BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Sunday, April 10, 2011

मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए


मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए 

आज प्रभा ने भिनसारे ही 
मुस्काते अधरों से बोला 



कितने प्यारे लोग धरा के
उषा काल सब जाग गए हैं 
घूम रहे हैं हाथ मिलाये 
दर्द व्यथा सब चले भुलाये 
सूर्य-रश्मि सब साथ साथ हैं
कमल देख ये खिला हुआ है
चिड़ियाँ गाना गातीं 
हवा बसंती पुरवाई सब
स्वागत में हैं आई
सूरज नम है तांबे जैसा 
जल निर्मल झरना कल-कल है
नदी चमकती जाती 
सागर बांह पसारे पसरा 
लहरें उछल उछल के तट पर  
चरण पखारे  आतीं
हे मानव तू ज्ञानी -ध्यानी
प्रेम है तुझमे कूट भरा
शक्ति तेरी अपार - है अद्भुत
हाथ जोड़ जो खड़ा हुआ
खोजे जो कल्याण भरा हो
मधुर मधुर जो कडवा हो
कड़वाहट तो पहले से है
पानी में भी आग लगी है
तप्त ह्रदय है जलती आँखे
लाल -लाल जग जला हुआ है
खोजो बादल-बिजली खोजो
सावन घन सा बरसो आज
मन -मयूर फिर नाचे सब का
हरियाली हो धरा सुहानी
छाती फटी जो माँ धरती की
भर जाये हर घाव सभी
सूर्य चन्द्र टिमटिम तारे सब
स्वागत-मानव-तेरे आयें
निशा -चन्द्र-ला मधुर-मास सब
थकन तेरी सारी हर जाएँ
मानवता को हे मानव तू
अमर करे
अमृत पिला -जिलाये !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
१०..२०११ जल पी.बी.

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं 

Saturday, April 9, 2011

हे ‘माँ’ तू है कितनी ‘भोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप के ‘रो’ ली


 हेमाँ’ तू है कितनीभोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप केरो’ ली
हेमाँ’ !!  मुझको क्षमा करे तू
मुझको गुस्सा तुझ पर आता !
कुछ भी यहाँ बनाती जाती
अर्थ -हीन है -रस -विहीन जो
आग भरी है जिनके दिल में
‘होली’ उन्हें जलाना आता
रंग जिन्हेंकाला’ ही भाता
जो जाने हीरा’-मोती’
‘कौआ’   -‘कोयला’ बस मन भाता
‘धवल ‘–‘चांदनी’-‘श्वेत’-‘ दिवस’ ना
‘अँधियारा’-‘रजनी’- ही भाता
तोड़ फोड़ करपुष्पों’ को वे
‘राह’ में फेंके जाते
रोज एकफुलवारी’ नोचे
सभा  मेंनाच’- ‘नचाते’
‘चीर’-‘हरण’ कर घूमे जाता  
नहींकृष्ण’ अब- ‘कंस’ कहे -है
हँस -हँस  घूमे
छुरा’ घोंप केसीने’ में
वो अपनीमाँ’ के
‘बाप’ के अपने
‘बदनाम’ करे है
‘मानवता’ को लूटे
चोर-सिपाही तंत्री मंत्री 
‘घर’ –‘आँगन’ से ‘संसद’ तक 
जो खड़ा हुआ हैरक्षक’-‘भक्षक’ 
‘माँ’   तूने उसे बनाया 
‘पाल’ –‘पोष’  कर 'आँचल' अपने
तूनेदूध’ पिलाया 
‘गढ़ने’ में क्या ‘भूल’ हुयी माँ
कहाँ –कभी- क्या तुमने सोचा??



 वो 'त्रिशूल' क्यों आज 'शूलहै
याद करो कुछबचपन’ के दिन
‘आग’ लगाया था उसनेघर’
बढ़ी नदी में कूदा
गुडिया तोड़फेंक’ देता वो
कभी जलाताहोली’
बिन- मौसम के बरस वो जाता
थाली देता फेंक
उनकी जेब थी खाली होती
नौकर पर लगती थी चोरी
‘लात’ मारता था जब तुझको 
‘दर्द’ तुम्हे था होता ??
कहती थीअनजान’ तू उसको 
बड़ाभरम’ ये होता
‘कान’ पकड़ ना उसे सिखाया
तूने तो बसचाँद’ दिखाया
‘लोरी’ गा-गा उसे सुलाया
हेमाँ’ तू है कितनी भोली !!
‘पुचकारे’ -  गोदी’ में भर के
"दर्द' हुआ तो चुप के –‘रो’ ली !!
मै हूँ तेरालाल’ वही माँ
लौट नहीं अब पाऊँ !!
गुस्सा तुझ पर मुझको आता
अब ना कुछ कर पाऊँ 
‘काटे’ सेकदली’ फले
कैसे मै समझाऊँ !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
..२०११