Saturday, November 15, 2014

बेवफा

बेवफा ( खेल समझकर दिल क्यों  तोड़ जाते हैं वे ) 
घर फूटा मन टूटा बिच्छिन्न हुए अरमान 
मैंने पाया विश्वास गया
ठेस लगी टूटा अभिमान 
(photo with thanks from google/net)

एकाकी जीवन रोता दिल
नासूर बनी खिलती कलियाँ 
जल जाएँ न सुन विरह गीत 
मिट जाएँ न अभिशप्तित परियां 
लूट मरोड़ मुकर क्यों जाते
ऐ सनम जो तुझसे दिल न लगाते
बाँध ले घुंघरू तज गेह नेह
सुख भर ले नित दिल टूट देख
ना धूमिल कर छवि नारी की
दिल दे न चढ़े बलि बेचारी
प्यार बना आधार बचाए घर कितने
सोने पर सोना छोड़
ले देख जरा तुझसे कितने

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
राय बरेली - प्रतापगढ़

७.९.१९९३ 



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, October 3, 2014

कुल्लू दशहरा



बुराई पर अच्छे की जीत हो 
दशहरा  लाये  एक उमंग भरी जिंदगी और नयी उम्मीद..फिर फिर बुराई पर अच्छे की जीत हो 
सदा ही ऐसी एक नई शुरुआत हो नया  सवेरा लाये अच्छों की जीत 

विजयादशमी का शुभ पर्व आपके  और  आपके  परिवार  के  जीवन  में  सुखसमृद्धि  ओर शांति  भर दे प्रभु हमें सदा  सत्य , आदर्श पर चलने की प्रेरणा दें हम अपनी प्यारी भारतीय सुसंस्कृति से ओत प्रोत हो अपने घर से ही सन्मार्ग चुने और समाज तथा देश भक्ति में सदा सदा अपने सत्कर्मों से अपना जी जान लगाएं भारत को विश्व पटल पर एक गौरव भरा स्थान दिलाएं जिससे हम शान से कह सकें हम भारत के लाल हैं 
रावण और राक्षसी शक्तियों  का विनाश हो राम राज्य आये 
मातृ शक्ति अपना अनूठा सम्मान पाये नारियों को पूजा जाए 

सभी प्रिय मित्रों को एक बार फिर दशहरा की हार्दिक  शुभ कामनाएं   , शुभ विजया 

आज कुल्लू दशहरा मेले का आगाज है बस अब थोड़ी ही देर में यहां के राज्यपाल इस मेले का उद्घाटन करेंगे   जिसमे प्रस्थान करना है ये एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का मेला है और प्रभु राम का विशालकाय रथ लोग भक्ति भाव से सुल्तानपुर से कुल्लू फिर अस्थायी  उनके निवास पर ढालपुर मैदान में लोग  खींच कर ले जाते हैं  लगभग ५००० पुरुष और महिलाएं यहां की लोक कला का नृत्य नाटी  प्रस्तुत करेंगे , फिर  दस दिनों तक धूम ही धूम कुल्लू देवनगरी  सजी रहेगी लगभग २५० स्थानीय देवी देवता अपने कारदारों के साथ इस मेले में पर्भु राम से मिलने के लिए आते हैं और मेले के दौरान पूजा अर्चना में चार चाँद लगा देते हैं , 


यह पर्व कुल्लू घाटी के ढालपुर मैदान में सज्जित होता है  यह चन्द्र कला के दसवे दिन से शुरू हो दशहरा यानी दसवें दिन से एक सप्ताह तक रहता है ऐसा कहा जाता है की १७ वीं सदी में यहां के राजा जगत सिंह  ने प्रभु राम की मूर्ती स्थापित की जब उनका राज तिलक हुआ इसके पश्चात प्रभु राम को इस घाटी के राजा के रूप में सम्मान की घोषणा की गयी 



सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ' भ्रमर '५
कुल्लू हिमाचल
३.१०. २ ० १ ४





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, September 24, 2014

पागलपन (न जाने किस मन को क्या भा जाये )


पागलपन (न जाने किस मन को क्या भा जाये )
सोचें सभी बन आये कवी , मन भये वही शब्दों का जोड़ा
छोटे कवी तो बहायें सभी , इतराए- हंसी जन्मों का भगोड़ा !!
जाने ना हैं सीखे वही गिर कर भी धाये चढने को घोडा
मानें ना हैं खीसें वही ,बिन के फिर आये मढने को मोढ़ा !!
"पागलपन" क्या जाने वो , सोना -ना -भाए -खाने को !
सावन छान क्या होवे भादों ,खोना ना जानें पाने को !!
कण -कण पराग ला बनती मधु मीठी , नीरज भी खिलता कीचड में
मन हर समान न ऊँगली समु नाही , धीरज भी मिलता बीहड़ में !!
सविता रोती कुछ, चिल्लाता कोई सौतन ये , घर गाँव कहे आवारा हुआ
कविता-प्रेमी खुश दर्शाता कोई सौहर ये , माँ बाप कहें कुछ न्यारा हुआ !!
संच सुनो -पीय-मेरो विलक्षण , दुःख संग फिरे-एक रस -रंग
कांच गुनो-सीय फेरो-किलकन , उठ-भंग पिए -रेंगा मन जंग !!
लिख हास्य कथा चटपटा सुनाओ ,व्यथा न भाए तनहा मन
बिन चादर बस मेरे मन , अधपका पकाओ , कविता सुन रोये पगला मन !!
घन-घन क्या जाने उनका मन , कोई मारे-जल लाये-बचाए यह जीवन
तन -तन क्या जाने उनका मन , कोई -ताने -जल जाये समाये यह जीवन !!
भ्रमर कहीं कुछ वक्त ना दे , नीरस कह भागे प्राण छुडाते हैं
भरमार कहीं कुछ भक्त बनें, जीवन कह -आये-हार -पिन्हाते हैं !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५ ३१.५.२०११

हजारीबाग ५.२.१९९४ 


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, September 12, 2014

परख PARAKH

(4) परख PARAKH
हर दाने नहीं हों खाने को ,हर आंसू व्याधि बंटाने को,
पहचाने सभी को-जाने को , हर वार हो कश्ती डुबाने  को !

हर दांत होते खाने को , जुगनू लगाये आग कभी ,
हर हाथ उठते देने को , धुन यूं बसायें बाग़  कभी !

तलवार भी क्या जब धार नहीं , वह आग नहीं जब आंच नहीं ,
वह माँ क्या जिसमे प्यार नहीं , संतान बुरी- तब बाँझ भली !!


सब देखे ना ही सच होता ,रश्मि आये ना हाथ कभी,
घर आये सभी मेहमान होता, ऊँगली पकडे ले बांह कभी !!

मोम छुएं तो कठोर लगे , हिम भी बन जाता पानी है ,
चोर देखे चोर लगे , प्रिय भी बन जाता पापी है !!

हर उल्का ना सब नाश करे , चपला दिखाए राह सदा ,
वह ममता ना बस प्यार करे, अबला बनाये भाग्य सदा !!

सरसों से दिखते तारे भी, नजदीक नहीं हैं पहाड़ सभी ,
महलों में बसे ही सितारे नहीं, संगीत नहीं लय -ताल नहीं !!

तीखी भी औषधि होती है -विष दन्त नहीं हों सांप सभी,
विष की औषधि  विष होती है ,भ्रमर सभी लो भांप भली !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर
१५.०४.२०११

(लेखन -२५.०२.१९९४ कोडरमा झारखण्ड)

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, August 24, 2014

हे री ! चंचल

  • हे री ! चंचल
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(photo with thanks from google/net)

जुल्फ है कारे मोती झरते
रतनारे मृगनयनी नैन
हंस नैन हैं गोरिया मेरे
'मोती ' पी पाते हैं चैन
आँखें बंद किये झरने मैं
पपीहा को बस 'स्वाति' चैन
लोल कपोल गाल ग्रीवा से
कँवल फिसलता नाभि मेह
पूरनमासी चाँद चांदनी
जुगनू मै ताकूँ दिन रैन
धूप सुनहरी इन्द्रधनुष तू
धरती नभ चहुँ दिशि में फ़ैल
मोह रही मायावी बन रति
कामदेव जिह्वा ना बैन
डोल रही मन 'मोरनी' बन के
'दीप' शिखा हिय काहे रैन
टिप-टप  जल बूंदों की धारा
मस्तक हिम अम्बर जिमि हेम
क्रीडा रत बदली ज्यों नागिन
दामिनि हिय छलनी चित नैन
कम्पित अधर शहद मृदु बैन -
चरावत सचराचर दिन रैन
सात सुरों संग नृत्य भैरवी
तड़पावत क्यों भावत नैन ?
हे री ! चंचल शोख विषामृत
डूब रहा , ना पढ़ आवत तोरे नैन !
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५
11-11.48 P.M.
26.08.2013
कुल्लू हिमाचल 
दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, August 17, 2014

श्याम जू पैदा भये-भ्रमर-गीत

आज घर घर मने है दिवाली श्याम जू पैदा भये-भ्रमर-गीत


आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं आइये आवाहन करें की कृष्ण हम सब में आयें और अनाचार मिटायें हमारे सभी आन्दोलन सफल हों और दुराचारी भ्रष्टाचारी मुह की खाएं-इस कलयुग में द्वापर की बातें याद आ जाती हैं -आज तो कितनी द्रौपदी बेचारी कोई कान्हा नहीं पाती हैं ..ग्वाल बाल सब .सखियों सहेलियों का पवित्र प्यार अब कहाँ …जो भी हो आज अपने अंगना में गोपाला को आइये लायें ….गोदी में खिलाएं ….स्वागत करें …काले काले बदरा ..भादों का महीना … -भ्रमर ५
———–भ्रमर गीत———
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श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
ढोल मजीरा तो हर दिन बाजे
आज घर घर बजे सब की थाली
श्याम जू पैदा भये
4-547e9811af.jpg-krishna-2
घुंघटा वाली नाचे चूड़ी कंगन बजाई के
बच्चे बूढ़े भी नाचें बजा ताली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
बदरा बजाये पशु पक्षी भी नाचें
पेड़ पौधों में छाई हरियाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
कृष्ण पाख कुछ चाँद छिपावे
आज घर घर मने है दिवाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
भादों में नदी नाले सागर बने
कान्हा चरण छुए यमुना भयीं खाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
पूत जने माई बप्पा तो झूमें
आज देशवा ख़ुशी भागशाली
श्याम जू पैदा भये
आज मथुरा में -हाँ आज गोकुला में
छाई खुशियाली
श्याम जू पैदा भये !!
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कृपया मेरी अन्य तरह की रचनाएँ मेरे अन्य ब्लॉग पर पढ़ें जो इस पृष्ठ पर दायीं तरफ रहती हैं ….
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
17.08.2014
प्रतापगढ़ उ.प्र. ६.३० पूर्वाह्न




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Saturday, August 9, 2014

मोती फूलों पर टपकाये

मोती फूलों पर टपकाये
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काले भूरे बादल गरजे
चपला चमक चमक के डराये
छर छर हर हर जोर की बारिश
पलभर भैया नदी बनाये
गली मुहल्ले नाले-नदिया
देख देख मन खुश हो जाये
झमझम रिमझिम बूँदे बारिश
मोती फूलों पर टपकाये
सतरंगी क्यारी फूलों की
बच्चों सा मुस्कायें महकें
वर्षा ज्यों ही थम जाती तो
बन्दर टोली बच्चे आयें
खेलें कूदें शोर मचायें
कोई कागज नाव चलायें
फुर्र फुर्र छोटी चिड़ियाँ तो
उड़ उड़ पर्वत पेड़ पे जायें
व्यास नदी शीतल दरिया में
जल क्रीड़ा कर खूब नहायें
मेरी काँच की खिड़की आतीं
छवि देखे खूब चोंच लड़ाये
मैं अन्दर से उनको पकड़ूँ
अजब गजब वे खेल खिलायें
बहुत मनोहर शीतल शीतल
मलयानिल ज्यों दिन भर चलती
कुल्लू और मनाली अपनी
देवभूममि सच प्यारी लगती
झर-झर झरने देवदार हैं चीड़ यहाँ तो
हिम हिमगिरि हैं बरफ लगे चाँदी के जैसे
हे प्रभु कुदरत तेरी माया, रचना रची है कैसे कैसे
मन पूजे तुझको शक्ति को, सदा बसो मन मेरे ऐसे
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर
5.30 am – 5.54 am

  भुट्टी कालोनी, कुल्लू (HP)

बच्चे मन के सच्चे हैं फूलों जैसे अच्छे हैं मेरी मम्मा कहती हैं तुझसे जितने बच्चे हैं सब अम्मा के प्यारे हैं --


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं