Saturday, December 3, 2011

आई. ऐ. यस. पी. सी. यस.पढ़ के


आई. ऐ. यस. पी. सी. यस.पढ़ के
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कच्चा पीतल हो जब राजा
सोने का कवि हो दरबारी
बीच दन्त ज्यों जिह्वा डोले
कटते पिसते निभती यारी
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उनसे क्या उम्मीद लगायें
हो नंगे जो अब भी घूमें
“माया” के ही तलवे चाटें
मिले “कटोरे” में जो -चूमें !
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“माया” मोहिनी है जालिम ये
रानी सिंहासन -पहचानो
भूख -समस्या -न्याय की खातिर
महल घुसो तब परखो-जानो
कितने बुद्धि विवेक लिए हैं
धूल धूसरित “दरी ” बिछाए बैठे
कहीं द्रौपदी कहीं जुआ है
हाथ मलें सब बैठे !
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राजा ही क्यों दोषी मानें
हम तुम ही दरबारी
बनो पूर्णिमा चाँद सा चमको
कहाँ निशा -अंधियारी ??
मन्त्र-मंत्रणा राज-नीति सब
तुम ही तो समझाते
माँ ने क्या सब बुरा सिखाया
गुरु यही हैं क्या समझाते ??
तेरा भी ये घर है यारों
यहीं तुम्हे इज्जत से रहना
young-man-looking_~x30677732
आई. ऐ. यस. पी. सी. एस. पढ़ पढ़ के
मान नहीं खो देना
गौरव, मान, दर्द ना समझे
क्या मानव -मानवता ??
जितनी शक्ति अरे ! लगा दो
ला समाज में समता !!
शुक्ल भ्रमर ५
५.११.२०११- ७.१५-७.५५ पूर्वाह्न
यच पी
(फोटो साभार गूगल नेट से )
JAY SRI RAADHEY .........


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

3 comments:

S.N SHUKLA said...

सार्थक और सामयिक प्रस्तुति,आभार.

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय यस यन शुक्ल जी ये सम सामयिक रचना आप के मन को छू सकी लिखना सार्थक रहा काश और लोग ही आप की नजरों से देखें समझें ..
भ्रमर ५

रविकर said...

पद का मद |

सुन्दर प्रस्तुति ||

बधाई ||

http://terahsatrah.blogspot.com