Sunday, March 27, 2011

आँखें खोल राह में चल दो



आँखें खोल राह में चल दो
सपने दिन के
तारे दिन के
नहीं सभी सब सच्चे होते
फर्जीवाड़ा बहुत बढा है
लूट पाट करने वालों ने 
खूब गढ़ा है  
महल दुमहले
संगी साथी
जैसे सागर तीरे कोई बना  
इतराता जाये
सुन्दर सुन्दर ताजमहल
हो - बना रेत का
बिना नीव का
कुछ पल तो
आँखों को भाए
जब तक कोई लहर  आये 
हहर हहर कर 
किसी ह्रदय से 
बडवाग्नि से  
सोख न जाये
सावधान  हो मृग  मरीचिका  
से बढ़  जाओ  
मत  घबराओ  
रहो  जागते  
इनसे  जिनको  
आँख बंद कर
रहे पूजते

इन सबको हे मेरे भाई
हम सब ने ही
दूध पिलाकर किया बड़ा है

Surendrashuklabhramar5

26.3.2011

No comments: