Tuesday, April 12, 2011
Check out नौवां दिन – माता सिद्धिदात्री का – आइये इनकी चरण वंदना करें « Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'
Check out नौवां दिन – माता सिद्धिदात्री का – आइये इनकी चरण वंदना करें « Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'
Sunday, April 10, 2011
मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए
मानवता को हे मानव तू अमृत पिला जिलाए
आज प्रभा ने भिनसारे ही
मुस्काते अधरों से बोला
कितने प्यारे लोग धरा के
उषा काल सब जाग गए हैं
घूम रहे हैं हाथ मिलाये
दर्द व्यथा सब चले भुलाये
सूर्य-रश्मि सब साथ साथ हैं
कमल देख ये खिला हुआ है
चिड़ियाँ गाना गातीं
हवा बसंती पुरवाई सब
स्वागत में हैं आई
सूरज नम है तांबे जैसा
जल निर्मल झरना कल-कल है
नदी चमकती जाती
सागर बांह पसारे पसरा
लहरें उछल उछल के तट पर
चरण पखारे आतीं
हे मानव तू ज्ञानी -ध्यानी
प्रेम है तुझमे कूट भरा
शक्ति तेरी अपार - है अद्भुत
हाथ जोड़ जो खड़ा हुआ
खोजे जो कल्याण भरा हो
मधुर मधुर जो कडवा न हो
कड़वाहट तो पहले से है
पानी में भी आग लगी है
तप्त ह्रदय है जलती आँखे
लाल -लाल जग जला हुआ है
खोजो बादल-बिजली खोजो
सावन घन सा बरसो आज
मन -मयूर फिर नाचे सब का
हरियाली हो धरा सुहानी
छाती फटी जो माँ धरती की
भर जाये हर घाव सभी
सूर्य चन्द्र टिमटिम तारे सब
स्वागत-मानव-तेरे आयें
निशा -चन्द्र-ला मधुर-मास सब
थकन तेरी सारी हर जाएँ
मानवता को हे मानव तू
अमर करे –
अमृत पिला -जिलाये !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१०.४.२०११ जल पी.बी.
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं
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Saturday, April 9, 2011
हे ‘माँ’ तू है कितनी ‘भोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप के ‘रो’ ली
हे ‘माँ’ तू है कितनी ‘भोली’-‘दर्द’ हुआ तो चुप के ‘रो’ ली
हे ‘माँ’ !! मुझको क्षमा करे तू
मुझको गुस्सा तुझ पर आता !
कुछ भी यहाँ बनाती जाती
अर्थ -हीन है -रस -विहीन जो
आग भरी है जिनके दिल में
‘होली’ उन्हें जलाना आता
रंग जिन्हें ‘काला’ ही भाता
जो जाने न ‘हीरा’- ‘मोती’
‘कौआ’ -‘कोयला’ बस मन भाता
‘धवल ‘–‘चांदनी’-‘श्वेत’-‘ दिवस’ ना
‘अँधियारा’-‘रजनी’- ही भाता
तोड़ फोड़ कर ‘पुष्पों’ को वे
‘राह’ में फेंके जाते
रोज एक ‘फुलवारी’ नोचे
सभा में ‘नाच’- ‘नचाते’
‘चीर’-‘हरण’ कर घूमे जाता
नहीं ‘कृष्ण’ अब- ‘कंस’ कहे -है
हँस -हँस घूमे
‘छुरा’ घोंप के ‘सीने’ में
वो अपनी ‘माँ’ के
‘बाप’ के अपने
‘बदनाम’ करे है
‘मानवता’ को लूटे
चोर-सिपाही तंत्री मंत्री
‘घर’ –‘आँगन’ से ‘संसद’ तक
जो खड़ा हुआ है ‘रक्षक’-‘भक्षक’
‘माँ’ तूने उसे बनाया
‘पाल’ –‘पोष’ कर 'आँचल' अपने
तूने ‘दूध’ पिलाया
‘गढ़ने’ में क्या ‘भूल’ हुयी माँ
कहाँ –कभी- क्या तुमने सोचा??
वो 'त्रिशूल' क्यों आज 'शूल' है
याद करो कुछ ‘बचपन’ के दिन
‘आग’ लगाया था उसने ‘घर’
बढ़ी नदी में कूदा
गुडिया तोड़ ‘फेंक’ देता वो
कभी जलाता ‘होली’
बिन- मौसम के बरस वो जाता
थाली देता फेंक
उनकी जेब थी खाली होती
नौकर पर लगती थी चोरी
‘लात’ मारता था जब तुझको
‘दर्द’ तुम्हे था होता ??
कहती थी ‘अनजान’ तू उसको
बड़ा ‘भरम’ ये होता
‘कान’ पकड़ ना उसे सिखाया
तूने तो बस ‘चाँद’ दिखाया
‘लोरी’ गा-गा उसे सुलाया
हे ‘माँ’ तू है कितनी भोली !!
‘पुचकारे’ - ‘गोदी’ में भर के
"दर्द' हुआ तो चुप के –‘रो’ ली !!
मै हूँ तेरा ‘लाल’ वही माँ
लौट नहीं अब पाऊँ !!
गुस्सा तुझ पर मुझको आता
अब ना कुछ कर पाऊँ
‘काटे’ से ‘कदली’ फले
कैसे मै समझाऊँ !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४.२०११
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