Tuesday, April 24, 2012

चार रुपइया और बढ़ा दो


चार रुपइया और बढ़ा दो
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दो रोटी के पड़े हैं लाले
भूखे-दूखे लोग भरे हैं
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बहन बेटियाँ बिन -व्याही हैं
कर्ज में डूबे कुछ किसान हैं
दर्द देख के -सभी – यहाँ चिल्लाते
सौ अठहत्तर अरब का सोना
कैसे फिर हम खाते ??
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मंहगाई ना कुछ कर पाती
अठाइस है बहुत बड़ा
चार रुपइया और बढ़ा दो
३२-३३ – संसद देखो भिड़ा पड़ा
कहीं झोपडी खुला आसमां
सौ-सौ मंजिल कहीं दिखी
कहीं खोद जड़ – कन्द हैं खाते
कहीं खोद भरते हैं सोना
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कोई जमीं फुटपाथ पे सोया
नोटों की गड्डी “वो” सोया
किसी के पाँव बिवाई – छाले
उड़-उड़ कोई मेवे खा ले
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( सभी फोटो साभार गूगल/ नेट से लिया गया )
विस्वा – मेंड़ जमीं की खातिर
भाई -भाई लड़ मरते
सौ – सौ बीघे धर्म – आश्रम
बाबा-ठग बन जोत रहे
कितने अश्त्र -शस्त्र हैं भरते
जुटा खजाना गाड़ रहे
भोली – भाली प्यारी जनता
गुरु-ईश में ठग क्यों ना पहचाने ??
कुछ अपने स्वारथ की खातिर
सब को वहीं फंसा दें
निर्मल-कोई- नहीं है बाबा !
अंतर मन की-सुन लो-पूजो
खून पसीने श्रम से उपजा
खुद भी भाई खा लो जी लो !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर’ ५
८-८.२० पूर्वाह्न
कुल यच पी
२५.०४.२०१२


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

5 comments:

dheerendra said...

मंहगाई ना कुछ कर पाती
अठाइस है बहुत बड़ा
चार रुपइया और बढ़ा दो

वाह!!!!बहुत प्रभावी रचना,..

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

रविकर फैजाबादी said...

अति-मार्मिक ।

ये करते हैं हमें

ऐसे ही दिक् ।।

udaya veer singh said...

क्या बात है सर ! वास्तविकता के समग्र रूप कादर्शन ......आभार जी /

udaya veer singh said...

क्या बात है सर ! वास्तविकता के समग्र रूप कादर्शन ......आभार जी /

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह...!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!