Friday, March 30, 2012

स्वाभिमान मर जाता है- जब हम बड़े होते हैं ?

गन्दी फर्श यत्र तत्र खड़े-पड़े लोग
इस भीड़ भरे मेले के झमेले में
धक्का खाती भटकती
वो महिला अपने दुध मुहे शिशु को
जर्जर आंचल से ढांके
बंदरिया सी गोद में चिपकाए -लटकाए
एक को अंगुली पकडाए
मुक्त किये-साथ दूजे को
हाथ पसारे नजरें मिलाये
दिल पिघला रही थी
घिघिया रही थी
बाबू बच्चा भूखा है …
भगवान भला करेगा
लोग ताकते घूरते डांटते बढ़ जाते
उस अबोध ने अनुकरण कर
माँ का साथ निभाया -मुस्कुराया
हाथ पसारा-मै अवाक ..
उसकी नजरों में गड़ गया
उसने तपाक से हाथ पीछे खींचा
क्रोध से बिसूरते ताका
मुझे पढ़ा -मुझे आँका
उसका स्वाभिमान जाग गया था
हमारी व्यवस्था पर करारा
तमाचा मार गया था
मेरा बड़प्पन अहम् भाग गया था
दो पैसे दे हम बाबू -विधाता बन जाते हैं
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गन्दी राजनीति -गंदे लोग
कुनीति कुचक्र राजनीति के भंवर में
मै खो गया था
एक तरफ गोरे चिट्टे सजे लोग
लाल सेब से गाल
अंगूरी और अंगूर का रस लेते
गर्म तवे पर रोटी सेंकना
उस और ये भूख मिटना-बिकना-बेंचना
स्वाभिमान मर जाता है-
जब हम बड़े होते हैं ?
बड़ी वाली बेटी माँ हाथ पसारे
किसी की जंघा किसी का कन्धा दबाते
अब भी गिड़ गिड़ा रही थी
हम अपना विकास- मौलिक अधिकार
राज्य सभा -लोकसभा -प्रजातंत्र
उसकी आँखों में देख
रो पड़े थे …….
आँखों से झर पड़े आंसू जैसे
इस मैले कुचैले तंत्र को साफ़ करने का
असफल प्रयास कर रहे हों
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जम्मू बस स्टैंड
७-७.२० पूर्वाह्न
२२.०३.२०१२


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, March 26, 2012

जीवन को बोझ बनाने वाला


जीवन को बोझ बनाने वाला
कभी कभी मन लगने लगता सचमुच बड़ा अकेला -
जीवन को बोझ बनाने वाला
जैसे परती भूमि पड़ी हो पत्थर गड़े दिखे बस ढेला
जीभ निकाले उधडा चमडा बैल पड़ा हो खड़ा हो ठेला
उबड़ खाबड़ बीहड़ में ज्यों सूख रहे पेड़ों का रेला
मन मोहक सुन्दर फूल हैं कितने गंध न कोई लेने वाला
कभी कभी मन लगने लगता सचमुच बड़ा अकेला -
जीवन को बोझ बनाने वाला !!
हरा भरा उपवन ना फुले सूख रहा दीखता ना माली
गदराया यौवन ज्यों सूखे जलता दिल मिलता ना साथी
दीपक जला प्रकाश बिखेरे तम घेरे अब जलती बाती
धान सूखता प्राण न घेरे बादल- पानी ना बरसाने वाला
कभी कभी मन लगने लगता सचमुच बड़ा अकेला -
जीवन को बोझ बनाने वाला !!
मूर्ति मगर मै खड़ा हुआ हूँ ठेस लगते जाते प्राणी
सोचूं सब सामर्थ्य भरा गिरा पेड़ ज्यों -फटी हो छाती
पर्वत जैसे मरुभूमि में जलता जाता आस लगाये टपके पानी
बोझ बढा ज्यों जनक हों व्याकुल कोई नहीं उठाने वाला
कभी कभी मन लगने लगता सचमुच बड़ा अकेला -
जीवन को बोझ बनाने वाला !!
नदी बह रही घाट न प्राणी बसे जहाँ ज्यों सूखा पानी
आँख खुली सब कुछ सुनता हूँ शून्य देखता मेले में कोई ना साथी
सुख साधन सब कल जैसा ही मन खोया क्यों आँखों पानी
मौत सी पहेली बूझो ना क्या होने वाला
कभी कभी मन लगने लगता सचमुच बड़ा अकेला –
जीवन को बोझ बनाने वाला !!
प्रिय मित्रों मंच से अनुपस्थित हूँ आज कल मार्च के बाद ठीक से दिल से पुनः बातें होंगी मन में आप सब की कमी बहुत खलती है बस पढ़ लेता हूँ आप सब को प्रतिक्रियाएं बहुत कम ही न के बराबर कृपया अपना स्नेह बनाये रखें और क्षमा ….क्षमा बडन को चाहिए छोटन को उत्पात है न ?
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२७.०३.2012
हजारीबाग मुन्द्रो


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, March 23, 2012

कब तक माँ की कोख में ??

मिटटी में दबा वह बीज
अंकुरित हो उभर चुका था
अँधेरे से उजाले की ओर
अब हवा बताश धूप छाँव
तूफ़ान बवंडर धूल मिटटी
सहना नसीब बन गया है
कब तक माँ की कोख में ??
अब तो कड़ी धूप में झंझावत में
ओलों में शोलों में
जलना होगा – सींचा जाएगा
हरियाली से हरा भरा हो -मुस्काएगा
कभी मालिक की कृपा दृष्टि से
फूल जाएगा -एक से सौ सहस्त्र
कभी अपना खुद का जीवन भी
बचा नहीं पायेगा
जन्म देने पालने – पोषने वाले के
हाथों ध्वस्त या
पैरों तले रौंदा जाएगा
लेकिन परवाह कहाँ
चल पड़ा चलता रहा बढ़ता रहा
जैसी जमीन मिली बढेगा
फलेगा -फूलेगा
दबते दबाते -टेढ़ा मेढ़ा खड़ा हो
रो लेगा
आसमान से झरते आंसुओं के साथ
पर जी लेगा
भाग्य तो धरा का धरा रह गया था
उसी दिन जब जहां में आया
मुट्ठी बंधी खुल चुकी
ना जाने अब कौन सी चक्की में पिसना
क्या होना –
किस बात पे रोना ?
वक्त का चक्र
काल का पहिया – संगी हैं
वही निर्धारित करेंगे
उसका हँसना रोना !!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
दसुया -जालंधर मार्ग में
२२.३.१२- ११.३०-१२ पूर्वाह्न


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, March 20, 2012

जिंदगानी


जिंदगानी 
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परिंदों की मानिंद हम भी तो 
पंख फडफडाते उड़े जा रहे 
यहाँ से वहां जहां अपना कोई नहीं 
ठहर जाते हैं बसेरा -सवेरा 
घोंसला बिन चुन 
अंडे बच्चे माया मोह 
चुगना चुगाना 
"पर" आये बच्चे उड़ जाते हैं 
हम अकेले तन्हाई बियावान
सुनसान -मन-घमासान 
कुढ़ते-कुढ़ते यादों की पोटली के 
उठते बैठते जागते सोते 
विदा हो जाते हैं 
मेले से 
नम आँखें ले !
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और कभी सूखा, अंधड़,बाढ़
अकाल-बिन जल-बेहाल
लेकर अपना तन मन प्राण 
उड़ जाते हैं अकेले हम 
और छटपटाते व्याकुल 
भूख से आकुल बच्चे
विदा हो जाते हैं 
कुचक्र काल के झमेले से 
बुलबुले से 
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कितनी अबूझ पहेली है ये 
जिंदगानी
शोकाकुल  हो कभी
झर झर झरते हैं 
आँखों से पानी 
स्वार्थ का अतिरेक 
सागर बन गया है 
महासागर 
आंसुओं का 
लहरें मुंह बाए 
लीलने को आतुर हैं 
भयावह मंजर है 
चरम पर 
और किनारों का 
न जाने क्यों 
अब तक कहीं ना अता पता है !
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शुक्ल भ्रमर 
१०.४५-११ मध्याह्न 
२६.०१.२०१२
करतारपुर पंजाब 



ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं























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Wednesday, March 7, 2012

होली आई है सजन घर आ जा


प्रिय मित्रों होली की ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं.... कान्हा राधा आप सब बन जाएँ अपने नगर अपनी अपनी गलियों को मथुरा वृन्दावन बरसाना सा खूब रंगें रंगायें.............. जो आप की राधा और क्रिशन के मन भाये .............चाहे बरसाना की लट्ठमार होरी बाद में आजीवन याद आये ...खूब अबीर गुलाल उड़े ..इस मास के देवता मदन देव  का आप सब को भरपूर उपहार मिले...... राधा भागे कृष्ण नाचें ............ढोल मजीरा की थाप पे बरजोरी हो जोरा जोरी हो ....बंधन टूट न जाए मिजाज शांत रहे ..... भंग का रंग अपने रंग पे चढ़े ...
मुलाकात बाद में होगी तो और बातें होंगी ....कृपया अनुपस्थिति के लिए इस समय क्षमा ....
जय श्री राधे जय जय कृष्णा ......
(photo with thanks from google/net)
होली आई है सजन घर  जा 
नजारा जरा  देख जा 
चली वासंती अब बयार है 
सरसों पीली फूले
सर सर  सर सर हवा बहे 
जिया मोरा मुरझाये 
कुण्डल कान में कुछ कुछ बोले 
आम की बगिया महक उठी है 
कोयल बुलबुल बोले 
होंठ रसीले सूखे जाते 
नैना झर झर सींचे 
भोर भये कागा काँ काँ कर 
मन मोरा तरसाए 
चातक पीऊ पीऊ चिल्लाये 
सजना याद दिलाये 
होली रंग बिरंगी अबकी 
सखियाँ खूब चिढ़ाएं
कहीं बसा कोई दिल क्या तेरे 
मेरी याद  आये 
एक झकोरे आहट पर मै
दौड़ी द्वारे  आती 
बेला जूही और चमेली 
कुछ भी मन ना भाती  
वैरन  सज धज सब तडपातीं 
भौंरें संग कलियाँ हंस खेलें 
सजना जिनके  पास अरी री !
निशा दिवस उनके अलबेले 
रंग गुलाल गुलाब सी खुश्बू
होली की सारी तैयारी
दर्शन कान्हा दे  दे  अब तो 
अब तो प्यारे  तेरी बारी 

प्रेम में तेरे   सराबोर मै 
रंग में खूब नहाऊं 
रंग -रंगीली कर दे आकर 
अब तो मै मुरझाऊँ 
लौंग इलायची पान का बीड़ा 
पिचकारी कान्हा सी लाना 
इस होली मै तर तर जाऊं 
वो फुहार मारे हरषाना
कृष्ण राधिका सी हो होरी 
मथुरा वृन्दाबन बरसाना ...
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 
प्रतापगढ़ अवध 
..२०१२
.१०-.४५ (यात्रा में मलीहाबाद -लखनऊ


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं