BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN

Friday, August 28, 2015

रक्षा बंधन

रक्षा बंधन पावन पर्व के शुभ अवसर पर सभी प्यारी बहनों और सभी मित्रों को ढेर सारी शुभ कामनाएं सभी बन्धु बांधव प्रिय जन सज्जन भाइयों को उनका प्रेम सदा मिलता रहे बहने सदा ख़ुशी और शांति से जीवन के सोपान पर अग्रसर हों सब सदा उनका सम्मान और मान रखें ये अनमोल राखी का बंधन सदा एक दूजे को प्रेम के बंधन में बांधे रखे बालपन का वो अबोध प्यार सखा भाव लिए भाई सदा बहना की रक्षा में तत्पर रहे 

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, August 24, 2015

नर्सिंग होम

नर्सिंग होम 
कुकुरमुत्ते सा उगा 
व्यापार  का नया धंधा 
फलता -फूलता 
ना हो कभी मंदा 
मेडिकल वाले उन्हें ही 
अच्छा बताते हैं 
रिक्शे वाले भाई 
पकड़ यहाँ लाते हैं 
भाड़ा नहीं - 'कमीशन' ले जाते हैं 
अच्छा सा होटल है -ए.सी. है 
हीटर है, गीजर है 
टी वी है केबल है 
पानी की बोतल-ग्लूकोज है 
काफी हाल में बस 
चहल -पहल -दिखता है 
गली नुक्कड़ -चौराहे पर 
खुले -होटल से शो -रूम 
सजी नर्सें केरल से -
कन्या कुमारी का झरोखा दिखाती है 
पांच सौ रूपये में रखी -
कुछ जूनियर डाक्टर्स भी 
जबरन मुस्का जाते हैं 
बड़े बड़े बोर्ड -दस-काबिल डाक्टर 
लिखे दिख जाते हैं 
भर्ती होने के बाद -चीखते - मरते 
बमुश्किल -एक -नजर आते हैं 
भर्ती से पहले -
जेब तलाश ली जाती है 
फिर उपचार -आपरेशन 
जंग -शुरू हो जाती है 
अपनी टांगों पर चल के निकलें 
या चार कन्धों पर 
पहले पूरी रकम -पूँजी 
जमा कर ही -छुट्टी दी जाती 
बेबस लाचार जो केवल 
रोटी ही जाने हैं 
डॉक्टर बाबू को  भगवान माने हैं 
नहीं जानें एक - दो 
क्या जानें किडनी - खून 
बच बचा के जान 
बेचारे कुछ दिन में 
चोरी से भागे हैं !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर "५ 
प्रतापगढ़ उ.प्र.२६.०७.२०११

६.१५ पूर्वाह्न जल पी बी 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, July 9, 2015

मेरी आँखों में झांको तो

मेरी आँखों में झांको तो
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दो चार महीने का बच्चा वो
उस किरण पुंज में झांक रहा है
आभा-रिश्ता-प्रिय-चाहे क्यों??
तिमिर अकेले चीख रहा है

ये किरणे उसके आशा की किरणे लगती
नन्ही स्वप्निल आँखों से देखे जगती
कल का भविष्य कुछ देख रहा है
नन्हे हाथ चलाये सागर तैर रहा है
अनुरागी है प्रेम पिपासा मन में आशा
अंधकार ये समझे ना जो जग में खासा
व्याप्त आज -बदली है सारी परिभाषा
अर्थ-मूल्य-अब -भाव-नहीं अब पहले सा
ऊँगली से गणना करके कुछ जान रहा है
होगा क्या कल चेहरे कुछ पहचान रहा है
घबराहट इस दिल की देखे कुछ हंस देता है
मूर्ख-निमित्त-आया किसके -वो- हंस देता है
इच्छा रख-कर कर्म-सपने तो देखो
ज्ञान -सीख-समता सब में रख -प्रभु को देखो
वही नियन्ता ज्ञान ज्योति हर मन में पैठा
मुझ सा अबोध बन संग में खेलो -देखो-बैठा
हंसा रहा है -रुला रहा है-राग-कभी तडपाये
कठपुतली -हम नाचें बस -सब -वो-ही करवाए
हम सब को भेजा है उसने प्रेम का पाठ पढ़ाने
मेरी आँखों में झांको तो सच या झूठ तू जाने !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
८.४.२०११
(लेखन १५.६.१९९६ १०.५० मध्याह्न हजारीबाग-झारखण्ड)
आइये आप को हम अपने दर्द से अलग आज बाल- झरोखा दिखाएँ बाल रस हम सब के मन में समां जाये हम बच्चे सा सच्चा मन ले निःस्वार्थ नाच कूद मिल जुल , कभी झगड़ भी पड़ें अगर तो फिर मिल जाएँ



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं