Monday, May 11, 2015

आओ माँ मै पुनः चिढाऊं



आओ माँ मै पुनः चिढाऊं

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(mother with father )

मन कहता मै पुनः शिशु बन

 माँ के आँचल खेलूँ

कल्पवृक्ष सम माँ ममता संग

गोदी खेले प्रेम का सागर पी लूँ

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मुझे निहारे मुझे दुलारे

तुतला गाये शिशु बन जाए

हो आनंदित हर सुख पाये

माँ को मेरी 'आँच ' न आये

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मुझमे माँ का प्राण बसा है

माँ के प्राण मै वास करूँ

मेरे दुःख से दुखी वो होती

धन्य जननि शत नमन करूँ

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जननी माँ तू जग कल्याणी

शक्ति प्रेम सब में भरती

गुरु माँ तू आलोकित करती

'पीड़ा' तम जग की हरती

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कभी खिलाने कभी खोजने

पीछे पीछे मेरे भागी

रुष्ट हुआ वीमार हुआ तो

रात-रात सोची जागी

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क्षुधा हमारी पीड़ा मेरी

जादू जैसे मुझसे पहले तू जाने

भूखी रह तू तृप्त है करती

दुर्गा काली नीलकंठ तू जग जाने

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कभी घटुरुवन कभी खड़ा मै

गिर-गिर उठता सम्हल गया

याद तुम्हारी ऊँगली की माँ

थामे बढ़ा पहाड़ चढ़ा

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शत शत नमन करूँ हे माता

मेरी उम्र तुम्हे लग जाए

करुणा निधान वारें हर खुशियाँ

लेश मात्र दुःख छू ना पाये

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दुःख सुख में माँ ही मुख निकले

'लोरी' जीवन झंकृत करती

नहीं 'उऋण' माँ जग कुछ कर ले

'जीवन' दान जो तू जग करती

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कर-कमलों को सिर पर मेरे

रख देना -देना आशीष

'सूरज' चंदा जो ये तेरे

करें उजाला -माँ के साथ

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तेरी ममता का बखान मै

लिखता लिखता तक जाता

सृजती रूप धरे माँ नवधा

रोता-जाता माँ माँ केवल लिख पाता

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रोम-रोम हर कण माँ मेरे

रूप धरे- प्रभु वास करे

सात्विक गन संस्कार ये मेरे

'नौका' बन भव पार करे

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सीख मिली जो बचपन माता

गुण गाता ना कभी अघाता

जनम -जनम मै शिशु तू माता

पुनः मिले ये करें विधाता

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दे आशीष सदा दिल तेरे

टुकड़ा-दिल बन रह जाऊं

उऋण भले ना माँ मै तुझसे

'प्रेम' तेरा तुझ संग मै बांटूँ

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आओ माँ मै पुनः चिढाऊं

डाँट मार कुछ खाऊं

कान पकड़ फिर 'राह ' मै पाऊँ

ना भटकूँ आँचल छाँव में सो जाऊं

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

मातृ दिवस पर

८-८.२० मध्याह्न १०-मई -२०१५

कुल्लू हिमाचल प्रदेश भारत 




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

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