Monday, July 9, 2012

नयन ‘ग्रन्थ’ अनमोल ‘रतन’ हैं


नयन ग्रन्थ अनमोल रतन हैं दुनिया इनकी दीवानी 
आत्म-ब्रह्म सब भाषा पढ़ के डूब गए कितने ज्ञानी  
ना भाषा से ना भौगोलिक नहीं कभी ये बंधते 
पाखी सा ये मुक्त  डोलते  हर  मन  पैठ  बनाते 
प्रेम संदेसा ज्ञान चक्षु हैं बन त्रिनेत्र स्वाहा  भी करते   
खंजन नयना मृगनयनी वो सुन्दरता के साक्षी 
दो से चार बने तो लगता जनम जनम के साथी 
इन्द्रधनुष से हैं सतरंगी लाखों रंग समाये 
नयनों की भाषा पढ़ लो प्रिय दुनिया समझी जाये 
प्रेम नयन में क्रोध नयन में घृणा आँख दिखलाती 
मन का काम संदेशा देता नयन बांचते पाती 
कुछ पल छिन में दोस्त बनें कुछ नयन अगर मिल जाए 
दिल के भेद मिटा के यारों अपना दिल बन जाएँ  
अस्त्र सश्त्र दुश्मन रख देते नैन प्यार जो पा लें 
घृणा क्रोध जलता मन देखे नयन उधर ना जाते 
गदराये यौवन मूरति, रस -लज्जा नयन छिपाते 
सुन्दरता में चाँद चार लग झुक नयन पलक छिप जाते 
जैसे बदरी घेर सूर्य को लुका छिपी है खेले 
नयन हमारे मौन प्रेम से 'भ्रमर' सभी रस ले लें 
मन मस्तिष्क दिल नयन घुसे ये जासूसी सब कर लें 
यथा जरूरत बदल रूप ये सम्मोहित कर कब्ज़ा करते  
नयनों का जादू चलता तो शेर खड़ा मिमियाए 
कल का कायर भरे ऊर्जा जंग जीत घर आये 
कजरारे, कारे, सुरमा वाले नयन मोह मन लेते 
मन में राम बगल में छूरी , ये कटार  बन ढाते 
कभी छलकता प्रेम सिन्धु इस गागर से नयनों में 
ना बांधे ना रोके रुकता नयन मिले नयनों से 
नाजुक हैं शीतलता चाहें रोड़ा बड़ा खटकता नैन 
भावुक हैं झरने सा झर-झर प्रेम लीन देते सब चैन
प्रणय विरह व्यथा की घड़ियाँ अद्भुत सभी दिखाएँ 
रतनारे प्यारे नयना ये भूरे नीले हर पल साथ निभाएं 
नयनाभिराम मंच जग प्यारा अद्भुत अभिनय करते नैन 
दर्पण बन हर कुछ दिखलाते सांच कहें ना डरते नैन 
उनके सुख के साथी नयना दुःख में नीर बहा रह जाएँ 
जनम जनम की छवि दिखला के भूल कभी ना जाएँ 
रतनारे 'प्रेमी' नयना ये जामुन जैसे  प्रेम भरे रस घोलें 
प्रेम के आगे रतन-जवाहर जन-परिजन सब छोड़ें 
नयन झरोखे से दिखती सब अपनी राम कहानी 
आओ शुद्ध रखें अंतर सब पावन आँख में पानी 
झील से नयनों कमल-नयन हैं दुनिया यहीं समायी 
प्रेम ग्रन्थ लज्जा संस्कृति है डूब देख गहराई 
नयन पुष्प मादक पराग भर जाम पे जाम पिलाते 
मधुशाला मदहोशी में उठा पटक कर नयन खोल भी जाते 
संग जीवन भर करें उजाला दीप सरीखे  जीवन-ज्योति जगाते 
जाते - जाते नैन दान कर दिए रौशनी नयन अमर हो जाते !


सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' 
कुल्लू यच पी 
४.७.१२ ६.४०-७.४० पूर्वाह्न




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

6 comments:

dheerendra said...

प्राणी समझे न कभी नैनों की हर बात,
नयना जबभी बोलते लग जाती है आग

लग जाती है आग, जल जाते परवाने
लैला मजनू का हाल, सारी दुनिया जाने

नयनो के ये नीर,तीर से बच कर रहना
वरना फिर पछताओगे,रुलायेगें ये नयना,,,,,

RECENT POST...: दोहे,,,,

expression said...

सुदर भाव...
नैना ठग होते हैं.....

सादर
अनु

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय धीरेन्द्र जी नयनों पर बहुत सुन्दर रचना आप की खूबसूरत ...बच के ही रहना है रे बाबा ....भ्रमर ५

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

हाँ अनु जी सच में ये तिरछे कजरारे मतवारे नैना ठग तो लेते ही हैं ...आभार ....भ्रमर ५

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुंदर आलेख, अर्थपूर्ण सन्देश

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

सराहना के लिए आप का आभार डॉ मोनिका जी
भ्रमर 5