूध मलाई खाए कार में चढ़े दुलराये
भौंकते-हमें डराते ताकतवर बन जाते हैं
dangerous-dog-pic9












( फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया)
फिर झुग्गी बस्ती में आये पेट दिखाए
दुम हिलाए पाँव चाटे दोस्त बन जाते हैं
आगे पीछे घूम घूम सूंघ सूंघ सारी ख़बरें
बड़े कुत्तों तक पहुंचाते हराम की खाते हैं
दिलदार ‘आम’ आदमी दिल बड़ा रखता है
दिल से कहता है दिल की सुनता है
अच्छाई ईमानदारी गुण ही बुनता है
भागता है छुपता है डर डर चलता है
पिल्ले ये शेर बने गरजे बढे जाते हैं
नोच खोंच दर्द दिए खून पिए जाते हैं
दर्द हरण सुई लगा ‘आम’ लोग जीते हैं
दर्द व्यथा दिल जला सारा गम पीते हैं
ताकतवर कुत्ता दिन-दिन बौराता है
छेड़ – नोंच ‘गले’ चढ़े बड़ा गुर्राता है
दुम दबी -सीधी खड़ी आँखें दिखाता है
पागल है-पागल है शोर तब मचता है
लाठी ले पीट तब मार ‘आम’ हटता है
‘आम’ लोग-लाठी में बड़ी ही ताकत है
लम्बी उमर ‘भ्रमर’ – शिव-शैव ताकत है
करुण नैन त्रिनेत्र जभी बन जाता है
घास फूस महल लोक-स्वर्ग भी जलाता है
प्रेम दया जोश होश सत्य न्याय भारी है
घृणा झूठ अहम् कुनीति सदा ही हारी है !
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४० पूर्वाह्न
रविवार -कुल्लू
१४.१०.2012








दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, October 31, 2012

मै भी अभी जिन्दा हूँ !!


मै भी अभी जिन्दा हूँ !!
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तीव्र झोंके ने पर्दा उड़ा दिया
सारे बाज -इकट्ठे दिखा दिया
चालबाज, कबूतरबाज , दगाबाज
अधनंगे कुछ कपडे पहनने में लगे
दाग-धब्बे -कालिख लीपापोती में जुटे
माइक ले बरगलाने नेता जी आये
जोकर से दांत दिखा हँसे बतियाये
“ये मंच अब हमारा है” खेती है हमारी
हम ‘मालिक’ हैं पैसे पेड़ पर नहीं उगते
चाहे हम भांग बोयें कैक्टस लगायें
थाली लोटे लंगोटी गिरवी रख आयें
उत्पादन दिखाएँ रोजगार के अवसर बताएं
नहीं दस बीस को रोजगार भत्ता दिलाएं
सोचता हूँ कैसे घिघियाते तुमरे पीछे हम धाये
नोट दे वोट को हम खरीद के लाये
तुम दर्शक हो सड़े टमाटर अंडे जूते उछालो
पुतला बनाओ जलाओ मन शान्त कर जाओ
जिसकी लाठी उसकी भैंस समझ जो पाओ
आँख न दिखाओ हाड मांस जान तुम बचाओ
‘ये मंच हमारा है ‘ जूतम -जुत्ती   गुत्थम -गुत्थी
मूल अधिकार हमारा है जो हमें प्यारा है
भीड़ में दांत निपोरे खिखियाते उनके लोग
अंगारे सी आँखें बड़े बाज कबूतर का भोग
पतली गली से निकल राम लीला की ओर
मै चल पड़ा , सूर्पनखा रावण दुःशासन को छोड़
गांधी के बन्दर सा आँख मुंह कान बंद किये
बैठा हूँ- दुर्योधन-शकुनी मामा नहीं मरे
द्यूत क्रीडा जारी है युधिष्ठिर हारे हैं
कृष्ण नहीं विदुर नहीं सोच सोच कुढ़ता हूँ
चीख है पुकार है मै भी अभी जिन्दा हूँ !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ५’
२५.९.१२ कुल्लू यच पी
मंगलवार ७.१५-७.४९





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं