BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Monday, April 18, 2011

गोकुल का आनंद समेटे- सत्य नारायण का प्रसाद हैं


सत्य नारायण का प्रसाद हैं


सरयू पावन की गोदी में
शिव ने हमें दुलारा 
माँ-सरोज ने हमें खिलाया 
कीचड़ में ये कमल उगा 
राजा राम दिए आदर्श 
शंखनाद फिर राम-राज्य का
जय जय राम घोष स्वर गूंजा 
सीता राम की मूर्ति दिल ले 
सत्यम शिवम् सुंदरम को भज 
तुलसी की मै राह चला 
करी वंदना और साधना
गंगा--गोदावरी सरस्वती की
ममता पा के
बरस उठा घन-श्याम मेह
बचपन गोदी माँ की छोड़े
चौरासी में भटक रहा
कर्म क्षेत्र उजियारा बिजली
भारत बाहर -जहाँ तहां
मधुर-मधुर फिर गीत रचे
दर्द और दर्पण ने दिल  के
खुश्बू बेला की माटी पा
अवधपुरी अवधी प्रतापगढ़
रामायण की बिखरी खुश्बू
प्राणवायु को साँस समेटे
अब मन -मयूर बन
गली -गली में गाँव गाँव में
रोम-रोम में होकर पुलकित
सभी दिशा सागर झीलों में
जन मानस के बीच आज है
लहर -लहर सुर वीणा झंकृत
कभी वीर रसकभी धीर तो
धर्म कर्म करुणा से सज्जित
सोलह कला और श्रृंगार से
कविता को यों सजा रहा
लगता जैसे कोई अप्सरा
कोई मेनका !!
घुंघरू पहने नाच रही हो
इंद्र धनुष सतरंगी रंग से
नील गगन को लाल किये वो
धानी चुनरी सराबोर कर
होली खेले लाल हुयी हो
वो गुलाल सी -खिल गुलाब सी
सेब सरीखी लिए गाल वो
सूरज की आभा होंठो ले
प्रभा तेज ले चली चूमने
विश्वामित्र के योग सत्य को
कामदेव को रूपमती वो
यौवन मदिरा मस्त नैन के
प्याले में भर
जाम पिलाये
माया जाल पाश में बांधे
कोई बवंडर भँवर सरीखी
वो अनन्त सागर में जैसे
चली डुबाने   !!
मै ही सब हूँ या मै क्या हूँ ???
प्रेम परीक्षा प्यार सिखाने 
खुद का भी अस्तित्व मिटाने 
जन कल्याण में किसी हवन में
कूद पड़ी हो !!
जली चली बलिदानी वो फिर
खुश्बू बनकर उड़ निकली हो
इसी धरा पर -फिर से फिर से
प्राण वायु बन
तेरे अन्दर -
मेरे अपने -अपने अन्दर !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर

26.3.2011
जल पी.बी.



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

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Friday, April 15, 2011

अरे लुटेरे भाई तेरी - क्या दूकान चली है


अरे लुटेरे भाई तेरी -
क्या दूकान चली है
कल तक तो तू जुआ खेलता
गलियों में था दर्शन देता
अब 'पद्मावती' में घूमे - जाये
दिल्ली पहुंचे तो उड़ जाये
सागर के उस पार !!

कोई महिला -कहीं अकेली
या कायर हो पुरुष कहीं
पल भर तू फिर नहीं चूकता
हाथ सफाई-लगे कसाई !!

कामाख्या का जादू सीखा

एक खिलाडी को ना- छोड़ा

टूट –फूट- कर ‘सपने बिखरे 

फिर भी कहती मै ना हारी
ये है नारी !!  अरे लुटेरे
ले ली उसकी टांग
तुझको ना नरसिंह मिलें
कभी बिठाते जांघ !!



अगर लूटना है तो लूटो
लूट  रहे जो घूमे
उसी ट्रेन में टी. टी. से मिल
जेब भरे - है - घूमे
एक तमाचा जड़ दो उसको
ताकत अपनी दिखा वहां तू
पहलवान बन जाओ !!

अगर काटना पाँव ही तुझको
सोये -देखो ड्यूटी- हैं वो
लूट रहे -सरकार- खजाना
उनको जा के लूटो !!

कल तेरी माँ -बहना भी
सफ़र कहीं - जो कहीं अकेली
तेरे भाई मिल जायेंगे -देर नहीं
काट-काट कर- डालें -बोटी !!

इसी ट्रेन में अपनी -सेना
लव-‘लश्कर के साथ चले है
माना तेरी सीमा तय है
दुश्मन से तू देश के भाई
जान लड़ाए रोज लड़े हैं
आँख खोल कर प्यारे देखो
दुश्मन तेरे साथ चले हैं
कभी कहीं कुछ मोड़ जो आये
चलती ट्रेन कहीं रुक जाये
थोडा सा तुम जागो भाई
चीर- हरण या कोई लुटेरा
आह भरी कानो जब आये
कृष्ण हमारे कुछ कर जाओ  !!!



कार खड़ी कर सड़कों पर हम
कितना जाम लगायें -
ले परिवार शाम को आयें
वो फुल्के की और बताशा
चाट -चाटने -मटरू वाली
क्या दूकान लगी है
उस बर्तन में "मूते" -जाये
क्या संदेशा  दुनिया  छाये !!
इन जैसों से भी डरना क्या-
लोकपाल बिल लाना ??

चार साल की बच्ची - माँ- को
दफ़न किये हैं घर उसके
ताला उसके  घर में लाये
कुछ हजार जो ना ले पाए
है पंजाब की घटना सच्ची  
है -ये चेहरा- एक "पुलिस" का
लाज-शर्म सब खाए
चुल्लू भर पानी ना डूबें
ये रक्षक कहलायें !!

कहें भ्रमर "कैप्टन" की मानों
पकड़ इन्हें तुम उल्टा टांगो 
मूर्ति - इनकी ना पत्थर की
हर चौराहे एक- एक -कर
जिन्दा ही तुम कभी लगा दो

जिसके ‘दिल में जान अभी -
धड़कन कुछ जिन्दा है भाई
रोको तुम है लुटी कमाई
जागो तुम -
अभी वक्त है -
दर्द बढ़ रहा - दिन प्रतिदिन है
ठेस लगी है -
खून बह रहा -
घाव कही नासूर बने ना
जगा रही है रोती  माई !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१५.०४.2011


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं