Monday, March 31, 2014

कनक कनक रम बौराया जग


किसको किसको मै समझाऊँ
ये जग प्यारे रैन बसेरा
सुबह जगे बस भटके जाना
ठाँव नहीं, क्या तेरा-मेरा ??
आंधी तूफाँ धूल बहुत है
सब है नजर का फेरा
खोल सके कुछ चक्षु वो देखे
पञ्च-तत्व बस, दो दिन मेला
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कनक कनक रम बौराया जग
भौतिक खेल-खेल में डूबा
पीतल चमक खरा सोना ना
बूझ पहेली पूरा-पूरा
हीरा कोयले में मिलता रे !
यह जग प्यारे बड़ा अजूबा
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सूरज ना धरती से निकले
नहीं समाये ये रे ! धरती
ललचाये ना -’देखा’ होता
सार-सार गहि तजि दे थोथा
खाद उर्वरक कर्म न डाले
क्या पायेगा वंजर धरती
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कभी चांदनी कभी अँधेरा
सूखा वर्षा फटता बादल
रचा कभी पल मिट है जाता
देख ‘सूक्ष्म’ सत का हो कायल
कुदरत ने भेजा रचने को
जोश प्रेम से रच हे! पागल
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लोभ मोह ना करे संवरण
ईहा क्रोध राग अति घातक
शान्ति-त्याग जप जोग वरन कर
ऋणी ऋणात्मक काहे पातक ?
तू न्यारा तेरी रचना न्यारी
प्रिय बन जा रे ! मन कर पावन
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
६.२५ पूर्वाह्न -७.०० पूर्वाह्न
करतारपुर जालंधर पंजाब
४.०३.२०१४




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, March 25, 2014

मै पिजड़े का तोता हूँ

(photo with thanks from google/net)



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मै पिजड़े का तोता हूँ

इधर से उधर

उधर से इधर

फुर्र -फुर्र उड़ता हूँ

चलता हूँ -घूमता हूँ

कसरत करता हूँ

उल्टा लटकता हूँ

सर्कस सा

 मीठा-मीठा मिट्ठू -मिट्ठू

बोलता  हूँ -बुलाता हूँ

'कुछ ' हैं अपने

समझते हैं मेरी भाषा

बोलते हैं मुझसे

बड़ा प्यारा लगता है

मै  न्योछावर 

अपनी गर्दन तक

दे देता हूँ

उनके हाथों में

मेरी मेहनत  पे वे

डाल देते हैं कुछ दाना

खाना-पानी

और 'कुछ' तीखी मिर्ची

बड़ा प्रेम है -मुझे -

'अपनों से '

ये मेरे 'कुछ अपने '

दूजे को देख चाँव -चाँव कर

भगा देता हूँ

चाहे मेरे माँ-बाप,  सगे हों

चीखता हूँ -चिल्लाता हूँ

बड़ा मजा आता है

तब-मेरे 'अपनों ' को

कभी मेरे 'अपनों' का 

मेरी तरफ

बढ़ता हाथ देख

न जाने क्यूँ ?

बड़ा डर लगता है

'अपनों ' से ही

चाँव-चाँव चीखता हूँ

फड़फड़ाता  हूँ

मन कहता है उड़ जाऊं

कहीं दूर गगन में

'पर' लगता है

'पर' क़तर गए हैं

'वे' नोंच न खाएं

अजीब दुनिया है

कौन है मेरा ??

मन मसोस कर रह जाता हूँ

फिर वही उछल-कूद

कसरत , पिजड़े में कैद

मिट्ठू -मिट्ठू -मीठा मीठा

बोलने लगता हूँ

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर '५

४.१०-४.४० मध्याह्न

करतारपुर -जालंधर पंजाब
२3.2.2014
 
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, March 16, 2014

छोरी छोरवन क अजब धमाल है कान्हा की कारगुजारी। …




आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।
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मिटटी लेप किये कोई कजरा लगाये
बनरे लाल मुख धारी कोई लंगूर आये
कुर्ता टोपी रंगे कोई कपड़ा भी फाड़े
छोटी बड़ी पिचकारी रंग मारे बौछारें
ढोल मजीरा कोई पीटे है ताली
है कान्हा की कारगुजारी। … -----
आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।

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काला मुख लिए मोतियन सी आँखें
राधा गोपियन की टोली है राह में ताके
तिरिया चक्कर से बच चलो झांके
कान्हा ग्वालों की अटकी रे साँसें
लिए लट्ठ गजब की ये होरी
है राधा की कारगुजारी। ……………
आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।


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लाल गाल वाली सभी हरी पीली रंगी
चोली घाँघरा चूनर है अजब सतरंगी
गायें फगुवा कड़क जैसे दामिनि
काली दुर्गा ये प्रेम रंगी कामिनि
अरी ! होली है या री कबड्डी।
है राधा की कारगुजारी -----------
आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।

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खाये भंग पिए हैँ ठंडाई
ऋतु वासन्ती इनपे है छायी
प्रेम परवान जोड़ी बनि के आयी
कामदेव नजरों में खुमारी है छायी
इन्द्र दरबार परियाँ ज्यों आयीं -----
है कान्हा की कारगुजारी ---------
आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।

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पहने साड़ी बने कान्हा नारी
सेंध लाये धरे राधा प्यारी
ह हा हि ही हुल्लड़ गायें होरी
चूर मस्ती गजब खेलें होरी
छलके रस-रास यादगार होरी
है कान्हा की कारगुजारी। ।
आज  उड़त अबीर गुलाल   
छोरी  छोरवन क  अजब धमाल
है कान्हा की कारगुजारी।


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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
प्रतापगढ़ भारत
१५. ०३. १४
१० से १०. २५ 
हरदोई -लखनऊ मार्ग
लौह पथ गामिनी में
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दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, March 8, 2014

नैन चढ़ी काली-काली ये

 
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नैन चढ़ी काली-काली ये 


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मंत्री जी क़ी नयी नवेली
भैंस बड़ी अलबेली
ऐसी डुबकी मारी भैया
बन गयी अजब पहेली
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घन-घन घंटी बजी रात भर
पुलिस महकमा जागा
होमगार्ड संतरी सेक्रेटरी
एस पी डी एस पी सब भागा
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काला अक्षर भैंस बराबर
काला ही मन भाये
काला कोयला काले धन में
मन जोगी रम जाए
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नैन चढ़ी काली-काली ये
भैंस खोज शुभ लाये
दूध धन्य नेतागिरी में
हुयी वरक्कत नजर नहीं लग पाये
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मंदिर-मस्जिद पूजा -मन्नत
भैंस जल्द मिल जाए
नहीं नौकरी कितनी मुश्किल
गयी ! जेल हो जाए
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आसू सांई नारायण सी भैंसी
गुप्त गुफा पगुराये
ड्राई फ्रूट चबाया जो था
वही हजम हो जाए
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चारा कोई और खा गया
क्या चरने को आये
ए.सी. कूलर हीटर ऊटर
भैंस के मन ना भाये
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काली-काली गाय भैंस सब
हांक -पकड़ कर लाये
कौन गाय हैं  भैंस कौन है
अब ये समझ ना आये
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ज्ञानी -ध्यानी कुछ विज्ञानी
टेस्ट परख आजमाए
चुप्पी साधे 'थी' मंत्री क़ी
बाकी पशु चिल्लाये
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देशी को है कौन पूछता
ये तो कोई विदेशी होगी
सारा अमला पूछ सरीखा
पीछे-पीछे सदा घूमता
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अब लो दूध पियो हे राजा
बने रहो मुश्तंद
पहलवान के दल में जैम के
कुश्ती दांव दिखाओ रंग
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भूखी -प्यासी जनता बच्चे
दूध -दरश ना पाएं
अंधे-बूढ़े-रोगी जल्दी
सदा पटखनी खाएं
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बलशाली हो चुन के राजा
वे भूखे ही लाएं
जिसकी लाठी भैंस उसी क़ी
कालिदास दे जाएँ
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
७.४०-८.२० पूर्वाह्न
करतारपुर पंजाब
१६.०२.२०१४


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, March 4, 2014

'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'


 ( photo with thanks from google/net)
मधुशाला में मधु है उसकी
चोली दामन साथ निभाती
दिल  की  हाल बयाँ  करते हैं
चार यार संग बन बाराती
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कभी  हँसे 'कद' रोया  करदे
नाच झूम मन की सब कह्दे
दर्द-दवा-है वैद्य वहीं सब
अपनी कहदे उनदी    सुनदे 
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एक 'कमाई'- बेंच के लाता
चार मौज मस्ती रत रहते
कहीं  कोई खाली जो आता
कभी धुनाई गिर पड़ खाता
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एक-एक पैग जो अंदर जाते
भाव भरे हर व्यथा सुनाते
सच्चा इंसा हूँ मै यारों
'पागल' दुनिया घर  फिर आते
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बात-बात में बने बतंगड़
धक्का-मुक्की दिन या रात
कभी ईंट तो मारें कंकड़
गली मोहल्ला ज्यों बारात
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'छज्जू' के हैं छह-छह कुड़ियां
दिखती सारी  प्यारी गुड़िया
जाने कौन कर्म ले आयीं
प्रेम में रत या जहर की पुड़िया ?
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'कुछ' कहती ये बड़ा शराबी
'पी' लेता तो बड़ी खराबी
'लाल' नहीं पाया ना 'प्याला'
समझो ना फिर -इसको घरवाला
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बद अच्छा बदनाम बुरा है
किया हुआ हर काम बुरा है
'सच्चाई ' दबती फिर जाती
गली मोहल्ले 'वही' शराबी ....
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दुश्मन पागल, आवारा सा चीखे
लट्ठ लिए पागल सा घूमे
कभी किसी की चोटी खींचे
मार के रोता आँखें मींचे
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मै ना कोई शराबी यारा 
'बदचलनी '  के गम   का  मारा 
भटकी बीबी  कुड़ियां जातीं
नाक है कटती शर्म है आती
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'यार' बड़े उनके हैं सारे
आँख दिखा  मुझको  धमकाते
रोता दिल 'नासूर' अंग है
काट सकूं ना -ना-पसंद हैं
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माँ की सहमति से बालाएं
सजधज मेकअप जाएँ-आयें
'पप्पा' को मिटटी बुत समझें
चैटिंग पूरा दिवस बिताएं
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उस दिन पुलिस बुलायी थी तू
बैठक दंड कराये खुश थी
आज बनाऊंगा मै मुर्गी
याद रखेगी जीवन भर तू
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'छज्जू' बोला आज हे मुई
मर जाऊंगा 'धर' तारां ( बिजली)  मै
रोज-रोज मरता है क्यों भय
मर जा -जा मर तंग मै हुयी
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लिए लट्ठ छत के ऊपर वो
गया थामने 'बिजली' दामन
चीख पुकार शोर रोना 'हुण'
लाठी ईंटों की फिर वो धुन
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पापा ! मम्मी ! , रोती कुड़ियां
सच्ची-प्यारी-  मार भी खाईं
हंसी व्यस्त कुछ कथा सुनाती
मै सच्ची हूँ , अजब  ये दुनिया ....
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हुआ इकठ्ठा रात मोहल्ला
'गबरू' कुछ फिर चढ़े बढे घर
'छज्जू' भागा कूद-फांदकर
कान पड़ी जब पुलिस-पुलिस तब
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कौन है सच्चा  कौन है झूठा ?
दया रहम दोनों पर आती
'रोजगार' ना कभी 'गरीबी'
'इन्हे' इसी मन्जिल पहुंचाती
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'सपनों' में जीने की खातिर
कभी दिखावा -'पेट' की खातिर
लता-बेल 'कांटे' चढ़ जातीं
या दल-दल में फंसती जातीं
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पति-पत्नी का कैसा रिश्ता ??
मिले 'लाल' ही है मन मिलता
तन-मन प्रेम सभी का हिस्सा
नहीं प्रेम कल का बस किस्सा
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अपराधी हैं ताक में रहते
बिगड़े सब,  'कुछ' तो बिक जाए
कौड़ी भाव में 'स्वर्ण' मिले तो
निज दूकान तो सजती जाए
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दोस्त शराबी के फिर आते
'साहस' दे गृह फिर दे जाते
'माँ' कहती हे! पास पडोसी
ना जाओ ना फिर 'वे' आते
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बुलबुल कहाँ कैद रह पाएं
खोलो पिजड़ा फिर -फिर आयें
रहें कहाँ ना साथी पाएं
निज करनी हैं पर कतराए
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'रब' हे ! ऐसे दिन ना लाओ
शांति रहे, मन -मंदिर सुन्दर 
प्रेम-पूज्य मूरति सीता-शुभ
राम 'परीक्षा-अग्नि' भाओ
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सत्कर्मों से मिला सुघड़ तन
नरक वास हे! क्यों मन लाते
मनुज प्रेम 'मानव' निज तन कर
मृग मरीचिका क्यों भरमाते ??
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( एक आँखों देखी सच्ची व्यथा कथा पर आधारित, प्रयुक्त सभी नाम काल्पनिक हैं और किसी के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं हैं , कुछ शब्द पंजाबी के प्रयुक्त हैं )
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
२०-०२.२०१४ करतारपुर जालंधर पंजाब
१०-३०-११.१५ मध्याह्न



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं