Wednesday, April 30, 2014

मजदूर

मजदूर
---------
(photo with thanks from google/net)



चौक में लगी भीड़
मै चौंका , कहीं कोई घायल
अधमरा तो नहीं पड़ा
कौतूहल, झाँका अन्दर  बढ़ा
वापस मुड़ा कुछ नहीं दिखा
'बाबू' आवाज सुन
पीछे मुड़ा
इधर सुनिये !
उस मुटल्ले  को मत लीजिये
चार  चमचे साथ है जाते
दलाल है , हराम की  खाते
एक दिन का काम
चार दिन में करेगा
नशे में दिन भर बुत रहेगा
बच्चे को बुखार है
बीबी बीमार है
रोटी की जरुरत हमें है बाबू
हम हैं, हम साथी ढूंढ लेंगे
मजदूरी भले बीस कम- देना
कुछ बीड़ी  फूंकते
तमाखू ठोंकते
कुछ खांसते हाँफते
कुछ हंसी -ठिठोली करते
चौक को घेर खड़े थे
मानों कोई अदालत हो
निर्णय लेगी
फैसला रोटी के हक़ का
आँख से पट्टी हटा देखेगी
टूटी -फूटी साइकिलें
टूटी  -सिली चप्पलें
पैरों में फटी विवाई
मैले -कुचैले कपडे
माथे पे पड़ी सिलवटें
घबराहट
मजदूर बिकते हैं
श्रम भूखा रहता है
बचपन बूढा हो रहा
कहीं बाप सा बूढा
कमर पर हाथ रखे
सीधे खड़े होने की कोशिश में लगा

एक के पीछे , चार भागते
फिर मायूस , सौदा नहीं पटा 
काश कोई मालिक मिलता
चना गुड खिलाता 
चाय पिलाता
नहीं तो भैया , काका बोलता
बतियाता व्यथा सुनता
और शाम को हाथ में मजदूरी ...
किस्मत के मारे बुरे फंसे
कंजूस सेठ से पाला पड़ा
बीड़ी पीने तक की मोहलत नहीं
झिड़कियां , गालियां पैसा कटा -
मिल जाएँ तो अहसान लदा 
कातर नजरें मेरा मन कचोट गयीं
मैंने बड़ी दरियादिली का काम किया
बीस  रुपये निकाल हाथ में दिया
खा लेना , काका मै चला
बाबू ! गरीब के साथ मजाक क्यों ?
किस्मत भी ,आप भी, सभी
काम दीजिये नहीं ये बीस ले लीजिये
भूखे पेट का भी सम्मान है
अभिमान है श्रम का
मै सोचता रहा
और वो अपनी पोटली खोल
एक कोने में बैठ गया
कुछ दाने, चबाने- खाने
न जाने क्यों
मेरे कानों में शब्द गूंजते रहे
काम दीजिये
काम दीजिये
बच्चे को बुखार है
मजदूर इतने ..
मजबूर कितने ......
================

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
११.१५-११.४५ मध्याह्न
२६.२.२०१४
करतारपुर जालंधर पंजाब


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, April 27, 2014

जन्म दिन मुबारक सत्यम








प्रिय मेरे नन्हे मुन्ने दोस्तों आदरणीय और प्रिय मित्र गण आज हमारे सुपुत्र  गिरीश कुमार शुक्ल 'सत्यम' का जन्मदिन है इस शुभ अवसर पर जैसे हम दूर दूर से दुवाए दे आज सत्यम का जन्म दिन मना  रहे हैं आप के लिये ये केक और मुख मिठास का यहॉं अयोजन है क़ृपया अपना स्नेहिल आशीष अपने  सत्यम को प्रदान करें आइये बच्चों को भरपूर प्रेम दें और अपनी इस भावी पीढ़ी को अपनी प्यारी संस्कृति और इस भारत भू के प्रेम , प्यार से भर दे ताकि इस भारत भू की रज मे ये पौधे खिलें खिलखिलाएं और इस अपने चमन को अपने सत्कर्मों से गुलजार करें गुल गुलशन महके और हम सब इस फुलवारी का आनन्द ले सकें

आप सब का बहुत बहुत आभार 


प्रिय सत्यम ये ख़ुशी का दिन बार बार यूं ही आये प्रभु तुम्हे दीर्घायु करे खुशियाँ फलें फूलें इस ऑगन मे , अपने प्रेम सुकर्मों से सब का मन जीतो सब के प्यारे बनो समाज़ मे अपने अस्तित्व को अपने नाम की छाप बनाओ जन्म दिन मुबारक हो
पिताश्री और समस्त परिवार
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ भारत

बच्चे मन के सच्चे हैं फूलों जैसे अच्छे हैं मेरी मम्मा कहती हैं तुझसे जितने बच्चे हैं सब अम्मा के प्यारे हैं --



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, April 22, 2014

कटी-पतंग

कटी-पतंग
-----------------------
सतरंगी वो चूनर पहने
दूर बड़ी है
इतराती बलखाती इत-उत
घूम रही है उड़ती -फिरती
हवा का रुख देखे हो जाती
कितनों का मन हर के फिरती
'डोर' हमारे हाथ अभी है
मेरा इशारा ही काफी है
नाच रही है नचा रही है
सब को देखो छका रही है
प्रेम बहुत है मुझे तो उससे
जान भी जोखिम डाले फिरता
दूर देश में इत उत मै भी
नाले नदियां पर्वत घाटी
जुडी रही है बिन  भय के वो
मुड़ी नहीं है, अब तक तो वो
कितनी ये मजबूत 'डोर' है
कच्चा बंधन, पक्का बंधन
चाहत  कितनी प्रेम है कितना
कौन  संजोये मन से कितना
कितनी इसे अजीज मिली है
खुश -सुख बांधे 'डोर' मिली है
कुदरत ने बहुमूल्य रचा है
'दिल' को अभी अमूल्य रखा है
डर लगता है कट ना जाये
या छल बल से काटी जाए
कहीं सितारों पे ललचाये
'आकर्षण' ना खींचती जाए
'प्रेम' का नाजुक बंधन होता
टूटे ना 'गठ-बंधन' होता
होती गाँठ तो लहराती है
हाथ न अपने फिर आती है
कटी-पतंग बड़ी ही घातक
लुटी-लुटाई जाती घायल
हाथ कभी तो आ जाती है
कभी 'डोर' ही रह जाती है
यादों का दामन बस थामे
मन कुढ़ता,  ना लगे नयी में
जाने नयी भी कैसी होगी
कैसी 'डोर' उड़े वो कैसी ??
विधि-विधान ना जाने कोई
क्या पतंग क्या डोर - हो कोई 
रचना अद्भुत खेल है पल का
नहीं ठिकाना अगले कल का ..
===================

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
६.००-६.३० पूर्वाह्न
४.३.२०१४
करतारपुर जालंधर पंजाब


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, April 9, 2014

अलबेला जी को विनम्र और हार्दिक श्रद्धांजलि





कल अचानक फेस बुक पर मिली खबर से दिल झन्न हो उठा कि हमारे प्यारे दुलारे नेक इंसान अलबेला जी हम सब को विलखता सोचता छोड़ इस नश्वर संसार से विदा हो गए कुछ दिनों से फेफड़ों में इंफेक्शन से परेशान थे और सूरत के नानपुरा स्थित महावीर कॉमा  अस्प्ताल में कॉमा में अंतिम साँसे ले सब कुछ छोड़ चले !
अलबेला खत्री जी एक महान हास्य कलाकार थे जो करीब २६ वर्षों से ६००० मंचो पर भारत तथा भारत के बाहर मंचन कर चुके थे वे एक हास्य कलाकार के साथ ,  कविता लेखन , कहानी और लेख लेखन , अभिनय , गीतों की धुन बनाने में भी माहिर थे और अपने गीत गायन से मन जीत लेने वाले भी थे कोई अहं नहीं था एक सादगी भरे मिलनसार इंसान थे  इन्हे टीपा  और बागेश्वरी पुरस्कार भी मिल चुका है , इनकी रचनाओं  का रसास्वादन इन के ब्लॉग पर  भी लिया जा सकता है http://albelakhari.blogspot.in/

आज के युग में किसी को हँसाना कितना कठिन कार्य है लेकिन वे ये दवा आजीवन बांटते रहे एक महान  हास्य कलाकार जहां जिससे मिलते उसके दिल में घर कर लेते कुछ दिनों से जब से हम ओपन बुक्स आन लाईन मंच पर मिले बातें दिलों की सांझा होती रहीं बड़ा आनंद आता था एक अजब मिठास और अब यादें ही यादें सूनापन , एक रिक्त स्थान। . प्रभु उनकी आत्मा को शान्ति दे और उनके करीबी जन को ये दुःख सहने की शक्ति। .
भ्रमर ५


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, April 7, 2014

लाख हजार दिए विधवा को

लाख हजार दिए विधवा को
————————-
छल बल सारे अस्त्र से
जनता रहे डराय
बोटी-बोटी काट दूं
जो हमरे आड़े आय
जाति धर्म में बाँट के
हर गुट करते राज
ईमाँ इन्सां जो चले
धोखा हर पल खाय
हम जो चले सफाई देते
सौ सौ प्रश्न लिए आते
उन गुंडों के पास वे
एक नहीं लेकर जाते
आँख तरेरे छीन कैमरा
जान की धमकी दे जाते
अपने विकास को आसमान पे
जनता घुट्टी पिलवाते
राज-नीति अब है गन्दी
‘वे’ मिल हमको लड़वाते
लाख हजार दिए विधवा को
फोटो अपनी छपवाते
कितने मरे -मिले ना अब तक
‘राज’ -राज ये कैसा भारत ?
गर्व करें हम जिस संस्कृति की
आओ झांके क्या ये भारत ?
चीख पुकार शोरगुल भय है
निशि दिन होता अत्याचार
हे ! माँ भारति न्याय कहाँ है ?
क्यों कुनीति दम्भी का राज ?
प्रेम सहिष्णुता दया दबी रे !
सच्चाई का बलात्कार
डर डर जनता खाती जीती
चंहू ओर बस हाहाकार
‘भ्रमर’ कहें जनता जनार्दन
शक्ति अपनी पहचानो
पांच साल से कुम्भकर्ण थे
जागो-देखो-कुछ कर डालो
छल से बच रे ! मीठा बोल
“वोट’ नकेल ‘मगर’ डालो …
—————————–
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ५ ”
जम्मू ३०.०३.२०१४
६.२० -६.५० पूर्वाह्न




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं