Wednesday, December 26, 2012

दिया ह्रदय में रख दूंगा



दिया ह्रदय में रख दूंगा
मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा
चाह नहीं कुछ नाम कमाऊँ दिया ह्रदय में रख दूंगा !
घर में मेरे जो आएगा मान  दिए खुश कर दूंगा
जीवन मेरे जो छाएगा प्यार किये जीवन दूंगा
उपवन मेरा जो सींचेगा खुशहाली छाया दूंगा
पथ में राही साथ चले मुस्कान भरे स्वागत दूंगा
मै एक तपस्वी  कांटे बोकर प्राण भी लो ,
कभी नहीं कह पाऊँगा ..
मन में मेरे जो आएगा लिख कर उसको रख दूंगा ………..

सूरज के गर साथ चलेंगे गर्मी हम पाएंगे ही
अंगार अगर हम ह्रदय रखेंगे सब भुन जायेंगे ही
गिरिवर कानन बोझ सहेंगे मन भायेंगे  शीतलता पाएंगे ही
माँ में ममता आंसू होंगे स्वर्ग धरा जीवन सफल बनायेंगे ही
मै एक दानी दान किये छाया पानी भी ना चाहूँगा -
कभी नहीं कह पाऊँगा ..मन में मेरे जो आएगा लिख के ....

रहा ताकते शून्य धरा से जल जीव यहीं पर हिले कहीं -कुछ न कुछ आता ही है
सत्कर्म, धर्म, स्वीकार-भूल से मोक्ष मिले धन -मन पावन होता ही है
मधु मीठी कुछ लोग कहें घाव रखे पर दुःख होता -मन उनका रोता ही है
दीपक पूजे राह दिखाए आग लगे श्मशान कहीं -घर मातम छाता ही है
पेड़ लगा संघर्ष किये भी -फल चाहूं ना -मै योगी -कभी नहीं कह पाऊँगा
मन में मेरे जो आएगा लिख के…………..


एक पेड़ कितनी शाखाएं लाल सबुज पातों में लिपटे झूमे ही सावन होता
चाँद जभी तारों संग खेले बुझे खिले बदली ढँक खोले कैसा मन-भवन होता
ऊँच -नीच  आडम्बर रत लाल कमाए दूर पड़े हम -मन मिलता ना रहता रोता
कर्म शर्म श्रम प्यार न देखे श्रुत भूले वैभव होता मन उनका खता है धोखा
तात -मात अपनापन भूले -पाथर पूजे स्वर्ग रहूँगा -कभी नहीं कह पाऊंगा
मन में मेरे जो आएगा ......

क्लिष्ट -कुटिल ना मुझको भायें मन को -आरोपण क्यों ?? जीवन यों ही धांधां  है
सरल -साधु नैतिकता ना उपदेश न चाहें जीवन को जिसने बांधा है
भ्रम पालें मत मानें ना दर्पण देखें ऋण भूले -कर लेता जो ही गाथा है
सीकर- को जो सी-कर पाए मारे पाथर रस खोएं फट सकता तेरा माथा है
सर्व शक्ति  है मेरे अन्दर ढाल मिला विष-पान किये भी अमर रहूँगा
कभी नहीं कह पाऊँगा मन में मेरे जो आएगा लिख के उसको रख दूंगा ...
चाह नहीं कुछ नाम कमाऊँ दिया ह्रदय में रख दूंगा !




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, November 22, 2012

ताकतवर कुत्ते


हम लोगों की आँखों के सामने
पैदा हुए कुछ पिल्ले यहीं पले बढे
दूध मलाई खाए कार में चढ़े दुलराये
भौंकते-हमें डराते ताकतवर बन जाते हैं
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( फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया)
फिर झुग्गी बस्ती में आये पेट दिखाए
दुम हिलाए पाँव चाटे दोस्त बन जाते हैं
आगे पीछे घूम घूम सूंघ सूंघ सारी ख़बरें
बड़े कुत्तों तक पहुंचाते हराम की खाते हैं
दिलदार ‘आम’ आदमी दिल बड़ा रखता है
दिल से कहता है दिल की सुनता है
अच्छाई ईमानदारी गुण ही बुनता है
भागता है छुपता है डर डर चलता है
पिल्ले ये शेर बने गरजे बढे जाते हैं
नोच खोंच दर्द दिए खून पिए जाते हैं
दर्द हरण सुई लगा ‘आम’ लोग जीते हैं
दर्द व्यथा दिल जला सारा गम पीते हैं
ताकतवर कुत्ता दिन-दिन बौराता है
छेड़ – नोंच ‘गले’ चढ़े बड़ा गुर्राता है
दुम दबी -सीधी खड़ी आँखें दिखाता है
पागल है-पागल है शोर तब मचता है
लाठी ले पीट तब मार ‘आम’ हटता है
‘आम’ लोग-लाठी में बड़ी ही ताकत है
लम्बी उमर ‘भ्रमर’ – शिव-शैव ताकत है
करुण नैन त्रिनेत्र जभी बन जाता है
घास फूस महल लोक-स्वर्ग भी जलाता है
प्रेम दया जोश होश सत्य न्याय भारी है
घृणा झूठ अहम् कुनीति सदा ही हारी है !
———————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
८.४० पूर्वाह्न
रविवार -कुल्लू
१४.१०.2012








दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Wednesday, October 31, 2012

मै भी अभी जिन्दा हूँ !!


मै भी अभी जिन्दा हूँ !!
———————–
तीव्र झोंके ने पर्दा उड़ा दिया
सारे बाज -इकट्ठे दिखा दिया
चालबाज, कबूतरबाज , दगाबाज
अधनंगे कुछ कपडे पहनने में लगे
दाग-धब्बे -कालिख लीपापोती में जुटे
माइक ले बरगलाने नेता जी आये
जोकर से दांत दिखा हँसे बतियाये
“ये मंच अब हमारा है” खेती है हमारी
हम ‘मालिक’ हैं पैसे पेड़ पर नहीं उगते
चाहे हम भांग बोयें कैक्टस लगायें
थाली लोटे लंगोटी गिरवी रख आयें
उत्पादन दिखाएँ रोजगार के अवसर बताएं
नहीं दस बीस को रोजगार भत्ता दिलाएं
सोचता हूँ कैसे घिघियाते तुमरे पीछे हम धाये
नोट दे वोट को हम खरीद के लाये
तुम दर्शक हो सड़े टमाटर अंडे जूते उछालो
पुतला बनाओ जलाओ मन शान्त कर जाओ
जिसकी लाठी उसकी भैंस समझ जो पाओ
आँख न दिखाओ हाड मांस जान तुम बचाओ
‘ये मंच हमारा है ‘ जूतम -जुत्ती   गुत्थम -गुत्थी
मूल अधिकार हमारा है जो हमें प्यारा है
भीड़ में दांत निपोरे खिखियाते उनके लोग
अंगारे सी आँखें बड़े बाज कबूतर का भोग
पतली गली से निकल राम लीला की ओर
मै चल पड़ा , सूर्पनखा रावण दुःशासन को छोड़
गांधी के बन्दर सा आँख मुंह कान बंद किये
बैठा हूँ- दुर्योधन-शकुनी मामा नहीं मरे
द्यूत क्रीडा जारी है युधिष्ठिर हारे हैं
कृष्ण नहीं विदुर नहीं सोच सोच कुढ़ता हूँ
चीख है पुकार है मै भी अभी जिन्दा हूँ !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ५’
२५.९.१२ कुल्लू यच पी
मंगलवार ७.१५-७.४९





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, October 26, 2012

ईद मुबारक


(फोटो साभार गूगल नेट से लिया गया )

हमारे   सभी  मित्र मण्डली और प्यारे बंधुओं को ईद मुबारक हो. 

आओ कुछ ऐसा करें जिससे जीवन निखरे 

त्याग और वलिदान रहे पर जीवन नित ही सुधरे 

त्योहारों का रंग सदा ही कुछ खुशियाँ ले आये 

सभी ख़ुशी हों नहीं कष्ट हो गले मिलाने आये 

जैसे होली और दीवाली अद्भुत रंग दिखाए 

वैसे ही ये ईद भी होवे दे सन्देशा जाए 


प्रिय चीजों का त्याग करें उस अनंत को मानें 

एक आसमां  तले सभी हम गूढ़ अर्थ पहचानें   


ईद की उस, सेवईं खुशबू सा हँसे प्यार हमारा,. 


इस ईद पे भी आओ मनाएं बेहतर हो संसार हमारा,

इन लीडरों की चाल में उलझे न मोहब्बत

विश्वास का सम्बन्ध हो आधार हमारा.

आइये हम सब एक हो कर एक जुटता लायें समाज में अन्याय कदाचार भ्रष्टाचार को मिटायें किसी के बहकावे में कभी न आयें प्रभु एक है हम चाहे उस एक का जितना नाम दें जिस रूप में भी मानें परम पिता गुरु पैगम्बर ईसा मसीह  कुछ भी एक ही सत्ता है एक ही जग का नियंता है जो हमारी सोच से परे है जो कारक है और निवारक है !


हर धर्म हमें अच्छा ही सिखाता है सद्बुद्धि ही देता है ये त्यौहार भी त्याग और बलिदान का अद्भुत परिचायक है आइये हम सब सभी  धर्मों से कुछ सीख लें मानवता को मानें इंसानियत को जगाएं नेकी करें और हमेशा बदी  से डरें !


भ्रमर 5
27.10.2012
12.22 मध्याह्न

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, October 12, 2012

उँगलियों के इशारे नचाने लगी


उँगलियों के इशारे नचाने लगी
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(फोटो साभार गूगल / नेट से लिया गया )
उम्र की सीढ़ियों कुछ कदम ही बढे
अंग -प्रत्यंग शीशे झलकने लगे
वो खुमारी चढ़ी मद भरे जाम से
नैन प्याले तो छल-छल छलकने लगे
लालिमा जो चढ़ी गाल टेसू हुए
भाव भौंहों से पल-पल थिरकने लगे
जुल्फ नागिन से फुंफकारती सी दिखे
होश-मदहोशी में थे बदलने लगे
नींद आँखों से गायब रही रात भर
करवटें रात भर सब बदलते रहे
तिरछी नैनों की जालिम अदा ऐ सनम
बन सपन अब गगन में उड़ाती फिरे
पर कटे उस पखेरू से हैं कुछ पड़े
गोद में आ गिरें सब तडफने लगे
सुर्ख होंठों ने तेरे गजब ढा दिया
प्यास जन्मों की अधरों पे आने लगी
दिल धडकने लगा मन मचलने लगा
रोम पुलकित तो शोले दहकने लगे
पाँव इत-उत चले खुद बहकने लगे
कोई चुम्बक लगे खींचता हर कदम
पास तेरे ‘भ्रमर’ मंडराने लगे
देख सोलह कलाएं गदराया जिसम
नैन दर्पण सभी खुद लजाने लगे
मंद मुस्कान तेरी कहर ढा रही
कभी अमृत कभी विष परसने लगी
भाव की भंगिमा में घिरी मोहिनी
मोह-माया के जंजाल फंसने लगी
तडफडाती रही फडफडाती रही
दर्द के जाल में वो फंसी इस कदर
वेदना अरु विरह के मंझधार में
नाव बोझिल भंवर डगमगाने लगी
नीर ही नीर चहुँ ओर डूबती वो कभी
आस मन में रखे – उतराने लगी
जितना खोयी थी- पायी- भरी सांस फिर
उड़ के तितली सी- सब को सताने लगी
मोरनी सी थिरकती बढ़ी जा रही
उँगलियों के इशारे नचाने लगी
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
मुरादाबाद-सहारनपुर उ प्र.
१०-१०.४५ मध्याह्न
१०.०३.१२





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, September 23, 2012

कल चला था पुनः राह में ,मै उसी दिल में यादों का तूफाँ समेटे हुए …


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32598-beautiful-bride-akshara.jpg
( फोटो साभार गूगल / नेट से लिया गया )








कल चला था पुनः राह में मै उसी
दिल में यादों का तूफाँ समेटे हुए …
रौशनी छन के आई गगन से कहीं
दिल के अंधियारे दीपक जला के गयी
राह टेढ़ी चढ़ाई मै चढ़ता गया
दो दिलों की सी धड़कन मै सुनता रहा
कोई सपनों में रंगों को भरता रहा
रागिनी-मोहिनी-यामिनी-श्यामली
मेंहदी गोरी कलाई पे रचता रहा
छम -छमा-छम सुने पायलों की खनक
माथ बिंदिया के नग में था उलझा हुआ
इंद्र-धनुषी छटा में लिपट तू कहीं
उन सितारों की महफ़िल सजाती रही
लटपटाता रहा आह भरता रहा
फिर भी बढ़ता रहा रंग भरता रहा
तूने लव बनाये थे कुछ तरु वहीं
चीड-देवदार खामोश हारे सभी
तेरी जिद आगे हारे न लौटा सके
ना तुझे-ना वो खुशियाँ- न रंगीनियाँ
पलकों के शामियाने बस सजे रह गए
ना वो ‘दूल्हा’ सजा , ना वो ‘दुल्हन’ सजी
मंच अरमा , मचल के कतल हो गए
वर्फ से लदे गिरि पर्वत वहीं थे कफ़न से
दिखे ! चांदी की घाटियाँ कब्र सी बन गयीं
सुरमई सारे पल वे सुहाने सफ़र
सारे रहते हुए -बिन तुम्हारे सखी !
सारे धूमिल हुए -धूल में मिल गए
सिसकियाँ मुंह से निकली तो तरु झुक गए
फूल कुछ कुछ झरे ‘हार’ से बन गए
कौंधी बिजली तू आयी -समा नैन में
प्रेम -पाती ह्रदय में जो रख तू गयी
मै पढता रहा मै सम्हलता रहा डग भरता रहा
अश्रु छलके तेरी प्रीती में जो सनम
मै पीता रहा पी के जीता रहा
झील सी तेरी अंखियों में तरता रहा
तेरी यादों का पतवार ले हे प्रिये
तेरे नजदीक पल-पल मै आता रहा
दीप पल-पल जला-ये बुझाता रहा
आँधियों से लड़ा – मै जलाता रहा !
कल चला था पुनः राह मै उसी
दिल में यादों का तूफाँ समेटे हुए …
—————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
४.४५-५.४० मध्याह्न
१९.५.१२ कुल्लू यच पी




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Thursday, September 13, 2012

मधु से मीठी प्रेम रस से भीगी हिंदी की प्रेम पाती


प्रिय मित्रों हिंदी के पावन पर्व पर आप सब को ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं ये कहना मिथ्या नहीं होगा की हिंदी के प्रचार प्रसार में हमारे द्वारा की गयी कोशिशों में अभी भी बहुत कमी है … जब तक जन जन में ये मुखरित नहीं होगी… गली मोहल्ले में मिश्रित वर्णों से परे शुद्ध हिंदी के दर्शन नहीं होंगे …हम माँ को मोम और अपने पूज्य पिताश्री को डैड कहते रहेंगे सुप्रभात कहने में लजायेंगे और गुड मार्निंग ही बोलने में अपनी शान समझेंगे…. त्रिचक्र वाहिनी वाले भाई जी हमें दूरदर्शन आकाशवाणी और विश्वविद्यालय क्या हैं ? बोल कर… नहीं पहुंचाएंगे, लोग घर में हमारे अतिथियों के आगमन पर चेयर टेबल मंगा कर टी ही भेंट करेंगे, कुर्सी, मेज, चाय, रसपान सब भूल जाएगा और सारा गुड गोबर हो जाएगा फिर हमने किया क्या ?? क्या पाया ? केवल एक हिंदी दिवस पर संकल्प लिया अपील की १४ सितम्बर १९४९ को याद किया हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया बोल डाला , खाया पिया मौज मस्ती बस ….
नहीं मित्रों कुछ संतोष तो हुआ है, हमारे कदम बढे हैं, हिंदी को प्रेम बहुत मिला है, हम चिट्ठे वाले अपनी हिंदी माँ को जब से इतना प्रेम देना शुरू किये मीडिया अखबार हिंदी दैनिक ने भी साथ निभाया है, बहुत से शब्द जो हम भूलने लगे थे अब घर घर में चर्चा में आने लगे, बच्चे हिंदी बोलने लगे कुछ अंग्रेजी विद्यालयों में अब भी प्रतिबन्ध है …पर हिंदी का अस्तित्व है अंग्रेजी न पढ़ी जाय अन्य भाषा न बोली जाये, ऐसा न करना अच्छा होगा जितनी भाषाओँ का ज्ञान हम रखे सकें अच्छा है लाभ ही होगा लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए की ..
“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल”
हिंदी हमारी आन है शान है जान है
हिंदी हमारे दिलों की धड़कन है
हिंदी सब भाषाओँ में एक पुल का कार्य कर रही है
आज केंद्र सरकार और राजभाषा विभाग अपने कार्मिकों को हिंदी परीक्षा में सफल होने पर पुरस्कार पत्र और हिंदी भत्ता दे रही हैं !
हिंदी में काम करना आसान है शुरू तो कीजिये !
मिले जुले अंग्रेजी उर्दू फ़ारसी के शब्दों से बच कर…. आइये शुद्ध हिंदी बोलने लिखने का सतत अभ्यास करें दुरूह है पर असंभव नहीं !
पीड़ित गरीब लोगों के बच्चे जो अंग्रेजी से दूर हैं उन्हें भी हिंदी में गुणवत्ता वाली पुस्तकें मिलें हिंदी में परीक्षाएं देने का अवसर मिले, उनकी प्रतिभा निखरे मन प्रफुल्लित हो, हिंदी जन जन के गले में हार बन कर सुरभित हो, पल्लवित हो, पुष्पित हो …. तब हमारे विकास का सपना …..सपनों का भारत आगे बढे खुशियाँ बरसें हरियाली खुशहाली चहुँ ओर समग्र विकास और हर चेहरे पर मुस्कान ले कर आये !
किसी कवि ने ठीक ही कहा है ….
हिन्दी दिवस पर
अपनी मातृभाषा की उनको
बहुत याद आई,
इसलिये ही
‘हिन्दी इज वैरी गुड’ भाषा के
नारे के साथ दी बार बार दुहाई।
————
शिक्षक ने पूछा छात्रों से
‘बताओ अंग्रेजी बड़ी भाषा है या हिन्दी
जब हम लिखने और बोलने की
दृष्टि से तोलते हैं।’
एक छात्र ने जवाब दिया कि
‘वी हैव आल्वेज स्पीकिंग इन हिन्दी
यह हम सच बोलते हैं।’
आज भी दक्षिण भारत में जब हम भ्रमण करते यत्र तत्र पहुँच जाते हैं तो कुछ जगहों पर हिंदी से दूरी बहुत खलती है, कचोटती है हमारे मन को , दक्षिण से लोग जब उत्तर तरफ आते हैं उन्हें भी हिंदी का बोध न होने से बहुत समस्या का सामना करना पड़ता है कुछ लोग तो अंग्रेजी बोलकर काम चला लेते हैं लेकिन बहुतेरे तो मजधार में ही अटक जाते हैं अतः हमें हिंदी को प्रेम से गले लगाना चाहिए…. कतई इसका विरोध नहीं करना चाहिए ….यथा संभव हम इसे बोलते रहें …सीखते रहें… सिखाते रहें …तो आनंद और आये …
हमें विश्वास है, आस है , उम्मीद के पर मजबूत हुए हैं लाखों की संख्या में हमारे हिंदी चिट्ठों ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है लोगों के दिलों में प्रेम जगा हैं अब जब दीप जल चुका है तो फिर रौशनी फैलेगी …और फैलेगी ……..और एक न एक दिन हमारा मुकाम अवश्य मिलेगा और जरुर मिलेगा अब कोई संदेह नहीं रहा …
प्रिय मित्रों आप सब के अद्भुत योगदान के लिए हार्दिक आभार आओ करते रहें हिंदी से यों ही असीम प्यार
व्यस्तता और समय कम होने से बस थोडा लिखा ज्यादा समझना …ये मधु से मीठी प्रेम रस से भीगी हिंदी की प्रेम पाती है …
जय हिंदी
जय हिंद
जय भारत
——————
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘ भ्रमर५ ”
करतारपुर पंजाब
ब्लॉगर प्रतापगढ़ उ.प्र भारत




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, September 11, 2012

प्रेम का सागर नैना गागर


तेरे नैना मेरे नैना सबके नयना होते प्यारे !
आँखों का तारा जो बनते होते प्राण पियारे !!
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(फोटो गूगल/ नेट से लिया गया साभार )
दिल दिमाग नैनों पर हावी अद्भुत रंग दिखाते !
हम ‘उनके’ नयनों में उलझे लूट हमें ‘वो’ जाते !!
‘भंवर’ बड़ी है उन नयनों में नैन मेरे ‘खो’ जाते !
नैन मिला ‘ऊँगली’ पकडाए वे ही ‘जान’ बचाते !!
राह तके नैना इतने दिन ‘पी’ की आस लगाये !
‘पी’ के पी घर आये – मोरे नैना अति अकुलाये !!
कली से जब मै फूल बनी नैनन सपन सजाये !
चंचल शोख नयन पी खोये घूँघट जभी उठाये !!
नयन तुम्हारे बेदर्दी बेरहम बड़े हैं नैनों से टकराएँ !
बिन पूछे ही हाल जिया का ‘डग’ भरते खो जाएँ !!
नयन हमारे तभी हैं मिलते मन में जब सच्चाई !
‘कपटी’ नैना इत उत भटकें नयन मिले ना भाई !!
नैनों में मदिरा है मेरे जी भर ‘जाम’ पिलाऊंगी !
मस्त रहो -मधुशाला वैरन नयनन उसे जलाऊंगी !!
प्यार की बदरी नैना मेरे तुम क्यों रूखे – सूखे !
‘नीर’ सम्हारो नयनन अपने बरसो ‘जी’ फिर पूजे !!
तेरे नैना भटक गए हैं पाखी सा सागर में विचरें !
मन सागर दिलवर मेरा है उड़ आयेंगे मेरे नैन में !!
नयनों में सपना था साजन सुख संसार में खोऊंगी !
नहीं था मालुम घृणा क्रोध घृत डाले ‘हवन’ मै रोऊंगी !!
नयन के उनके मरा है पानी वेशर्मी है हया नहीं !
बेटी ‘उनकी’ बुरे नैन हैं अपनी बेटी ‘कोख’ नहीं !!
चाटुकार चमचे नयनन में ‘कुत्ते’ पूँछ हिलाते !
बड़े भयावह खूंखार हैं निज रक्त ‘नयन’ पी जाते !!
कवि व्यभिचारी चोर नयन तो एक जगह ना टिकते !
सुवरन को खोजे ही फिरते डूब नयन मन मोती चुगते !!
प्रेम का सागर नैना गागर आओ नयनों बस जाएँ !
हंस बने हम ‘मोती’ चुग लें नैनन डूबें उतरायें !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
७.४५-८.३० पूर्वाह्न
कुल्लू यच पी ८.०९.2012





दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, August 20, 2012

एक ‘कवि’ बीबी से अकड़ा

एक ‘कवि’ जब खिन्न हुआ तो बीबी से ‘वो’ अकड़ा
कमर कसा ‘बीबी’ ने भी शुरू हुआ था झगडा
कितनी मेहनत मै करता हूँ दिन भर ‘चौपाये’ सा
करूँ कमाई सुनूं बॉस की रोता-गाता-आता
सब्जी का थैला लटकाए आटे में रंग जाता
कभी कोयला लकड़ी लादूँ हुआ ‘कोयला’ आता
दिन भर सोती भरे ऊर्जा लड़ने को दम आता ?
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पंखा झल दो चाय बनाओ सिर थोडा सहलाओ
मीठी-मीठी बातें करके दिल हल्का कर जाओ
काम से फटता है दिमाग रे ! चोरों की हैं टेंशन
चोर-चोर मौसेरे भाई मुझसे सबसे अनबन
कितना ही अच्छा करता मै बॉस है आँख दिखाता
वही गधों को गले मिला के दारु बहुत पिलाता
उसके बॉस भी डरते उससे बड़ा यूनियन बाज
भोली- भाली चिड़ियाँ चूँ ना करती- खाने दौड़े बाज
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बात अधूरी बीबी दौड़ी लिए बेलना हाथ
हे ! कवि तू अपनी ही गाये कौन सुने तेरी बात ?
सुबह पांच उठती सब करती साफ़ -सफाई घर की
तन की -मन की, पूजा करती घन-घन बजती घंटी
दौड़ किचेन में उसे नहाना कपड़ा भी पहनाती
चोटी करती ढूंढ के मोजा, बैज, रूमाल भी लाती
प्यार से पप्पी ले ‘लाली’ को वहां तलक पहुंचाती
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फिर तुम्हरे पीछे हे सजना बच्चों जैसा हाल
इतने भोले बड़े भुलक्कड होती मै बेहाल
रंग चोंग के सजा बजा के तुम को रोज पठाती
लुढके रोते से जब आते हो ख़ुशी मेरी सब जाती
दिन भर तो मै दौड़ थकी हूँ कुछ रोमांस तो कर लो
आओ प्रेम से गले लगाओ आलिंगन में भर लो !
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हँसे प्यार से कली फूल ज्यों खिल-खिल-खिल खिल हंस लें
ननद-सास बहु-बात तंग मै दिल कुछ हल्का कर लें
छोटे देवर छोटे बच्चे सास ससुर सब काम
आफिस मेरा तुमसे बढ़कर यहाँ सभी मेरे बॉस
आफिस में ही ना टेन्शन है घर में बहुत है टेन्शन
कभी ख़ुशी तो कुढ़ -कुढ़ जीना यहाँ भी बड़ी है अनबन
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दस-दस घंटे रात में भी तुम- हो कविता के पीछे
हाथ दर्द है कमर दर्द है आँख लाल हो मींचे
ये सौतन है ‘ ब्लागिंग’ मेरी समय मेरा है खाती
इंटरनेट मोडेम मित्रों से चिढ़ है मुझको आती
मानीटर ये बीबी से बढ़ प्यार है तुमको आता
लगा ठहाके हंस मुस्काते रंक ज्यों कंचन पाता
लौंगा वीरा और इलायची वो सुहाग की रात
हे प्रभु इनको याद दिला दे करती मै फरियाद
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कवि का माथा ठनका बोला मै सौ ‘कविता’ पा-लूं
‘कविता’ एक को तुम पाली हो, सुनता ही बस घूमूं
तुम थक जाती मै ना थकता, कविता मुझको प्यारी
पालो तुम भी दस-दस कविता तो अपनी हो यारी
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एक कवि -लेखक ही तो है- पूजा करता- ‘सुवरन’ पाछे भागे
हीरा मोती और जवाहर-ठोकर मारे-प्रीत के आगे नाचे-हारे
दो टुकड़े -कागज पाती कुछ -वाह वाह सुनने को मरता
प्रीत ‘मीत’ को गले लगाए दर्पण ‘निज’ को आँका करता
खून पसीना अपना लाता मन मष्तिष्क लगाता
टेंशन-वेंशन सब भूले मै, सोलह श्रृंगार सजाता
सहलाता कोमल कर मन से, ढांचा बहुत बनाता
मै सुनार -लो-‘हार’, कभी मै प्रजापति बन जाता
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आत्म और परमात्म मिलन से हँस गद-गद हो जाता
हे री ! प्यारी ‘मधु’ तू मेरी मै मिठास भर जाता
सात जनम तुझको मै पाऊँ सुघड़ सुहानी तू है
साँस, हमारी जीवन साथी जीवन लक्ष्मी तू है
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तब बीबी भी भावुक हो झर झर नैनन नीर बहाई
गले में वो ‘बाला’ सी लटकी कुछ फिर बोल न पायी
दो जाँ एक हुए थे पल में, धडकन हो गयी एक
हे ! प्रभु सब को प्यार दो ऐसा, सब बन जाएँ नेक
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‘कविता’ को भी प्यार मिले, भरपूर सजी वो घूमे
सत्य सदा हो गले लगाये, हर दिल में वो झूले
जैसे कविता एक अकेली कितने दिल को छू हरषाए
आओ हम भी दिल हर बस लें क्या ले आये क्या ले जाएँ ?
हम जब जाएँ भी तो ‘हम’ हों, ‘मै’ ना रहूँ अकेला
प्यारी जग की रीति यही है, दुनिया है एक ‘मेला’ !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
८-८-२०१२
कुल्लू यच पी ९ पूर्वाह्न
ब्लागर-प्रतापगढ़ उ.प्रदेश भारत


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, August 14, 2012

भारत प्यारा वतन हमारा सबसे सुन्दर न्यारा देश


भारत प्यारा वतन हमारा सबसे सुन्दर न्यारा देश
इतनी भाषा जाति धर्म सब भाई-भाई हम सब एक
भरे उमंगें भरे ऊर्जा लिए तिरंगा हम सब दौड़ें
स्वस्थ बड़ी प्रतियोगिता हमारी एक-एक हम नभ को छू लें

ऐसा प्यार कहाँ जग में है पत्थर गढ़ते देव सा पूजें
मेहमानों को देव मानते मात-पिता गुरु चरणों पड़ते
भौतिक सुख लालच ईर्ष्या से दूर-दूर हम सब रहते
आत्म और परमात्म मिलन कर अनुपम सुख भोगा करते 


शावक से हम सिंह बने बलशाली वीर दहाड़ चलें
कदम ताल जय हिंद घोष कर पर्वत चढ़ नभ उड़ जाते
थल की सीमा मुट्ठी में है जल को बाँध विजय पथ जाते
आँख कोई दुश्मन दिखला दे बन नृसिंह छाती चढ़ जाते

प्रेम शांति की भाषा अपनी 'माँ' पर जान निछावर है
हर पल हर क्षण नूतन रचते मौसम प्रकृति सुहावन है
पुष्प खिले कलियाँ मुस्काए हैं वसंत मन-भावन है
कोयल कूकें, नाच मोर का, हरियाली, नित सावन है !

मोक्ष-दायिनी गंगा मैया चार धाम हैं स्वर्ग  हिमालय सभी यहीं
ऋषि -मुनि की है तपस्थली ये पूजित होती देव भूमि प्यारी नगरी
सूर्य तेज ले 'लाल' हमारे  करें रौशनी  चन्दा 'शीतल' उजियारा करती
देवी बिटिया जग-जननी सरल-धीर ये गुण संस्कृति  निज पोषा करती

आओ 'हाथ' जोड़ संग चल दें सत्य-अहिंसा शस्त्र लिए
'बल' पाए जिससे ये जगती रोटी-कपडा-वस्त्र मिले
मिटे गरीबी हो खुशहाली पढ़ें लिखें जग-गुरु बनें
चेहरे पर मुस्कान खिली हो लिए तिरंगा (तीन लोक में ) विजय करें  !

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
७-७.४७ पूर्वाह्न
१५.८.२०१२
कुल्लू यच पी
ब्लागर -प्रतापगढ़ उ.प्र.




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Monday, August 13, 2012

एक कवि बीबी से अकड़ा



एक कवि जब खिन्न हुआ तो  बीबी से वो अकड़ा
कमर कसा बीबी ने भी शुरू हुआ था झगडा
कितनी मेहनत मै करता हूँ
करूँ  कमाई सुनूं बॉस की रोता-गाता-आता
सब्जी का थैला लटकाए आटे में रंग आता
कभी कोयला लकड़ी लादूँ हुआ कोयला आता
दिन भर सोती भरे ऊर्जा लड़ने को दम आता ?
पंखा झल दो चाय बनाओ सिर थोडा सहलाओ
मीठी-मीठी बातें करके दिल हल्का कर जाओ
काम से फटता है दिमाग रे ! चोरों की हैं टेंशन
चोर-चोर मौसेरे भाई मुझसे सबसे अनबन
कितना ही अच्छा करता मै बॉस है आँख दिखाता
वही गधों को गले मिला के दारु बहुत पिलाता
उसके बॉस भी डरते उससे बड़ा यूनियन बाज
भोली- भाली  चिड़ियाँ चूँ ना करती- खाने दौड़े बाज
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बात अधूरी बीबी दौड़ी लिए बेलना हाथ
हे ! कवि तू अपनी ही गाये कौन सुने तेरी बात
सुबह पांच उठती सब करती साफ़ -सफाई घर की
तन की -मन की, पूजा करती घन-घन बजती घंटी
दौड़ किचेन में उसे नहाना कपड़ा  भी पहनाती
चोटी  करती ढूंढ के मोजा, बैज, रूमाल भी लाती
प्यार से पप्पी ले लाली को वहां तलक पहुंचाती
फिर तुम्हरे पीछे हे सजना बच्चों जैसा हाल
इतने भोले बड़े भुलक्कड होती मै बेहाल
रंग चोंग के सजा बजा के तुम को रोज पठाती
लुढके रोते से जब आते हो ख़ुशी मेरी सब जाती
दिन भर तो मै दौड़ थकी हूँ कुछ रोमांस तो कर लो
आओ प्रेम से गले लगाओ आलिंगन में भर लो !
हँसे प्यार से कली फूल ज्यों खिल-खिल-खिल खिल हंस लें
ननद-सास बहु-बात तंग मै दिल कुछ हल्का कर लें
छोटे देवर छोटे बच्चे सास ससुर सब काम
आफिस मेरा तुमसे बढ़कर यहाँ सभी मेरे बॉस
आफिस में ही ना टेन्शन है घर में बहुत है टेन्शन
कभी ख़ुशी तो कुढ़ -कुढ़ जीना यहाँ भी बड़ी है अनबन
दस-दस घंटे रात में भी तुम- हो कविता के पीछे
हाथ दर्द है कमर दर्द है आँख लाल हो मींचे
ये सौतन है ' ब्लागिंग' मेरी समय मेरा है खाती
इंटरनेट मोडेम मित्रों से चिढ़ है मुझको आती
मानीटर ये बीबी से बढ़ प्यार है तुमको आता
लगा ठहाके हंस मुस्काते रंक ज्यों कंचन पाता
लौंगा  वीरा और इलायची वो सुहाग की रात
हे प्रभु इनको याद दिला दे करती मै फरियाद
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कवि का माथा ठनका बोला मै सौ 'कविता' पा-लूं
'कविता' एक को तुम पाली हो, सुनता ही बस घूमूं
तुम थक जाती मै ना थकता, कविता मुझको प्यारी
पालो तुम भी दस-दस कविता तो अपनी हो यारी
एक कवि -लेखक  ही तो है- पूजा करता- सुवरन पाछे भागे
हीरा मोती और जवाहर-ठोकर मारे-प्रीत के आगे नाचे-हारे
दो टुकड़े -कागज पाती कुछ -वाह वाह सुनने को मरता
प्रीत मीत को गले लगाए दर्पण निज को आँका करता
खून पसीना अपना लाता मन मष्तिष्क लगाता
टेंशन-वेंशन सब भूले मै, सोलह श्रृंगार सजाता
सहलाता कोमल कर मन से, ढांचा बहुत बनाता
मै सुनार -लो-हार’, कभी मै प्रजापति बन जाता
आत्म और परमात्म मिलन से हंस गद-गद हो जाता
हे री ! प्यारी मधु तू मेरी मै मिठास भर जाता
सात जनम तुझको मै पाऊँ सुघड़ सुहानी तू है
साँस  हमारी जीवन साथी जीवन लक्ष्मी तू है
तब बीबी भी भावुक हो झर झर नैनन नीर बहाई
गले में वो बाला सी लटकी कुछ फिर बोल न पायी
दो जाँ एक हुए थे पल में, धडकन हो गयी एक
हे ! प्रभु सब को प्यार दो ऐसा, सब बन जाएँ नेक
'कविता' को भी प्यार मिले, भरपूर सजी वो घूमे
सत्य सदा हो गले लगाये, हर दिल में वो झूले
हम जब जाएँ भी तो 'हम' हों, 'मै' ना रहूँ अकेला
प्यारी जग की रीति यही है, दुनिया है एक मेला !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'
८-८-२०१२
कुल्लू यच पी ९ पूर्वाह्न
ब्लागर-प्रतापगढ़ उ.प्रदेश भारत



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं