Monday, November 28, 2011

बाबा "क्षमा" करना



बाबा "क्षमा" करना 
शायद किसी की तेज रफ़्तार ने 
उसके पाँव कुचल डाले थे 
खून बिखरा दर्द से कराहता 
आँखें बंद --माँ --माँ --हाय हाय ...
अपनी आदत से मजबूर 
जवानी का जोश 
मूंछे ऐंठता -खा पी चला था - मै
तोंद पर हाथ फेरता -गुनगुनाता 
कोई  मिल जाए 
एक कविता हो जाये  !!
दर्द देख कविता आहत हुयी 
मन रोया उसे उठाया 
वंजर रास्ता - सुनसान 
जगाया -कंधे पर उसका भार लिए 
एक अस्पताल लाया !
डाक्टर  बाबू मिलिटरी के हूस 
मनहूस ! क्या जानें दर्द - आदत होगी 
खाने का समय - देखा -पर बिन रुके 
चले गए -अन्य जगह दौड़े 
उपचार दिलाये घर लाये 
धन्यवाद -दुआ ले गठरी बाँधे 
लौट चले -कच्चे घर -
झोपडी की ओर............
एक दिन फिर तेज रफ़्तार ने 
मुझे रौंदा -गठरी उधर 
सतरंगी दाने विखरे -कंकरीली सडक 
लाठी उधर - मोटा चश्मा उधर 
कुछ आगे जा - कार का ब्रेक लगा 
महाशय आये - बाबा "क्षमा" करना 
जल्दी में हूँ -कार स्टार्ट --फुर्र ..ओझल 
"भ्रमर" का दिल खिल उठा 
“आश्चर्य” का ठिकाना रहा 
किसी ने आज प्यार से 'बाबा" कहा 
“क्षमा” माँगा -एक "गरीब" ब्राह्मण से 
वो भी "माया"-“मोह” के इस ज़माने में 
जहाँ कीचरण” छूना तो दूर 
लोगनमस्ते” कहने से कतराते 
'तौहीन' समझते हैं 
सब "एक्सक्यूज" है 
दिमाग पर जोर डाला 
अतीत में खोया 
आवाज पहचानने लगा 
माथे की झुर्रियों पर बोझ डाला 
याद आया - सर चकराया 
इन्हीभद्र पुरुष”  का पाँव था कुचला 
हमने कंधे पर था ढोया
और उस दिन था ये “बीज” बोया 
या खुदा -परवरदीदार 
अपना किया धरा 
बेकार--कहाँ जाता है ??
कभी कभी तो है काम आता ?
मै यादों में पड़ा 
थोडा कुलबुलाया ..रोया 
फिर हंसा 
अपनी किस्मत पर 
और गंतव्य पर चल पड़ा ....
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर" 
२१.११.२०११ यच पी 
.१८-.०८ पूर्वाह्न 


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Friday, November 25, 2011

चला भिखारी – जंगल में

चला भिखारी – जंगल में
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हे बादल तू भर भर कर जल
घूमे ललचाये चढ़ के आकाश
पाया तो धरती सागर से
क्या भूला – अहम भरा मन में ?
है तप्त मरुस्थल धरती ये
बूंदे बरसा हरियाली दे
हे अम्बुद-अम्बुज- सर-सा दे
मन खिल जाए
तो आनंद और आये
पूजा तेरी हो जाए
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इतना धन छाती में भर के
गर्वोन्नत -पर्वत खड़ा हुआ
कुछ नीचे क्षुद्र जीव भी हैं
हैं ताक रहे सिर उठा उठा
या समझा सूखा रूखा मै
तन मिटटी पत्थर भरा हुआ
या गड़ी सम्पदा जल जो है
शीतलता – हरियाली तुझमे
झरना बन थोडा फूट पड़े
तू तृप्त करे जो जले यहाँ
तो आनंद और आये
जो काम किसी के तू आये
गोवर्धन – बन पूजा जाए !
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हम छोड़ रौशनी सभी जगत
सब गिरा कन्दरा हैं आये
अंधियारे जंगल वास करें
कुछ भूख मिटे ये मन चाहे




देखा चूहों का पेट भरे
कुछ  बचा  खुचा  चौपाये  खाएं 
कुछ लूट पाट कर घर भर लें
कुछ सड़े - बचे में आग लगाएं
हम लिए कटोरा जग भटके
ना भरा ये अब रोते -आये
फल वृक्ष लदा जो तू गिरकर
इंसानों की अब भूख मिटाए
तो आनन्द और आये
कल्पवृक्ष बने तू – तरुवर हे !
जन- मानस में पूजा जाए !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर “५
१८.११.२०११
७.५०-८.१५ पूर्वाह्न यच पी




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Tuesday, November 22, 2011

किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?


किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?
हाथी मेरा खाता पीता
सुस्त चले – रहता बस सोता
अश्वमेध का सपना आया
घोडा चुन-चुन लाया
हाथी पर चढ़ कभी परिक्रमा
जब पूरी ना हो पायी
अश्वशक्ति – कुछ मंत्री- तंत्री
ले उधार तब-इच्छा पूरी कर पायी
सूरज ढलने को आया जब
अँधेरा ना हो जाए !
इसी लिए घर आग लगाया
उजाला -कुछ दिन रह जाए !!
उत्तर हाथी, उत्तर काशी
उत्तर शिला -उत्तर लोढ़ा
चार धाम- मन में आया
साँसें अटकी -जीवित क्यों हूँ
संसद में ला पास करा लूं
अपनी मूरति – कुछ गढ़वा के
चौराहे – मंदिर -में ला -दूँ
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उसका ख्याल ये देख -देख कर
दल-दल मै फंसता जाऊं
अभी एक हैं भाई मेरे
जाऊं थोडा मिल आऊँ !
कल वे बँटे दीवारों होंगे
किस घर बैठूं – किसका खाऊँ ?
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बार्डर पर जाते ही भैया
एक -मुछंडे ने – रोका !
“बौने” छोटे- वहां बहुत हैं
तेरा “कद” अब भी ऊंचा !!
वीसा -पासपोर्ट -ले आओ
बंट जाए- तो फिर- घर जाओ
अब वो गाँव देश ना प्यारा
अब ये है पर-देश
मारा मारी -विधान -सभा में
नहीं मिला सन्देश ??
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दो रोटी खाकर मै जीता
कीचड़ वाला पानी भाई
सूखे कुएं का – अब तक पीता
ये कंकाल लिए अपना मै
कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ?
मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं
भय है- ना नोचा जाऊं !
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मन चाहे पत्थर की मूरति से
मिल मै – कुछ रो आऊँ
हाड मांस का पुतला अपना
आंसू – थोडा दिखलाऊँ
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इस आंसू में शक्ति बहुत है
थोडा उनको समझाऊँ !
जो सजीव “पाथर” हैं मिल लूं
आँख मिला के -बतलाऊँ
जहर भरा है जिनके रग में
आंसू थोडा- मिला के आऊँ !
मुई खाल की सांस की गर्मी से
थोडा मै पिघलाऊँ !
मन में उनके जो इच्छा है
मार -उसे थोडा मै पाऊँ !
यहाँ पे राज करेंगी मौसी
वहां पे मामा कंस !
विद्वानों को तहखाने कर
मिलकर लेंगे डँस !!
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भ्रमर ५
यच पी



दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

Sunday, November 20, 2011

शनि ग्रह -कटा-पेड़


शनि ग्रह -कटा-पेड़ 

स्थानीय देवता के कारनामे ..




चामुंडा देवी के पास जहां लोगों का दाह संस्कार किया जाता है कहते हैं की साल में २६५ दिन होते हैं तो २६४ लोग नहीं आते बल्कि ज्यादा ही २६६ तो ही जाते हैं ..ऊंचे नीचे पहाड़ .गहरी खाइयां ..कहीं दो पहाड़ के बीच बाँध जल से भरे काल दीखते हैं ...अपने गंतव्य पर जा कर जाइये तो रात में लगता है गंगा में जौ बो के उपजा लिए ..

.ये सब रात में फिर भी भूत बन छाती पर चढ़ कर दबाते हैं ...जोर से चीख और रोना जाता है शायद पड़ोस वाले सुनते ही हों ..लेकिन किसे होश सब जाम टकराए पैग लगाए ..इन हिमालय की वादियों में पड़े ..अब उन्हें क्या पड़ी हम सा रात रात भर जागें ??

अभी चार दिन पहले चार लोग कन्धा दिए किसी सज्जन को लिए चले गए इसी मेरे भवन  के सामने से इसी गाँव से ..पीछे भारी भीड़ ..राम नाम सत्य है ..ये सत्य देखने कौतूहल वश मै भी निकला हाथ जोड़े हालांकि कुछ सत्य ख़ास नहीं दिखा वही सदियों का कहा सुना ..फूल माला ..भीड़ ..सब का फेंक कर आना  मुह में लकड़ी डाल --सर फोड़  .और ....
फिर पुनः अन्दर अपने काम में तल्लीन हो गया ....
चार दिन भी नहीं बीते की कल शुक्रवार को फिर कोई चल बसे इस दुनिया से जाने सब का मोह क्यों भंग हो जा रहा ?...भीड़ ..फिर मै निकला अपने भवन से राम नाम सत्य है गाया और हाथ जोड़ अन्दर घुस आया .....
आज शनिवार पता  चला कल जाने वाले बाबा यहीं मेरे सामने यानी पड़ोस के भाई जी के पिता थे जो दुसरे  भाई  के हिस्से बँटे  थे पहाड़ों में ऊपर घर में रहते थे .....मेरे घर के सामने दायीं तरफ  वरामदा और उसके  आगे १५ फीट चौड़ी सडक फिर उन भाई  जी का कोसी का पेड़ लम्बा ५० (पचास) फुट ऊंचा ..कुछ लोग सहयोगी आये रस्सी बाँधी गयी हरे पेड़ में और आराकसी पावर कटर लग गया ....मोटा पेड़ करीब एक मीटर परिधि का ......

मै अपने काम में व्यस्त ..जब लग जाओ तो भूख प्यास भी भूल जाती है ...बच्चा मन कौतूहल तो बहुत हो रहा था की जा के देखूं पेड़ कैसे कट रहा .......


कहते हैं शनि महराज घूमते रहते हैं और कुछ अच्छा पुण्य काम भी देखते हैं -------बही खाता लिखते हैं----- काले काले हैं पर मन के नहीं तन के बस ......शायद आये उड़े हमारे आस  पास अब हमारे तीसरी आँख तो नहीं की उन्हें कुछ देखें ....
.हम तो दर्शन कर रहे थे हजरत निजामुद्दीन औलिया का अब्दुल रशीद जी के ब्लॉग पर कुछ शिकवा शिकायत भी .....कुछ यादें जुड़ जाती हैं हमारे साथ हमेशा के लिए ...दुवाएं ले हम अब पधारे ..

“राजकमल इन पञ्चकोटि महामणि कौन बनेगा करोड़पति” !!! में जहां की हमारे भ्राता श्री मशगूल थे पांच करोड़ पति बनने में ..आज कल कोई पांच अरबवां बच्चा बनना चाह रहा तो कोई पांच करोड़ का पति ......आनंद में हम खोये ही थे कि .......


जोर का धमाका बिजली कौंधी और अरा . .. रा ..कि धडाम  कीआवाज ..अब मुझसे नहीं रहा गया मन बेचैन सोचा बाहर निकलूँ ...तो कैसे निकलूँ बड़ा भारी हरा भरा पेड़ डालियाँ पत्ते  मेरा दरवाजा छत  वरामदा घेरे ........गाडी कि पार्किंग में पूरा सोया पड़ा ...साथ में चार बिजली के खम्बे धराशायी ..केबल और ब्राड बैंड का मोटा केबल टेलीफोन का खम्बा सब ................

सारा कुछ शांत ...एक मोटर साईकल सोयी पड़ी ....इस पर सारे बिजली के  तार .....सवार दूर गिर कर छिटक गया था शायद उसने भी शनि के लिए कभी काली गाय को रोटी या सतरंगी खिचड़ी खिला दी होगी ....

मै अवाक ..हतप्रभ ....भला हो शनि का अगर उन्होंने हमको नापा जोखा नहीं होता और ये बिजली का तार उसका कोण ४५ डिग्री नहीं कर देता ९० डिग्री होता तो पूरे के पूरे २५ फीट हमारे ऊपर ..और मेरे भवन के पूर्व और दक्षिण का एक कोना तोड़ते हुए वृक्ष महाराज ......गाडी पार्किंग की जगह में .......अब आप हालात समझभ्रमरको कुछ और दुवा दे ही दीजिये ....हम आप सब के पहले से ही आभारी हैं ............. आप सब का आशीष ही रहा की मै कौतूहल से भरा वरामदे में नहीं निकला था जहाँ की अक्सर गुन गुनी धूप के लिए चहल कदमी करता हूँ   


फिर जब हम बाहर झाँके-निकले  ....गधे की सींग से गायब रस्सी थामने वाले लोग आये रस्सी टूट विखर गयी थी  ..कुछ और लोग फिर भीड़ ..बिजली वाले को फोन ....बिजली वालों कि उछल कूद यफ आई आर कि धमकी ...उपप्रधान प्रधान का आना सब मिल समझाना ..सडक पर भीड़ ..रास्ता  बंद जाने क्या क्या हंगामा ..पावर कटर वाला फिर नहीं चेहरा दिखाया गाँव वाले मिल जुल आरा कशी ...पेड़ बोटी बोटी काट अलग करना ...फिर रात भर अँधेरे ठण्ड में काटना दुसरे दिन रविवार बिजली आई ...
जय हो शनिदेव आप साढ़ेसाती ही नहीं चढाते जान बचाते भी हैं ..शनि का दिन स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी आधे दिन पर ही नहीं तो इतने बच्चे इस राह पर ... जाने कितना बड़ा हादसा हो जाता .....प्रभु सब का खैर करें ...........

पेड़ काटने वाले कृपया ध्यान रखें ...

- आप भीम नहीं हैं की कुछ भी थाम लेंगे सड़ी गली रस्सी लेकर  ..अच्छी मजबूत रस्सी लें 
-बिजली के खम्बे-- तार हों-- तो बहुत सावधानी बरतें अच्छा हो बिजली वाले को थोड़ी देर के लिए बात कर मना लें .....और बिजली काट दी जाये आज कल तार के इतने जाल बिछे हैं की एक लाईन ट्रिप भी हुयी तो दूसरी से कनेक्शन चालू  रहता है ....

-काटते समय पेड़ को जिस तरफ गिराना है उस का सही आंकलन करें उस तरफ पहले कुछ कटाई करें -अधिक ऊंचाई से काटें 
- यदि पास भवन हैं तो नजरअंदाज कर घर वाले को बता दे --पेड़ कभी भी काबू से बाहर हो घूम जाता है -अच्छा हो पहले डालियों की छंटनी कर लें 
-यदि पास में सड़क या रास्ता है तो उधर किसी को खड़ा कर दें राहगीरों को बचाने हेतु 
- जब पेड़ लगभग कट चुका हो थोड़ा बाकी हो तो रस्सी से ही आजमाइश कर लें पेड़ के पास से हट जाएँ रस्सी लम्बी हो और ऊंचाई और मजबूत जगह पर बंधी हों 
- आज कल कुछ स्टील  के तार और पुल्ली-विन्च मशीन  से उपकरण प्रयोग में लाये जा सकते हैं जो आस पास किसी ठेकेदार के पास मिल जाते हैं -जिससे धीरे धीरे इतना कस देते हैं की पेड़ महराज  बिना पूरा कटे ही जय श्री राम ....

और "भ्रमर " जैसे बच्चों का जो की सदा कौतूहल से भरे कुछ घटना में देखने दौड़ जाते हैं को विशेष रूप से बचाएं -खुद को भी बचाएं क्यों की हरा पेड़ काटना जुर्म है इसकी इजाजत ऐसे वाकये में लेनी होती है !
शुक्ल भ्रमर  
१३.११.२०११
यच पी 




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं