BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Wednesday, October 5, 2011

माँ वैष्णो देवी कुल्लू हिमाचल


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,माँ वैष्णोदेवी कुल्लू हिमाचल गुफा के अन्दर का दृश्य अँधेरा …घुटुरुवन जाओ और माँ के बच्चे सा निकल पडो …
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, माँ व्यास नदी के किनारे विराजमान अपने भक्तों की प्रार्थना सुन उनकी झोलियाँ भर रही हैं
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जय माता दी आज नवमी के दिन बड़े सौभाग्य से माँ भगवती वैष्णो देवी के दर्शन हुए ..माँ सब को ख़ुशी सुख असीम शांति प्रदान करें ….राक्षसों का संहार करें …
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कुल्लू में इस समय धूम मची हुयी है गाँव गाँव में देवता की उपासना ढोलक की थाप और बांसुरी की मदमस्त कर देने वाली आवाज मिले जुले संगीत के सुर मन मोह ले रहे है लगता है रात रात भर जागते घूमते रहें सारे हिमाचल से दूर दराज से देवता और उपासक चल पड़े हैं जगह जगह गाँव में मुख्य जन के यहाँ विश्राम टेंट लाईटें लगीं खाना पीना शोर धूम फिर आगे बढ़ते हैं दुसरे गाँव ..कल सारे देवता जो खुश होंगे कुल्लू में जा के पहुँच जायेंगे राजा जी की सवारी दोपहर एक से दो के बीच रथ यात्रा सब देवताओं का वहां पहुंचकर विराजमान होगा देश दुनिया भर के आगंतुक मेला …रत्ती भर जगह नहीं होगी कुल्लू भर जाएगा ….और फिर आनंद देवताओं का आपस में एक दुसरे का चूमना आलिंगन करना रुष्ट होना और मजिस्ट्रेट का उन्हें मनाना बहुत कुछ होगा …..सुन कर ताज्जुब होता है लेकिन देवता असली रूप में सब कुछ ……बीच मैदान में गोल तम्बू लाल सज गया है जिसमे भगवन राम विराजेंगे कल ..पुलिस प्रशाशन चुस्त दुरुस्त …महिला पुलिस टुकड़ी भी शिमला से पधार चुकी है …गजब का नजारा ….
जय माता दी ….माँ सब की खैर करें ….



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, October 2, 2011

ईमानदारी के ये दो रूपये

मेरी एक अलग जाति है
छुआ छूत है मुझसे
अधिकतर लोग किनारा किये रहते हैं
३६ का आंकड़ा है मेरा उनका
नाम के लिए मै
एक पदाधिकारी हूँ एक कार्यालय का
लेकिन चपरासी बाबू सब प्यारे है
दिल के करीब हैं
कंधे से कन्धा मिलाये
ठठाते हैं हँसते बतियाते हैं
पुडिया से दारु ..कबाब
अँधेरी गली के सब राजदार हैं
सुख में सब साथ साथ हैं
सब प्रिय हैं साथी हैं
जो भी मेरे विरोधी हैं
उनके …अरे समझे नहीं
मेरे प्रबंधक के ….
हमसाये हैं ..हमराही हैं
मेरे मुह से निकली बातें
चुभती हैं
उनके कानों कान जा पहुँचती हैं
चमचों की खनखनाहट
जोर की है
जहां मेरा रिजेक्शन का मुहर लगने वाला हो
फाईल मेरे पास आने से पहले ही
वहां तुरंत अप्रूवल हो जाता है
और मै मुह देखता
दो रोटी की आस में
दो किताबों की चाह में
जो मेरे प्यारे बच्चों तक जाती है
जो दो रूपये कल उनका भविष्य….
ईमानदारी के ये दो रूपये
तनख्वाह के कुछ गिने चुने ….
मुहर ठोंक देता हूँ
कडवे घूँट पी कर
उनकी शाख ऊपर तक है
उनका बाप ही नहीं
कई बाप …ऊपर बैठे हैं जो
मेरे पंख नोच ..जटायु बना देने के लिए
मैंने रामायण पढ़ा हैं
समझौता कर …अब जी लेता हूं
अधमरा होने से अच्छा
कुछ दिन जी कर
कुछ तीसरी दुनिया के लिए
आँख बन जाना अच्छा है
शायद कुछ रौशनी आये
मेरी नजर उन्हें मिल जाए
बस जी रहा हूँ ….
अकेले पड़ा सोचता हूँ
नींद हराम करता हूँ
जोश भरता हूँ
होश लाता हूँ
चल पड़ता हूँ …..
गाँधी जी का एक भजन गाते हुए
जोदी तोर डाक सुने केऊ ना आसे
तोबे एकला चोलो रे …..
शुक्ल भ्रमर ५
२.१०.२०११
यच पी

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं