Saturday, March 14, 2015

ख्वाबों में आया राम-राज्य

भोला हूँ मै, भोले शिव सा
भगवान द्वार मेरे आये
प्रेम हमारा यों उपजा –
बस कृष्ण -सुदामा दृग छाये
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ख्वावों से रिश्ते जोड़ लिए
ढह गयी हकीकत महलों सी
मन के पंखे हैं , ख्वाब खिले-
माँ -बाप ! गयी गर जमीं सभी
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श्रम किया बहुत पग छाले हैं
कुछ भरा उदर , सपने तो इतने सारे हैं
पानी , बिजली , छत रोजगार
शिक्षा संस्कृति अब ना गुहार !
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ख्वाबों में आया राम-राज्य
धरती अपनी अब स्वर्ग बनी
महका गुलशन चिड़ियाँ चहकीं
‘आम’ ही क्षत्रप घर सुराज्य
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झूठ -फरेब दुष्ट दुःशासन
मिटे सभी -सपने प्यारे हम देख रहे
पैठे गृह अब भी सब बलात्
कब सोएं रावण -राक्षस हैं ताक रहे
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जो ओज ऊर्जा कण-कण भर
हमने इतिहास बदल डाला
आओ खोलें दृग पल-पल रच
बदलें -मानस मन नया नया
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जब मिटे ईर्ष्या—पाखंड झूठ
सच पनपेगा —-तब ह्रदय प्रेम
फिर भोर —उजाला दिव्य रूप
साधन सुख -ज्ञान गीता के बस कर्म योग
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
४-५.३५ पूर्वाह्न
कुल्लू हिमाचल



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-03-2015) को "ख्वाबों में आया राम-राज्य" (चर्चा अंक - 1918) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आदरणीय शास्त्री जी आप के स्नेह से गदगद हुआ मन आभार
भ्रमर ५

KAHKASHAN KHAN said...

बहुत सुंदर प्रस्‍तुति।

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर रचना,आ. भ्रमर जी.
नई पोस्ट : बीत गए दिन

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय राजीव भाई आभार प्रोत्साहन हेतु
भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय कहकशां खान जी स्वागत है आप का यहां ..बहुत अच्छा लगा आप से प्रोत्साहन मिला रचना आप के मन को छू सकी सुन हर्ष हुआ आभार भ्रमर ५